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Siddharthnagar News: नारद मोह का मंचन देख मुग्ध हुए दर्शक
Sat, 11 Nov 2023 10:38 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Sat, 11 Nov 2023 10:38 PM IST
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भनवापुर ब्लॉक क्षेत्र के सहिजवार में नौ दिवसीय रामलीला
संवाद न्यूज एजेंसी
भनवापुर। स्थानीय ब्लॉक क्षेत्र के सहिजवार गांव में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम लीला समारोह के पहले दिन शुक्रवार रात स्थानीय कलाकारों ने जहां नारदमोह का मंचन कर दर्शकों को मुग्ध कर दिया। वहीं, श्रीराम जन्म की लीला का मंचन होते ही पूरा पंडाल सोहर व मंगल गीतों से राम मय हो गया।
कलाकारों ने मंचन में प्रथम दर्शन में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती की। इसके बाद नारद मोह की लीला प्रारंभ हुआ। नारद जी एक उत्तम स्थान पर बैठकर भगवान हरि की तपस्या करने लगते हैं। इससे भगवान इंद्र का सिंहासन हिलने लगता है। इंद्र को मालूम पड़ता है कि नारद जी की तपस्या से मेरा सिंहासन हिल रहा है। उनकी तपस्या भंग करने के लिए इंद्र देव अप्सराओं को भेजते हैं।
रंभा, उर्वशी आदि अप्सराएं भी नारद जी की तपस्या भंग नहीं कर पातीं। उसके बाद भगवान इंद्र कामदेव को भेजते हैं। कामदेव नारद जी की तपस्या को भंग नहीं कर पाते हैं। तभी नारद जी अपनी तपस्या को स्वयं विराम देते हैं और कामदेव को माफ कर देते हैं।
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इस कारण नारद जी को अभिमान आ जाता है कि मैंने काम, क्रोध जीत लिया। जबकि भगवान शंकर भी क्रोध पर विजय नहीं कर पाए थे। भगवान अपने भक्तों में कभी भी अभिमानी होना नहीं देखते। भगवान विष्णु के प्रकट होने पर नारद ने उनसे हरि रूप मांगा तो उन्होंने नारद के अभिमान को खत्म करने के लिए हरि रूप की जगह बंदर का रूप प्रदान किया।
वही रूप लेकर वह स्वयंवर में गए, जहां उनका लोगों ने खूब मजाक उड़ाया। तब उनको पता चला कि उनका रूप तो बंदर का है। इसके आगे भी कलाकारों ने लीला का मंचन किया। इस अवसर पर रामप्रताप चौधरी, प्रदीप चौधरी, उत्तम प्रसाद, अंकित, मनीष कुमार आदि मौजूद रहे।
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भनवापुर ब्लॉक क्षेत्र के सहिजवार में नौ दिवसीय रामलीला
संवाद न्यूज एजेंसी
भनवापुर। स्थानीय ब्लॉक क्षेत्र के सहिजवार गांव में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम लीला समारोह के पहले दिन शुक्रवार रात स्थानीय कलाकारों ने जहां नारदमोह का मंचन कर दर्शकों को मुग्ध कर दिया। वहीं, श्रीराम जन्म की लीला का मंचन होते ही पूरा पंडाल सोहर व मंगल गीतों से राम मय हो गया।
कलाकारों ने मंचन में प्रथम दर्शन में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती की। इसके बाद नारद मोह की लीला प्रारंभ हुआ। नारद जी एक उत्तम स्थान पर बैठकर भगवान हरि की तपस्या करने लगते हैं। इससे भगवान इंद्र का सिंहासन हिलने लगता है। इंद्र को मालूम पड़ता है कि नारद जी की तपस्या से मेरा सिंहासन हिल रहा है। उनकी तपस्या भंग करने के लिए इंद्र देव अप्सराओं को भेजते हैं।
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रंभा, उर्वशी आदि अप्सराएं भी नारद जी की तपस्या भंग नहीं कर पातीं। उसके बाद भगवान इंद्र कामदेव को भेजते हैं। कामदेव नारद जी की तपस्या को भंग नहीं कर पाते हैं। तभी नारद जी अपनी तपस्या को स्वयं विराम देते हैं और कामदेव को माफ कर देते हैं।
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इस कारण नारद जी को अभिमान आ जाता है कि मैंने काम, क्रोध जीत लिया। जबकि भगवान शंकर भी क्रोध पर विजय नहीं कर पाए थे। भगवान अपने भक्तों में कभी भी अभिमानी होना नहीं देखते। भगवान विष्णु के प्रकट होने पर नारद ने उनसे हरि रूप मांगा तो उन्होंने नारद के अभिमान को खत्म करने के लिए हरि रूप की जगह बंदर का रूप प्रदान किया।
वही रूप लेकर वह स्वयंवर में गए, जहां उनका लोगों ने खूब मजाक उड़ाया। तब उनको पता चला कि उनका रूप तो बंदर का है। इसके आगे भी कलाकारों ने लीला का मंचन किया। इस अवसर पर रामप्रताप चौधरी, प्रदीप चौधरी, उत्तम प्रसाद, अंकित, मनीष कुमार आदि मौजूद रहे।