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72 साल की उम्र में दुर्गा बनीं हेमामालिनी, बुद्ध भूमि में दिखा अलौकिक अवतार

Sun, 14 Mar 2021 11:29 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sun, 14 Mar 2021 11:29 PM IST
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Supernatural incarnation of Hema seen in Buddhabhoomi
सिद्धार्थनगर ः कपिलवस्तु महोत्सव के दौरान दुर्गा नृत्यनाटिका में हेमामालिनी और सहयोगी कलाकारो - फोटो : SIDDHARTHNAGAR
बुद्धभूमि में दिखा हेमा का अलौकिक अवतार
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संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। कपिलवस्तु महोत्सव में खचाखच भरे पंडाल में सिनेस्टार 73 वर्षीय हेमा मालिनी ने अपने नृत्य का ऐसा जादू बिखेरा कि दो घंटे कब गुजर गए पता ही नहीं चला। दुर्गा नृत्यनाटिका में हेमामालिनी और सहयोगी कलाकारों ने मां दुर्गा के तीनों रूपों की शानदार प्रस्तुति दी। सती, पार्वती और दुर्गा के रूपों को शास्त्रों के आधार पर अलग-अलग प्रस्तुत किया तो लोग निहारते रह गए। गणेश वंदना के साथ शुरू हुई नृत्यनाटिका में कलाकारों ने समां बांध दिया। शिव-सती के संवाद और बज रहे गीतों ने लोगों को शिव के विभिन्न रूपों का अहसास कराया। सती के पिता राजा दक्ष के यज्ञ में आमंत्रण नहीं मिलने का संवाद लोगों के दिलों को छू गया। भगवान शिव ही सती को बताते हैं कि तुम्हारे पिता के यहां बड़ा यज्ञ हो रहा है और आमंत्रण नहीं मिला। सती जाने की जिद करती हैं तो भगवान शिव कहते हैं कि ‘आमंत्रण बिन अतिथि का मान करे न कोई’। इस पर सती कहती हैं कि बड़े समर्पण कार्य में होते हैं सौ काम, भूल हो जाने को न समझे अपमान। भगवान शिव समझाते हैं कि सती इतना हठ अच्छा नहीं, मेरा कहा न मानने में यदि आनंद आता हो तो आप जा सकती हैं। बाबुल के घर चल दीं सती शिव का कहा न मान। निज नाथ की करके अवज्ञा तात के घर आ गई। पिता के घर का व्यवहार देखकर सती कहती हैं कि है क्यों व्यवहार बदला सा न स्वागत है न अपनापन है। इस पर राजा दक्ष कहते हैं कि स्वेच्छा से आई हो स्वयं ही आसन ग्रहण कर लो। राजा दक्ष शिव का भी अपमान करने से नहीं चूकते। कहते हैं कि वह धूरचटी वह अभिमानी, ऐसे मंगल कार्यों में कोई उसे बुलाता है। यह भी कहते हैं कि वह अशुभ अमंगल शिव तुम्हारे साथ तो नहीं आया। इसके बाद सती ने शरीर त्यागने का फैसला लेती हैं। सती के प्राण त्यागते ही भगवान शिव ने तांडव शुरू किया तो पूरे हाल में सन्नाटा छा गया। लोग पलक झपकाए बगैर शिव तांडव के हर पहलू को देखते रहे।
शिव का रौद्र रूप देख देवलोक में मची हलचल
सती के प्राण त्यागते और भगवान शिव के रौद्र रूप देख पूरे देवलोक में हलचल मच गई। देवाधिदेव ब्रह्मा, विष्णु, नारद समेत सभी इस बात की चिंता में डूब जाते हैं कि भगवान शिव को कैसे शांत किया जाए। भगवान विष्णु बताते हैं कि पार्वती ही भगवान शिव का शोक दूर कर सकती हैं। नारद जाते हैं और पार्वती को अहसास कराते हैं कि तुमको महादेवी बनना है। बताते हैं कि शिव परमत्यागी, महायोगी ध्यान में लीन हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए ओम नम शिवाय का जाप करो। तपस्या से ही शिव प्रसन्न होंगे। उधर, शिव तपस्या को भंग करने के लिए रति और कामदेव पहुंच गए। शिव ने तीसरी नेत्र खोली और कामदेव भष्म हो गए। रति रोने लगती हैं और शिव से प्रार्थना करती हैं तो शिव ने अखंड सौभाग्यवती का वरदान दे देते हैं। इसके बाद कामदेव जीवित हो उठते हैं।
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गौरी बैठीं ध्यान लगाए
पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव पहुंचते हैं और कहते हैं कि जागो गौरी जागो आने में थोड़ा विलंब हुआ। मांगों वरदान मांगों। पार्वती शर्म से मुंह फेर लेती हैं और भगवान शिव उनके मन की इच्छा समझ कहते हैं कि मैं तुमसे विवाह रचाऊंगा। इसके बाद शिव अपने गणों के साथ बारात लेकर आते हैं। इसी के साथ भोलेनाथ की जय-जयकार शुरू हो जाती है। भगवान शिव कहते हैं कि पार्वती हम धन्य हुए संगिनी बनी तुम्हारी। दुर्गा का रूप देख धन्य हो गए लोग सती के तीसरे रूप का अंत में मंचन किया गया।
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