{"_id":"6aa2eb9bbc25851939007a61","slug":"siddharthnagar-news-it-is-essential-to-listen-to-a-distressed-person-before-offering-a-solution-siddharthnagar-news-c-227-1-sdn1035-164356-2026-09-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"Siddharthnagar News: परेशान व्यक्ति को समाधान से पहले सुनना जरूरी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Siddharthnagar News: परेशान व्यक्ति को समाधान से पहले सुनना जरूरी
Thu, 10 Sep 2026 11:10 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Thu, 10 Sep 2026 11:10 PM IST
विज्ञापन
- विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर रतन सेन डिग्री कॉलेज में कार्यशाला, मानसिक स्वास्थ्य पर हुई चर्चा
- व्यवहार में बदलाव, सामाजिक दूरी और निराशा के संकेतों को नजरअंदाज न करने की विद्यार्थियों को दी सलाह
बांसी। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर बृहस्पतिवार को रतन सेन डिग्री कॉलेज के रुद्र प्रताप सभागार में आत्महत्या रोकथाम और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता विषय पर कार्यशाला आयोजित की गई। वक्ताओं ने विद्यार्थियों को मानसिक तनाव और भावनात्मक परेशानियों को साझा करने के साथ जरूरत पड़ने पर समय से सहायता लेने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम की शुरुआत रितेश कुमार शुक्ल ने आत्महत्या की समस्या से जुड़े आंकड़ों और तथ्यों के साथ की। उन्होंने कहा कि आत्महत्या को रोका जा सकता है। इसके लिए कठिन परिस्थितियों, तनाव और भावनात्मक समस्याओं को दूसरों के साथ साझा करना जरूरी है। उन्होंने विद्यार्थियों से ऐसा वातावरण बनाने का आह्वान किया, जहां लोग बिना झिझक अपनी समस्याएं बता सकें और उन्हें सुनने-समझने वाला कोई मौजूद हो।
डाॅ. सलोनी सोनकर ने संवादात्मक सत्र में कहा कि भावनात्मक संघर्ष हमेशा बाहर से दिखाई नहीं देता। उन्होंने व्यवहार में अचानक बदलाव, लोगों से दूरी बनाना, पढ़ाई में रुचि कम होना, नींद व दिनचर्या में बदलाव, अत्यधिक चिड़चिड़ापन और निराशा जैसे संकेतों पर ध्यान देने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति निराशा, आत्महत्या या खुद को नुकसान पहुंचाने की बात करता है तो उसे ड्रामा या ध्यान आकर्षित करने की कोशिश मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि परेशान व्यक्ति को तुरंत समाधान बताने से पहले उसकी बात बिना टोके और बिना किसी निर्णय के सुनना अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। कार्यशाला के बाद बीएड विभाग के सहायक आचार्य डाॅ. अखिलेश उपाध्याय ने कहा कि इस सत्र से उन्होंने विशेष रूप से किसी की बात सुनने का महत्व सीखा है। उन्होंने विद्यार्थियों से कम से कम एक ऐसा मित्र बनाने की अपील की, जिसके साथ भरोसे और विश्वास का संबंध हो।
समाजशास्त्र विभाग के सहायक आचार्य देवराज सिंह ने समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम के आत्महत्या संबंधी सिद्धांतों को समकालीन उदाहरणों के साथ समझाया। उन्होंने मित्रता में गोपनीयता, संवेदनशीलता और विश्वास बनाए रखने पर जोर दिया। दयाशंकर पटेल ने दुर्खीम के विचारों को दैनिक जीवन की परिस्थितियों से जोड़ते हुए मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने के व्यावहारिक सुझाव दिए। डाॅ. सूर्यकांत त्रिपाठी ने भी संबोधित किया। कार्यशाला में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
विज्ञापन
- व्यवहार में बदलाव, सामाजिक दूरी और निराशा के संकेतों को नजरअंदाज न करने की विद्यार्थियों को दी सलाह
बांसी। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर बृहस्पतिवार को रतन सेन डिग्री कॉलेज के रुद्र प्रताप सभागार में आत्महत्या रोकथाम और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता विषय पर कार्यशाला आयोजित की गई। वक्ताओं ने विद्यार्थियों को मानसिक तनाव और भावनात्मक परेशानियों को साझा करने के साथ जरूरत पड़ने पर समय से सहायता लेने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम की शुरुआत रितेश कुमार शुक्ल ने आत्महत्या की समस्या से जुड़े आंकड़ों और तथ्यों के साथ की। उन्होंने कहा कि आत्महत्या को रोका जा सकता है। इसके लिए कठिन परिस्थितियों, तनाव और भावनात्मक समस्याओं को दूसरों के साथ साझा करना जरूरी है। उन्होंने विद्यार्थियों से ऐसा वातावरण बनाने का आह्वान किया, जहां लोग बिना झिझक अपनी समस्याएं बता सकें और उन्हें सुनने-समझने वाला कोई मौजूद हो।
विज्ञापन
डाॅ. सलोनी सोनकर ने संवादात्मक सत्र में कहा कि भावनात्मक संघर्ष हमेशा बाहर से दिखाई नहीं देता। उन्होंने व्यवहार में अचानक बदलाव, लोगों से दूरी बनाना, पढ़ाई में रुचि कम होना, नींद व दिनचर्या में बदलाव, अत्यधिक चिड़चिड़ापन और निराशा जैसे संकेतों पर ध्यान देने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति निराशा, आत्महत्या या खुद को नुकसान पहुंचाने की बात करता है तो उसे ड्रामा या ध्यान आकर्षित करने की कोशिश मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि परेशान व्यक्ति को तुरंत समाधान बताने से पहले उसकी बात बिना टोके और बिना किसी निर्णय के सुनना अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। कार्यशाला के बाद बीएड विभाग के सहायक आचार्य डाॅ. अखिलेश उपाध्याय ने कहा कि इस सत्र से उन्होंने विशेष रूप से किसी की बात सुनने का महत्व सीखा है। उन्होंने विद्यार्थियों से कम से कम एक ऐसा मित्र बनाने की अपील की, जिसके साथ भरोसे और विश्वास का संबंध हो।
समाजशास्त्र विभाग के सहायक आचार्य देवराज सिंह ने समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम के आत्महत्या संबंधी सिद्धांतों को समकालीन उदाहरणों के साथ समझाया। उन्होंने मित्रता में गोपनीयता, संवेदनशीलता और विश्वास बनाए रखने पर जोर दिया। दयाशंकर पटेल ने दुर्खीम के विचारों को दैनिक जीवन की परिस्थितियों से जोड़ते हुए मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रखने के व्यावहारिक सुझाव दिए। डाॅ. सूर्यकांत त्रिपाठी ने भी संबोधित किया। कार्यशाला में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।