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Siddharthnagar News: अपनों की लाश भी न मिली तो कुश-कास से बनाई प्रतिमा, आंखों में आंसू लिए परिजन ने किया अंतिम संस्कार

Wed, 02 Sep 2026 11:50 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर Updated Wed, 02 Sep 2026 11:50 PM IST
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Siddharthnagar News: Unable to recover the bodies of their loved ones, the family fashioned effigies out of kush and kaas grass and performed the last rites with tears in their eyes
जिन लोगो के शव नही मिले उनके परिजन व रिस्तेदार कुश एवं कास का शव बनाकर क्रिया कर्म के साथ अंतिम - फोटो : आउटसोर्स नगर निगम के कर्मचारी सुरक्षा किट के साथ मौजूद डीएम,सीडीओ,नगर आयुक्त एवं नगर विधायक। स्रोत विभाग
- भोटेकोशी की बाढ़ में कई दिन बाद भी नहीं मिले शव, इंतजार की उम्मीद टूटी तो परिजन ने अपनाई परंपरागत विधि
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कपिलवस्तु। भोटेकोशी की भयावह बाढ़ ने न जाने कितने परिवारों से उनके अपने छीन लिए। किसी को आखिरी बार अपनों का चेहरा तक देखने का मौका नहीं मिला तो किसी को अंतिम संस्कार के लिए शव भी नसीब नहीं हुआ। कई दिन तक नदी और मलबे में तलाश के बाद भी जब अपनों का कोई सुराग नहीं मिला तो उनका सब्र टूटने लगा। आखिरकार उन्होंने दिल पर पत्थर रखकर कुश और कास से अपने लापता परिजन की प्रतीकात्मक देह बनाई और अंतिम संस्कार कर दिया।
बुधवार को कई परिवारों ने कुश-कास से लापता लोगों की प्रतिमाएं तैयार कीं। इन्हें अपने बिछड़े परिजन का प्रतीक मानकर धार्मिक रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया गया। जिस हाथ से कभी अपने को गले लगाया होगा, उसी हाथ से अब परिजनों को प्रतीकात्मक देह को अंतिम विदाई देनी पड़ी। इस दौरान माहौल बेहद गमगीन रहा।
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परिजन की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि वे अपनों की मौत की खबर सुनने के बाद भी उनका चेहरा नहीं देख सके। न शव मिला, न आखिरी बार माथा छूकर विदा करने का अवसर। कई दिनों तक सर्च ऑपरेशन में उम्मीद लगाए बैठे परिवारों ने आखिरकार यह मानकर धार्मिक प्रक्रिया पूरी की कि शायद उनके अपने अब कभी वापस नहीं आएंगे।
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भोटेकोशी में आई बाढ़ और भूस्खलन ने नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में भारी तबाही मचाई है। तेज बहाव में कई लोग बह गए और अनेक लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका है। राहत और बचाव दल अब भी खतरनाक परिस्थितियों में मलबा हटाकर लापता लोगों की तलाश कर रहे हैं।

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शव नहीं मिला, फिर भी अंतिम विदाई देनी पड़ी...
- बुद्धिजीवियों का कहना है कि परिजनों के लिए यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि अपनों को खोने की उस पीड़ा को स्वीकार करने की कोशिश है, जिसकी कोई तस्वीर, कोई आखिरी मुलाकात और कोई अंतिम स्पर्श उनके पास नहीं है। कुश-कास से बनाई गई वह प्रतीकात्मक देह उनके लिए उसी अपने की आखिरी निशानी बन गई, जिसे वे शायद जिंदगी भर तलाशते रहेंगे।
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