{"_id":"69458fbb0f26317c8803b798","slug":"siddharthnagar-news-innocents-showed-courage-got-the-criminals-sentenced-to-life-imprisonment-siddharthnagar-news-c-227-1-sgkp1033-150165-2025-12-19","type":"story","status":"publish","title_hn":"Siddharthnagar News: मासूमों ने दिखाई हिम्मत, परिवार ने दिया हाैसला...दरिंदों को दिलाई उम्रभर की सजा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Siddharthnagar News: मासूमों ने दिखाई हिम्मत, परिवार ने दिया हाैसला...दरिंदों को दिलाई उम्रभर की सजा
Fri, 19 Dec 2025 11:17 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Fri, 19 Dec 2025 11:17 PM IST
विज्ञापन
सिद्धार्थनगर। लोकलाज, सामाजिक तानों और बदनामी के डर से ऊपर उठकर जब परिवारों ने चुप्पी तोड़ी, तो न्याय की राह आसान हो गई। परिवारों ने हिम्मत दिखाते हुए और कानून का दरवाजा खटखटाया। डर के साए में जीने के बजाय पीड़ित परिवार आगे बढ़े, विवेचना में सहयोग किया और अंततः अदालत से सख्त फैसला आया। दरिंदगी के मामले में पीड़ित परिवार ने बदनामी और अपमान का घूंट पीने का साहस जुटाया तो एक साल में 40 दरिंदों को सांसें रुकने तक सलाखों के पीछे रहने की सजा मिली। इन मामलों ने न सिर्फ पीड़ितों को न्याय दिलाया बल्कि समाज को भी यह संदेश दिया कि लड़ाई लड़ी जाए तो कानून उनके साथ खड़ा है।
वर्ष 2016 से अब तक 40 ऐसे मामले हैं, जिनमें नाबालिग को शिकार बनाया गया था। इसमें पीडि़ता न्याय के लिए डटी रही और पुलिस ने इस मामले में निगरानी की। जिला स्तर पर एसपी के दिशा-निर्देश में काम करने वाले मॉनिटरिंग सेल की निगरानी, गवाहों के बयान और समय-समय पर नोटिस, तामिला कराने का प्रयास भी इस न्याय की लड़ाई में अहम रहा है, जिसकी देन रही कि दरिंदों को आखिरी सांस तक सलाखों के पीछे रहने की सजा मिली। वहीं, विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि शुरुआती स्तर पर ही शिकायत दर्ज हो, साक्ष्य सुरक्षित किए जाएं और बयान में कोई लापरवाही न बरती जाए तो सजा की राह मजबूत हो जाती है।
-- -
आक्रोश से न्याय तक की यात्रा
इन मामलों के सामने आने के बाद जिले आक्रोश व्याप्त हो गया। खासतौर पर पांच ऐसे मामले थे, जिनमें 12 साल से तीन साल तक की बच्चियों को दरिंदों ने अपना शिकार बनाया था। केस सामने आने के बाद हर कोई आक्रोशित हो उठा था। जांच करने वाली पुलिस भी मामला सामने आने के बाद हैरत में पड़ गई। अपराध करने वाले पड़ोस के या फिर गांव के रहने वाले थे। जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले न सिर्फ बच्ची को जानते थे, बल्कि परिवार से उनके अच्छे संबंध थे, लेकिन किसी को यह आभास नहीं था कि कोई इतना गिर सकता है। इन संवेदनशील मामलों में परिवार के समक्ष कई चुनौतियां भी थी। घर की इज्जत, अपमान, ताना और सामने पड़ी बेटी की लंबी जिदंगी और आसपास के लोगों का दबाव। इसके बावजूद परिवार के लोगों ने अपराध करने वालों को सजा दिलाने को प्राथमिकता समझी, ताकि कोई और बेटी शिकार न हो सके। परिवारों के अडिग हौसले, पुलिस की सक्रिय विवेचना और अदालत में सशक्त पैरवी का नतीजा यह रहा कि आरोपियों को सजा मिली।
विज्ञापन
-- -
एक साल का लेखा-जोखा
कुल 40 मामलों में दोषियों को सजा मिली
5 मामले ऐसे थे जिसमें 12 साल से कम उम्र की बच्चियां पीड़ित थीं
सभी मामलों में परिवारों ने दबाव में झुकने से किया इन्कार
त्वरित विवेचना और चार्जशीट से मजबूत हुई अभियोजन पक्ष की स्थिति
-- -
कैसे मिली दरिंदों को सजा
अपराधिक मामलों में तेजी से सजा हो सके, इसके लिए कोर्ट की ओर से मुकदमे की सुनवाई तेजी से शुरू हुई। वहीं, जल्द सजा मिल सके, इसके लिए पुलिस विभाग में भी बड़े स्तर पर मॉनिटरिंग की प्रक्रिया शुरू की गई। इसके लिए अलग से मॉनिटरिंग सेल बनाया गया। इसमें एक सेल बनाने के साथ थाना स्तर पर जिम्मेदारी तय की गई। जिला स्तर पर हर थाने तक टाॅप-10 मुकदमे छांटना शुरू किए। उसे टॉप वरीयता में रखकर कोर्ट में केस कहां तक पहुंचा, किसकी गवाही बाकी है, किसका बयान हुआ, चार्ज फ्रेम तैयार करने के साथ, गवाहों से संपर्क किया गया। गवाही के लिए तैयार किया गया। उन्हें पूरी सुरक्षा देने का विश्वास दिया गया। कोर्ट में बयान होने की तिथि तक जिला और थाने स्तर पर उनसे संपर्क स्थापित किया। एसपी और एएसपी की ओर से हर माह मॉनिटरिंग की गई। केस की हिस्ट्री और मुकदमे की स्थिति की आकलन किया गया। वहीं, पहले चरण में एफआईआर में देरी नहीं की गई, मेडिकल, फॉरेंसिक और गवाहों के बयान समय से हुए पीड़ित के बयान को कानूनी प्रक्रिया के तहत सुरक्षित रखा गया, फास्ट ट्रैक सुनवाई से तय समय में फैसला सुनवाया।
-- -
केस ऐसा जिसने हिला दिया
वर्ष 2024 में नगर में ही थाने के पास मोहल्ले में कूड़ा बीनने वाला एक व्यक्ति खेल रही चार और पांच साल की बच्चियों को टॉफी देने की बात कहकर लेकर गया और उनके साथ दरिंदगी की। गंभीर हाल में वह घर पहुंचीं तो परिवार को जानकारी हुई और मामला सामने आते ही पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। संसुगत धारा में मुकदमा दर्ज किया। मामले की सुनवाई चल रही थी। 10 दिसंबर को हुई सुनवाई में दोषी पाए जाने पर अंतिम सांस तक की कारावास और एक लाख जुर्माना की न्यायालय ने सजा सुनवाई।
-- -
पड़ोस में रहने वाले ने की दरिंदगी
वर्ष 2021 में नगर से सटे एक गांव में घर के पास खेल रही तीन साल की बच्ची को पड़ोस में रहने वाला एक व्यक्ति कुछ दिखाने का लालच देकर साथ लेकर चला गया। इसके बाद बच्ची के दरिंदगी की घटना को अंजाम दिया। बच्ची की हालत देखने के बाद परिवार को जानकारी हुई और पता चल गया। इसके बाद पीड़ित की ओर से शिकायत दर्ज कराई गई। बिना डरे और दबाव में आए लड़ाई लड़ी और आरोपी को आजीवन कारावास की कठोर सजा और एक लाख रुपये जुर्माना लगाया गया। इसके अलावा तीन अन्य मामले भी बच्चियों से जुड़े थे।
-- -
बोले जिम्मेदार
अपराधिक मामलों में पीड़ित पक्ष को न्याय मिले और अपराध करने वाले को सजा मिल सके। इसके लिए पुलिस की अलग से मॉनिटरिंग सेल बनाया गया। जहां पर थाना वार मामलों की मॉनिटरिंग होती है। कोर्ट तक पैरवी करने के साथ गवाहों का बयान और सारी प्रक्रिया पूरी कराई जाती है, जिससे सजा मिल रहा है। इसकी समय-समय पर मॉनिटरिंग की जाती है।
डॉ. अभिषेक महाजन, पुलिस अधीक्षक
-- -
मॉनिटरिंग सेल की ओर से हर थाने में टॉप मामलों की लिस्ट बनाई जाती है। उनकी मॉनिटरिंग की जाती है। समय पर साक्ष्य, गवाहों की गवाही होने तक उसके संपर्क में रहकर गवाही कराने की प्रक्रिया पूरी कराई जाती है। सजा होने तक मॉनिटरिंग सेल काम करता है। जिससे मामलों में सजा मिल रही है।
- संतोष कुमार यादव, प्रभारी, मॉनिटरिंग सेल
-- -
विशेषज्ञ ने क्या कहा
अब समाज में बदलाव दिख रहा है। पहले जहां लोकलाज और बदनामी के डर से मामले दबा दिए जाते थे, वहीं अब परिवार न्याय को प्राथमिकता दे रहे हैं। जब वह आगे आ रहे हैं तो पुलिस और न्यायालय की ओर से उन्हें मदद मिल रही है, यही कारण है कि ऐसे मामलों में आरोपी को सजा मिल रही है। यह बदलाव आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित माहौल बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।
डॉ. रघुवर प्रसाद पांडेय, समाजशास्त्री, महिला पीजी कॉलेज बस्ती
विज्ञापन
वर्ष 2016 से अब तक 40 ऐसे मामले हैं, जिनमें नाबालिग को शिकार बनाया गया था। इसमें पीडि़ता न्याय के लिए डटी रही और पुलिस ने इस मामले में निगरानी की। जिला स्तर पर एसपी के दिशा-निर्देश में काम करने वाले मॉनिटरिंग सेल की निगरानी, गवाहों के बयान और समय-समय पर नोटिस, तामिला कराने का प्रयास भी इस न्याय की लड़ाई में अहम रहा है, जिसकी देन रही कि दरिंदों को आखिरी सांस तक सलाखों के पीछे रहने की सजा मिली। वहीं, विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि शुरुआती स्तर पर ही शिकायत दर्ज हो, साक्ष्य सुरक्षित किए जाएं और बयान में कोई लापरवाही न बरती जाए तो सजा की राह मजबूत हो जाती है।
विज्ञापन
आक्रोश से न्याय तक की यात्रा
इन मामलों के सामने आने के बाद जिले आक्रोश व्याप्त हो गया। खासतौर पर पांच ऐसे मामले थे, जिनमें 12 साल से तीन साल तक की बच्चियों को दरिंदों ने अपना शिकार बनाया था। केस सामने आने के बाद हर कोई आक्रोशित हो उठा था। जांच करने वाली पुलिस भी मामला सामने आने के बाद हैरत में पड़ गई। अपराध करने वाले पड़ोस के या फिर गांव के रहने वाले थे। जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले न सिर्फ बच्ची को जानते थे, बल्कि परिवार से उनके अच्छे संबंध थे, लेकिन किसी को यह आभास नहीं था कि कोई इतना गिर सकता है। इन संवेदनशील मामलों में परिवार के समक्ष कई चुनौतियां भी थी। घर की इज्जत, अपमान, ताना और सामने पड़ी बेटी की लंबी जिदंगी और आसपास के लोगों का दबाव। इसके बावजूद परिवार के लोगों ने अपराध करने वालों को सजा दिलाने को प्राथमिकता समझी, ताकि कोई और बेटी शिकार न हो सके। परिवारों के अडिग हौसले, पुलिस की सक्रिय विवेचना और अदालत में सशक्त पैरवी का नतीजा यह रहा कि आरोपियों को सजा मिली।
विज्ञापन
एक साल का लेखा-जोखा
कुल 40 मामलों में दोषियों को सजा मिली
5 मामले ऐसे थे जिसमें 12 साल से कम उम्र की बच्चियां पीड़ित थीं
सभी मामलों में परिवारों ने दबाव में झुकने से किया इन्कार
त्वरित विवेचना और चार्जशीट से मजबूत हुई अभियोजन पक्ष की स्थिति
कैसे मिली दरिंदों को सजा
अपराधिक मामलों में तेजी से सजा हो सके, इसके लिए कोर्ट की ओर से मुकदमे की सुनवाई तेजी से शुरू हुई। वहीं, जल्द सजा मिल सके, इसके लिए पुलिस विभाग में भी बड़े स्तर पर मॉनिटरिंग की प्रक्रिया शुरू की गई। इसके लिए अलग से मॉनिटरिंग सेल बनाया गया। इसमें एक सेल बनाने के साथ थाना स्तर पर जिम्मेदारी तय की गई। जिला स्तर पर हर थाने तक टाॅप-10 मुकदमे छांटना शुरू किए। उसे टॉप वरीयता में रखकर कोर्ट में केस कहां तक पहुंचा, किसकी गवाही बाकी है, किसका बयान हुआ, चार्ज फ्रेम तैयार करने के साथ, गवाहों से संपर्क किया गया। गवाही के लिए तैयार किया गया। उन्हें पूरी सुरक्षा देने का विश्वास दिया गया। कोर्ट में बयान होने की तिथि तक जिला और थाने स्तर पर उनसे संपर्क स्थापित किया। एसपी और एएसपी की ओर से हर माह मॉनिटरिंग की गई। केस की हिस्ट्री और मुकदमे की स्थिति की आकलन किया गया। वहीं, पहले चरण में एफआईआर में देरी नहीं की गई, मेडिकल, फॉरेंसिक और गवाहों के बयान समय से हुए पीड़ित के बयान को कानूनी प्रक्रिया के तहत सुरक्षित रखा गया, फास्ट ट्रैक सुनवाई से तय समय में फैसला सुनवाया।
केस ऐसा जिसने हिला दिया
वर्ष 2024 में नगर में ही थाने के पास मोहल्ले में कूड़ा बीनने वाला एक व्यक्ति खेल रही चार और पांच साल की बच्चियों को टॉफी देने की बात कहकर लेकर गया और उनके साथ दरिंदगी की। गंभीर हाल में वह घर पहुंचीं तो परिवार को जानकारी हुई और मामला सामने आते ही पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। संसुगत धारा में मुकदमा दर्ज किया। मामले की सुनवाई चल रही थी। 10 दिसंबर को हुई सुनवाई में दोषी पाए जाने पर अंतिम सांस तक की कारावास और एक लाख जुर्माना की न्यायालय ने सजा सुनवाई।
पड़ोस में रहने वाले ने की दरिंदगी
वर्ष 2021 में नगर से सटे एक गांव में घर के पास खेल रही तीन साल की बच्ची को पड़ोस में रहने वाला एक व्यक्ति कुछ दिखाने का लालच देकर साथ लेकर चला गया। इसके बाद बच्ची के दरिंदगी की घटना को अंजाम दिया। बच्ची की हालत देखने के बाद परिवार को जानकारी हुई और पता चल गया। इसके बाद पीड़ित की ओर से शिकायत दर्ज कराई गई। बिना डरे और दबाव में आए लड़ाई लड़ी और आरोपी को आजीवन कारावास की कठोर सजा और एक लाख रुपये जुर्माना लगाया गया। इसके अलावा तीन अन्य मामले भी बच्चियों से जुड़े थे।
बोले जिम्मेदार
अपराधिक मामलों में पीड़ित पक्ष को न्याय मिले और अपराध करने वाले को सजा मिल सके। इसके लिए पुलिस की अलग से मॉनिटरिंग सेल बनाया गया। जहां पर थाना वार मामलों की मॉनिटरिंग होती है। कोर्ट तक पैरवी करने के साथ गवाहों का बयान और सारी प्रक्रिया पूरी कराई जाती है, जिससे सजा मिल रहा है। इसकी समय-समय पर मॉनिटरिंग की जाती है।
डॉ. अभिषेक महाजन, पुलिस अधीक्षक
मॉनिटरिंग सेल की ओर से हर थाने में टॉप मामलों की लिस्ट बनाई जाती है। उनकी मॉनिटरिंग की जाती है। समय पर साक्ष्य, गवाहों की गवाही होने तक उसके संपर्क में रहकर गवाही कराने की प्रक्रिया पूरी कराई जाती है। सजा होने तक मॉनिटरिंग सेल काम करता है। जिससे मामलों में सजा मिल रही है।
- संतोष कुमार यादव, प्रभारी, मॉनिटरिंग सेल
विशेषज्ञ ने क्या कहा
अब समाज में बदलाव दिख रहा है। पहले जहां लोकलाज और बदनामी के डर से मामले दबा दिए जाते थे, वहीं अब परिवार न्याय को प्राथमिकता दे रहे हैं। जब वह आगे आ रहे हैं तो पुलिस और न्यायालय की ओर से उन्हें मदद मिल रही है, यही कारण है कि ऐसे मामलों में आरोपी को सजा मिल रही है। यह बदलाव आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित माहौल बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।
डॉ. रघुवर प्रसाद पांडेय, समाजशास्त्री, महिला पीजी कॉलेज बस्ती