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Siddharthnagar News: उपनिवेश काल में भारतीय भाषाओं को हीन दिखाने का हुआ था प्रयास

Sun, 08 Feb 2026 12:02 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर Updated Sun, 08 Feb 2026 12:02 AM IST
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Siddharthnagar News: A national seminar was organized at Siddharth University
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबो​धित करते मुख्य वक्ता दिल्ली विश्व
सिद्धार्थनगर। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु में भारतीय भाषा परिवार विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ। केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय के भारतीय भाषा समिति तथा सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में मुख्य वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. रमेश चंद शर्मा रहे।
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उन्होंने कहा कि उपनिवेश काल में भारतीय भाषाओं को योजनाबद्ध ढंग से हीन दिखाने का प्रयास किया गया। भारतीय भाषाएं भारतीय ज्ञान-परंपरा की वाहक हैं, लेकिन औपनिवेशिक व पश्च औपनिवेशिक लेखन में इन्हें कमतर सिद्ध करने का प्रयास हुआ।
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उन्होंने कहा कि दर्शन, न्याय और व्याकरण भाषा अध्ययन की तीनों परंपराएं भारत में ही विकसित हुई हैं। बहुभाषिकता और भाषिक विविधता भारतीय सभ्यता की विशिष्ट पहचान है, जैसी व्यवस्था विश्व के अन्य देशों में दुर्लभ है। उन्होंने भारतीय भाषाओं की पांच परंपराओं का उल्लेख करते हुए भाषा को अर्थव्यवस्था का भी सशक्त आधार बताया। प्रो. निरंजन सहाय ने कहा कि भाषा के प्रति भारतीय दृष्टिकोण व्यापक और समावेशी रहा है, जबकि पश्चिम का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत संकुचित रहा है। प्रो. नीता यादव ने कहा कि भारतीय भाषा-परिवार विषय पर प्रकाशित दोनों पुस्तकें भारत को जोड़ने का महत्वपूर्ण उपक्रम है। अंग्रेजों ने भाषा सहित अनेक माध्यमों से हमें विभाजित करने का प्रयास किया, लेकिन आज आत्मचिंतन करते हुए हमें फिर अपनी परंपरागत विचार-श्रेणियों की ओर लौटने की आवश्यकता है।
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डॉ. सत्य प्रकाश पाल ने कहा कि भारतीय भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि जोड़ने की संस्कृति सिखाती हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के डॉ. बलजीत कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि भारतीय भाषा परिवार पर आधारित पुस्तकें पहले हिंदी में आनी चाहिए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज के प्रो. अमरेंद्र त्रिपाठी ने कहा कि भाषा के आधार पर उत्पन्न विवादों को मिटाने का प्रयास इन पुस्तकों में किया गया है।
समापन समारोह के मुख्य अतिथि गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. विमलेश कुमार मिश्र ने कहा कि ‘भारतीय भाषा परिवार’ भारत की समावेशी संस्कृति को उजागर करने वाली पुस्तकों की शृंखला है। यह पुस्तकें मैकाले और मैक्स मूलर जैसे विचारकों द्वारा स्थापित औपनिवेशिक भाषा दृष्टि का उन्हीं की भाषा में उत्तर प्रस्तुत करती हैं।

गोष्ठी में गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. प्रत्यूष दुबे, हिंदी विभाग के प्रो. सत्येंद्र कुमार दुबे, डॉ. रेनू त्रिपाठी, प्रो. हरीश कुमार शर्मा, डॉ. राम पांडेय, प्रो. दीपक बाबू, प्रो. सुनीता त्रिपाठी, डॉ. सच्चिदानंद चौबे, डॉ. आशुतोष श्रीवास्तव, डॉ. रविकांत शुक्ला उपस्थित रहे। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. जय सिंह यादव तथा समापन सत्र का संचालन डॉ. हृदयकांत पांडेय ने किया।
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