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Siddharthnagar News: नेपाल में बारिश से उफनाईं जिले की नदियां, 24 घंटे में चार मीटर बढ़ी बूढ़ी राप्ती

Wed, 26 Jul 2023 11:53 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 26 Jul 2023 11:53 PM IST
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The rivers of the district swelled due to rain in Nepal, old Rapti increased by four meters in 24 hours
शोहरतगढ़ बानगंगा नदी खतरे के निशान से ऊपर बह रही है। संवाद
धीरे-धीरे बढ़ रहा राप्ती, कूड़ा, घोघी नदी का जलस्तर, नदियों के किनारे बढ़ी कटान
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संवाद न्यूज एजेंसी

सिद्धार्थनगर। नेपाल में बारिश के चलते जिले की नदियों में उफान आ गया है। मात्र 24 घंटे में ही बूढ़ी राप्ती नदी का जलस्तर चार मीटर से अधिक बढ़ गया है। वहीं राप्ती, कूड़ा, बानगंगा और घोघी नदियों का जलस्तर भी धीरे-धीरे बढ़ रहा है। एक तरफ बारिश नहीं होने से किसानों की खेत में खड़ी फसल सूख रही है, दूसरी तरफ नदियों के बढ़ते जलस्तर से बाढ़ प्रभावित गांवों में लोग सहम गए हैं।
बारिश नहीं होने से एक सप्ताह से लोग गर्मी और उमस से त्रस्त हैं, साथ ही धान की फसल खेत में सूखने से किसान चिंतित हैं। वहीं मंगलवार शाम आठ बजे तक बूढ़ी राप्ती का 80.400 मीटर पर रहा जलस्तर बुधवार सुबह बढ़कर 84.850 मीटर पर पहुंच गया। हालांकि यह खतरे के लाल निशान 85.650 से कम है, लेकिन चेतावनी के स्तर 84.650 से ऊपर है। इससे जोगिया, उसका बाजार क्षेत्र में नदी किनारे कटान तेज हो गई है। जोगिया क्षेत्र के फत्तेपुर और टलडिहवा गांव के पास कटान होने से ग्रामीण सहमे हुए हैं। वहीं नेपाल की बारिश से बानगंगा नदी में पानी बढ़ने से आसपास के कोमर, महथा, लेदवा, गजहड़ा गोल्हौरा, नौडिहवा, रामगढ़वा, खड़कुईया, चंपापुर गांव पानी से घिरे हुए हैं। बारिश नहीं होने से सूख रहे खेत को देख परेशान किसान रामसुभग कहते हैं कि एक तरफ सूखे की मार और दूसरी तरफ बाढ़ के खतरे के बीच जीवन काटना कठिन हो गया है।
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तेज धूप और उमस से तिलमिलाए लोग
सिद्धार्थनगर। एक सप्ताह से बारिश नहीं होने के कारण लोग उमस भरी गर्मी का सामना कर रहे हैं। बुधवार सुबह से ही तेज धूप और उमस के कारण लोग बेहाल नजर आए। सड़क व दुकानों पर पसीने से भीगे लोग गर्मी से तिलमिलाए नजर आए। हालांकि सड़क पर आवागमन करने वालों की भीड़ रही। सरकारी कार्यालय व स्कूल खुलने से भी सुबह से ही सड़क पर लोगों का आवागमन अधिक रहा। मौसम विशेषज्ञ अतुल कुमार सिंह का कहना है कि अब मौसम साफ रहेगा, तेज धूप के साथ तापमान भी बढ़ेगा।
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नदियां का जलस्तर (मीटर में)
नदी खतरे का स्तर मंगलवार बुधवार
राप्ती 84.900 80.540 80.900
बूढ़ी राप्ती 85.650 80.400 84.850
कूड़ा 83.520 77.240 80.550
घोघी 87.000 83.00 83.10
बानगंगा 93.420 94.00 93.80
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पूरी होती जलकुंडी परियोजना तो जिले को मिलती बाढ़ से राहत

जिले को बाढ़ से बचाने के लिए 58 वर्ष पूर्व बनी जलकुंडी परियोजना अगर पूरी हो जाती तो यहां समेत पूर्वांचल के कई जिलों के लोगों को बाढ़ से मुक्ति मिल जाती। जिले में पचास हजार बीघा में किसान एक फसल की बुआई कर सकते हैं। वर्ष 1954 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और नेपाल के राजा त्रिभुवन वीर विक्रम शाह ने जलकुंडी परियोजना की नींव रखी थी। परियोजना नेपाल के पहाड़ों से निकलने वाली नादियों के जल पर केंद्रित थी। इसके तहत नेपाल के भालूभांग के पास 56 मीटर और नालौरी के पास 163 मीटर ऊंची बांध बनाई जानी थी। नेपाल से निकली राप्ती और उसकी सहायक नदी झिरमुख, खोला का संगम हो जाता। इनके जल को एकत्र करने के लिए बड़े जलाशयों का निर्माण होना था। परियोजना का उद्देश्य महज बिजली पैदा करना ही नहीं था, वरन नेपाल से निकलने वाली नदियों का वेग भी कम करना था। इसके लिए दो बांधों के निर्माण की योजना थी। उस समय यह परियोजना 34 करोड़ रुपये में पूरी हो जाती। परियोजना की शुरुआत होती तो जिले सहित बस्ती, गोरखपुर, महराजगंज, देवरिया, कुशीनगर, बलरामपुर, श्रावस्ती, संतकबीरनगर को बाढ़ से काफी हद तक राहत मिल जाती। इसकी शुरुआत के लिए पूर्वांचल के कई सांसदों ने प्रधानमंत्री को पत्र भेजा लेकिन कोई पहल नहीं हुई। अधिवक्ता अखंड प्रताप सिंह कहते है कि भारत-नेपाल की जलकुंडी परियोजना केंद्र सरकार की उदासीनता का शिकार हो गई है। उन्होंने कहा कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इसकी शुरुआत की थी तो इस योजना को हर हाल में पूरा कराना चाहिए था लेकिन सरकार पहल नहीं की।

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नाकाफी रहता है नावों का इंतजाम
बाढ़ बचाव की तैयारियों में लगा प्रशासन हर वर्ष जलमग्न गांवों के लोगों के बचाव के लिए दूसरे जिलों से नाव का इंतजाम करता है। इस बीच बाढ़ से कई गांवों में जन और धन हानि हो जाती है। बाढ़ पीड़ितों को कहना है कि अगर जिले में ही नाव की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए तो बाहर से नाव, नाविक और राहतकर्मी नहीं मंगाने पड़ेंगे। वर्ष 1998 में जब जिले का तीन चौथाई हिस्सा बाढ़ से डूब गया था और एक हजार से अधिक गांव जलमग्न हो गए थे, तब बचाव कार्य के लिए 348 नावें लगाई गई थीं। इनमें अधिकांश नावें फैजाबाद समेत अन्य थीं। इस बाढ़ में 52 लोगों और 481 पशुओं की मौत हुई थी। वर्ष 2017 में आई बाढ़ के दौरान भी फैजाबाद, वाराणसी, प्रयागराज व संतकबीर नगर जिले से नावें मंगाई गई थीं। अब बीते वर्ष 2022 के सितंबर व अक्टूबर माह में आई बाढ़ पर नजर दौड़ाएं तो जलमग्न पांच से अधिक गांवों में बचाव कार्य के लिए 253 नावें और 45 मोटरबोट लगाई गईं थीं। इनमें डेढ़ सौ से अधिक नावें और सभी मोटरबोट बाहर से किराए पर मंगाई गई थीं। वह भी तब जब पूरा जिला बाढ़ से कराहने लगा था। जिले का 60 हजार हेक्टेयर क्षेत्र बाढ़ से डूबा हुआ था, बाढ़ से 19 लोगों की मौत हो गई थी और पांच लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित थे। स्थानीय प्रशासन अब भी नहीं चेता और हर वर्ष बाढ़ की त्रासदी झेल रहे जलमग्न गांव के लोगों को बचाने के लिए बाहर से नाव मंगाने की सतत प्रक्रिया जारी है। वर्तमान में जिले के सभी पांचों तहसीलों में 89 लोगों के पास निजी नावों की उपलब्धता है। वर्तमान में इनमें कई नावें क्षतिग्रस्त एवं जर्जर हो चुकी हैं। इनमें 15 छोटी, 39 मझोली और 35 बड़ी नावें हैं । जबकि नौगढ़ तहसील में 48, बांसी में 17, डुमरियागंज में 12, इटवा में चार और शोहरतगढ़ में आठ नाव की उपलब्धता है। एडीएम उमाशंकर का कहना है कि प्रशासन बाढ़ बचाव की पूरी तैयारी कर चुका है। बाढ़ के दौरान नावों की आवश्यकता के लिए फैजाबाद से अनुबंध किया गया है।
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