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हर घर में है बंकर, हर नागरिक सैनिक
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हर घर में है बंकर, हर नागरिक सैनिक
- यूक्रेन से आए एमबीबीएस छात्र योगेंद्र चौधरी ने बताई हकीकत
सिद्धार्थनगर। यूक्रेन के हर घर में बंकर है और वहां के नागरिकाें को सैन्य प्रशिक्षण दिया गया है। एनसीसी की तर्ज पर वहां के स्कूलों में सभी छात्र-छात्राओं को दो वर्ष सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है। यही कारण है कि रूस का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए वहां के नागरिक बंदूक उठा रहे हैं। यूक्रेन के नागरिक समर्पण के पक्ष में नहीं हैं और जीत की आस में अपने देश के साथ हैं। यूक्रेन से वापस आए जिला अस्पताल के फार्मासिस्ट ओपी चौधरी के पुत्र योगेंद्र चौधरी ने ये बातें बताईं।
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद जब तक योगेंद्र की वतन वापसी नहीं हुई थी, तब तक परिवार के लोगों के आंसू नहीं रुक रहे थे। अब यूक्रेन की बातों में ही दिन बीत रहा है। योगेंद्र बताते हैं कि यूक्रेन सरकार ने अपने नागरिकों को सेना में भर्ती होने की छूट दे दी है। सैन्य कैंप में पहुंचने वालों की भर्ती की जा रही है। युद्ध के दौरान सरकार ने बिना लाइसेंस के ही बंदूक खरीदने की छूट दे दी है। मौत के खौफ के बजाय यूक्रेन के नागरिक अपने वतन के लिए हथियार उठा रहे हैं। जिनके पास हथियार नहीं हैं, वे लोग पेट्रोल बम बनाकर रूसी सेना के वाहनों के टायर और ड्राइवर की सीट के सामने शीशे पर आग लगा रहे हैं। यदि हवाई हमले न हों तो यूक्रेन के नागरिकों से रूस को निपटना आसान नहीं है।
युद्ध से गिरी रूसी मुद्रा
योगेंद्र के अनुसार युद्ध से यूक्रेन के दो शहर तबाह हुए हैं, लेकिन रूसी मुद्रा में गिरावट आई है। युद्ध से पहले 2.6 से 2.7 रुपये यूक्रेन के एक ग्रेवेन के बराबर था, जो अब करीब 2.53 रुपये है। पहले भारत और रूस की मुद्रा लगभग बराबर थी, जबकि अब एक रुपये के बदले 1.62 रूबल है।
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पोलैंड में मिली बहुत मदद
योगेंद्र ने बताया कि यूक्रेन में भारतीय दूतावास से कोई मदद नहीं मिल पा रही थी, लेकिन पोलैंड और रूस में बहुत सहयोग मिला। 23 फरवरी की रात में वह अपने भारतीय दोस्त को रेलवे स्टेशन पहुंचाकर आए थे, सुबह 6 बजे पता चला कि युद्ध शुरू हो गया। कीव और खार्कीव शहर पर हमले हुए थे, जबकि दोस्त कीव ही जा रहा था। मैंने उसे मैसेज किया कि कहीं उतर जाओ। गनीमत रही कि कीव से कुछ दूर पहले ही ट्रेन रुक गई। ट्रेन के कोच में कई लोग रो रहे थे, क्योंकि उनके परिवार के लोगों की मौत हो चुकी थी। वहां से वापस आने के लिए बस और ट्रेन नहीं मिल रही थी। उन्हें एक होटल में कमरा मिल गया था, लेकिन युद्ध के दुष्प्रभाव से वहां की खिड़कियां भी हिल रही थीं।
छात्रों को मार रही थी यूक्रेन की सेना
योगेंद्र ने बताया कि यूक्रेन में 18 से 60 वर्ष तक के लोगों के देश छोड़ने पर रोक है, जबकि युद्ध के हालात में 18 वर्ष के कम उम्र के बच्चे, बुजुर्ग और महिलाओं को पोलैंड भेजा जा रहा है। शुरूआती दौर में जो भारतीय छात्र यूक्रेन से पोलैंड जाने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें यूक्रेन की सेना ने पीटकर और फायरिंग करके डरा रही थी। ट्रेन में चढ़ने नहीं दे रही थी। शायद वे चाहते थे कि पहले यूक्रेन के नागरिक सुरक्षित हो जाएं।
किताबें जलाकर बचाई ठंड से जान
यूक्रेन में रात में तापमान माइनस 5 डिग्री सेल्सियस हो गया था। जो लोग जल्द यूक्रेन से बाहर निकलने की कोशिश में चल पड़े, वे पोलैंड और रोमानिया बार्डर पर जाकर फंस गए। बार्डर होने में कई दिन बीत गए तो ठंड से जान बचाने की चुनौती थी। कुछ छात्रों को पैदल चलकर वापस होना पड़ा तो कुछ ने अपनी किताबें, नोट्स और कपड़े जलाकर जाने बचाने की कोशिश की।
बंकर से ज्यादा सुरक्षित चर्च
योगेंद्र बताते हैं कि वे लबीब सेंटर में रहते थे, वहां 150 मीटर दूर चर्च था। मकान मालिक ने बताया कि इधर, हमला हो तो बंकर के बजाय चर्च में चले जाना, वह ज्यादा सुरक्षित है। 26 फरवरी को दक्षिण भारतीय छात्रा के पिता ने उन्हें फोन किया कि दो छात्राएं हैं, उनकी मदद करो तो वे अपने दोस्त के साथ एक किमी दूर वहलेस्तिया थ्री चले गए। जब वे पोलैंड पहुंच गए तो लकी ड्रा में जिनका नाम निकल रहा था, उन्हें फ्लाइट में सीट मिल रही थी। दो मार्च को लकी ड्रा में उनका नाम निकला, लेकिन छात्राओं की बारी नहीं आई तो हाइपरटेंशन बताकर फ्लाइट छोड़ दी, ताकि वे अकेली न रह जाएं। सभी 30 विद्यार्थी तिरंगा झंडा लहराते हुए एक साथ स्वदेश पहुंचे।
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- यूक्रेन से आए एमबीबीएस छात्र योगेंद्र चौधरी ने बताई हकीकत
सिद्धार्थनगर। यूक्रेन के हर घर में बंकर है और वहां के नागरिकाें को सैन्य प्रशिक्षण दिया गया है। एनसीसी की तर्ज पर वहां के स्कूलों में सभी छात्र-छात्राओं को दो वर्ष सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है। यही कारण है कि रूस का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए वहां के नागरिक बंदूक उठा रहे हैं। यूक्रेन के नागरिक समर्पण के पक्ष में नहीं हैं और जीत की आस में अपने देश के साथ हैं। यूक्रेन से वापस आए जिला अस्पताल के फार्मासिस्ट ओपी चौधरी के पुत्र योगेंद्र चौधरी ने ये बातें बताईं।
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद जब तक योगेंद्र की वतन वापसी नहीं हुई थी, तब तक परिवार के लोगों के आंसू नहीं रुक रहे थे। अब यूक्रेन की बातों में ही दिन बीत रहा है। योगेंद्र बताते हैं कि यूक्रेन सरकार ने अपने नागरिकों को सेना में भर्ती होने की छूट दे दी है। सैन्य कैंप में पहुंचने वालों की भर्ती की जा रही है। युद्ध के दौरान सरकार ने बिना लाइसेंस के ही बंदूक खरीदने की छूट दे दी है। मौत के खौफ के बजाय यूक्रेन के नागरिक अपने वतन के लिए हथियार उठा रहे हैं। जिनके पास हथियार नहीं हैं, वे लोग पेट्रोल बम बनाकर रूसी सेना के वाहनों के टायर और ड्राइवर की सीट के सामने शीशे पर आग लगा रहे हैं। यदि हवाई हमले न हों तो यूक्रेन के नागरिकों से रूस को निपटना आसान नहीं है।
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युद्ध से गिरी रूसी मुद्रा
योगेंद्र के अनुसार युद्ध से यूक्रेन के दो शहर तबाह हुए हैं, लेकिन रूसी मुद्रा में गिरावट आई है। युद्ध से पहले 2.6 से 2.7 रुपये यूक्रेन के एक ग्रेवेन के बराबर था, जो अब करीब 2.53 रुपये है। पहले भारत और रूस की मुद्रा लगभग बराबर थी, जबकि अब एक रुपये के बदले 1.62 रूबल है।
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पोलैंड में मिली बहुत मदद
योगेंद्र ने बताया कि यूक्रेन में भारतीय दूतावास से कोई मदद नहीं मिल पा रही थी, लेकिन पोलैंड और रूस में बहुत सहयोग मिला। 23 फरवरी की रात में वह अपने भारतीय दोस्त को रेलवे स्टेशन पहुंचाकर आए थे, सुबह 6 बजे पता चला कि युद्ध शुरू हो गया। कीव और खार्कीव शहर पर हमले हुए थे, जबकि दोस्त कीव ही जा रहा था। मैंने उसे मैसेज किया कि कहीं उतर जाओ। गनीमत रही कि कीव से कुछ दूर पहले ही ट्रेन रुक गई। ट्रेन के कोच में कई लोग रो रहे थे, क्योंकि उनके परिवार के लोगों की मौत हो चुकी थी। वहां से वापस आने के लिए बस और ट्रेन नहीं मिल रही थी। उन्हें एक होटल में कमरा मिल गया था, लेकिन युद्ध के दुष्प्रभाव से वहां की खिड़कियां भी हिल रही थीं।
छात्रों को मार रही थी यूक्रेन की सेना
योगेंद्र ने बताया कि यूक्रेन में 18 से 60 वर्ष तक के लोगों के देश छोड़ने पर रोक है, जबकि युद्ध के हालात में 18 वर्ष के कम उम्र के बच्चे, बुजुर्ग और महिलाओं को पोलैंड भेजा जा रहा है। शुरूआती दौर में जो भारतीय छात्र यूक्रेन से पोलैंड जाने की कोशिश कर रहे थे, उन्हें यूक्रेन की सेना ने पीटकर और फायरिंग करके डरा रही थी। ट्रेन में चढ़ने नहीं दे रही थी। शायद वे चाहते थे कि पहले यूक्रेन के नागरिक सुरक्षित हो जाएं।
किताबें जलाकर बचाई ठंड से जान
यूक्रेन में रात में तापमान माइनस 5 डिग्री सेल्सियस हो गया था। जो लोग जल्द यूक्रेन से बाहर निकलने की कोशिश में चल पड़े, वे पोलैंड और रोमानिया बार्डर पर जाकर फंस गए। बार्डर होने में कई दिन बीत गए तो ठंड से जान बचाने की चुनौती थी। कुछ छात्रों को पैदल चलकर वापस होना पड़ा तो कुछ ने अपनी किताबें, नोट्स और कपड़े जलाकर जाने बचाने की कोशिश की।
बंकर से ज्यादा सुरक्षित चर्च
योगेंद्र बताते हैं कि वे लबीब सेंटर में रहते थे, वहां 150 मीटर दूर चर्च था। मकान मालिक ने बताया कि इधर, हमला हो तो बंकर के बजाय चर्च में चले जाना, वह ज्यादा सुरक्षित है। 26 फरवरी को दक्षिण भारतीय छात्रा के पिता ने उन्हें फोन किया कि दो छात्राएं हैं, उनकी मदद करो तो वे अपने दोस्त के साथ एक किमी दूर वहलेस्तिया थ्री चले गए। जब वे पोलैंड पहुंच गए तो लकी ड्रा में जिनका नाम निकल रहा था, उन्हें फ्लाइट में सीट मिल रही थी। दो मार्च को लकी ड्रा में उनका नाम निकला, लेकिन छात्राओं की बारी नहीं आई तो हाइपरटेंशन बताकर फ्लाइट छोड़ दी, ताकि वे अकेली न रह जाएं। सभी 30 विद्यार्थी तिरंगा झंडा लहराते हुए एक साथ स्वदेश पहुंचे।