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Siddharthnagar News: रहें सावधान! ज्यादा चमकदार दाल से कहीं मुश्किल में न पड़ जाए जान
Sat, 20 Dec 2025 10:41 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Sat, 20 Dec 2025 10:41 PM IST
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सिद्धार्थनगर। थाली की सबसे भरोसेमंद मानी जाने वाली दाल पर भी मिलावटखोरों की नजर पड़ चुकी है। मुनाफाखोरी के लिए धंधेबाज दाल में भी मिलावट करने लगे हैं। बलरामपुर और श्रावस्ती से खेसारी की दाल की आपूर्ति जिले की दुकानों पर करने की बात सामने आ चुकी है। जिसे अरहर कहकर खपाया जा रहा है।
अब गोरखपुर की साहबगंज मंडी से आने वाली दालों में चना को रंगकर दाल के रूप में खपाने की आशंका जताई जा रही है, क्योंकि गोरखपुर में चना में कलर करके चमकदार बनाते हुए बिक्री करने का मामला सामने आ चुका है।
सस्ती खरीद और ज्यादा मुनाफे के लालच में धंधेबाज लोगों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं, जबकि खाद विभाग की जांच में पहले ही कई नमूने अधोमानक पाए जा चुके हैं। इसमें ए ग्रेड रेट तो लेते हैं, लेकिन 5 से 10 प्रतिशत टूटा हुआ मिलाकर बिक्री करके ग्राहकों का आर्थिक शोषण करने का मामला सामने आ चुका है। जिस पर खाद्य सुरक्षा विभाग की ओर से जुर्माना की कार्रवाई की जा चुकी है।
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कारोबारियों के मुताबिक जिले में दाल की करीब 70 प्रतिशत सप्लाई गोरखपुर की साहबगंज मंडी से होती है। पहले जहां खेसारी दाल की सीधी खपत होती थी, अब उसी मांग का फायदा उठाकर रंगे हुए चना को बेचा जा रहा है। बाहर से देखने में चमकदार दाल ग्राहक को आकर्षित करती है।
वहीं स्वास्थ्य विशेषज्ञ का कहना है कि यही चमक देखकर सेवन करना आगे चलकर किडनी, लिवर और पाचन तंत्र के लिए खतरा बन सकती है।
कैसे होता है खेसारी दाल का खेल : शहर के दुकानदार अजीत मोदनवाल के मुताबिक खेसारी ऐसी दाल है, जिसे अरहर और चना दोनों में खपाया जाता है। अब इसकी खेती बड़े पैनामे पर होने लगी है। बलरामपुर और श्रावस्ती के लोग दुकानों से संपर्क करते हैं, इसके बाद बाइक और छोटे पिकअप के जरिए सप्लाई कर देते हैं। 20 से 30 रुपये प्रति किलो की दर से इसमें कमाई होती है।
सीजन आने के बाद तो ग्रामीण क्षेत्र में अरहर की दाल बताते हुए बाइक और साइकिल से बिक्री होती है। वहीं, मिलावटी की बात करें तो चना को केमिकल डाई से रंगकर चमकदार बनाया जाता है। इसे अगर हाथ में लेकर रगड़ें तो कलर छूट जाता है, जिससे पहचान हो जाती है।
वहीं, अगर भिगोते हैं तो उसमें कलर आ जाता है। इस प्रकार से इसकी पहचान की जा सकती है। वहीं, दाल के एक थोक 230 ने बताया कि ग्राहक कम रेट वाले दाल ही अधिक लेते हैं। इसलिए तीन से चार ग्रेड का एक ही दाल आता है और खप जाता है। पॉलिश से दाल में अतिरिक्त चमक लाई जाती है। खाने के दौरान भी इसका पता नहीं चलता है।
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अब गोरखपुर की साहबगंज मंडी से आने वाली दालों में चना को रंगकर दाल के रूप में खपाने की आशंका जताई जा रही है, क्योंकि गोरखपुर में चना में कलर करके चमकदार बनाते हुए बिक्री करने का मामला सामने आ चुका है।
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सस्ती खरीद और ज्यादा मुनाफे के लालच में धंधेबाज लोगों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं, जबकि खाद विभाग की जांच में पहले ही कई नमूने अधोमानक पाए जा चुके हैं। इसमें ए ग्रेड रेट तो लेते हैं, लेकिन 5 से 10 प्रतिशत टूटा हुआ मिलाकर बिक्री करके ग्राहकों का आर्थिक शोषण करने का मामला सामने आ चुका है। जिस पर खाद्य सुरक्षा विभाग की ओर से जुर्माना की कार्रवाई की जा चुकी है।
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कारोबारियों के मुताबिक जिले में दाल की करीब 70 प्रतिशत सप्लाई गोरखपुर की साहबगंज मंडी से होती है। पहले जहां खेसारी दाल की सीधी खपत होती थी, अब उसी मांग का फायदा उठाकर रंगे हुए चना को बेचा जा रहा है। बाहर से देखने में चमकदार दाल ग्राहक को आकर्षित करती है।
वहीं स्वास्थ्य विशेषज्ञ का कहना है कि यही चमक देखकर सेवन करना आगे चलकर किडनी, लिवर और पाचन तंत्र के लिए खतरा बन सकती है।
कैसे होता है खेसारी दाल का खेल : शहर के दुकानदार अजीत मोदनवाल के मुताबिक खेसारी ऐसी दाल है, जिसे अरहर और चना दोनों में खपाया जाता है। अब इसकी खेती बड़े पैनामे पर होने लगी है। बलरामपुर और श्रावस्ती के लोग दुकानों से संपर्क करते हैं, इसके बाद बाइक और छोटे पिकअप के जरिए सप्लाई कर देते हैं। 20 से 30 रुपये प्रति किलो की दर से इसमें कमाई होती है।
सीजन आने के बाद तो ग्रामीण क्षेत्र में अरहर की दाल बताते हुए बाइक और साइकिल से बिक्री होती है। वहीं, मिलावटी की बात करें तो चना को केमिकल डाई से रंगकर चमकदार बनाया जाता है। इसे अगर हाथ में लेकर रगड़ें तो कलर छूट जाता है, जिससे पहचान हो जाती है।
वहीं, अगर भिगोते हैं तो उसमें कलर आ जाता है। इस प्रकार से इसकी पहचान की जा सकती है। वहीं, दाल के एक थोक 230 ने बताया कि ग्राहक कम रेट वाले दाल ही अधिक लेते हैं। इसलिए तीन से चार ग्रेड का एक ही दाल आता है और खप जाता है। पॉलिश से दाल में अतिरिक्त चमक लाई जाती है। खाने के दौरान भी इसका पता नहीं चलता है।