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अक्षय तृतीया पर पूजन, दान-पुण्य का मिलता है अक्षय फल
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अक्षय तृतीया पर दान-पुण्य से मिलता है अक्षय फल
14 की सुबह 3:26 से 15 की सुबह 5:08 बजे तक रहेगी अक्षय तृतीया
संवाद न्यूज एजेंसी
डुमरियागंज। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया कहते हैं। पं. राकेश शास्त्री के अनुसार इस दिन स्नान-दान, व्रत व पूजन का फल अक्षय हो जाता है। अक्षय तृतीया इस बार 14 मई शुक्रवार की भोर में 3:26 बजे लग रही है, जो 15 मई शनिवार की भोर 5:08 बजे तक रहेगी।
शास्त्रों में अक्षय तृतीया को सनातन धर्म के लोगों का प्रमुख पर्व बताया गया है। पंडित राकेश शास्त्री के अनुसार इस तिथि पर पूजन, दान आदि समस्त कर्मों का फल अक्षय हो जाता है। इस कारण ही इस व्रत पर्व को शास्त्रों में अक्षय कहा गया। किसी भी क्षेत्र में सफलता कामना से व्रत, दान में जल पूरित कलश, छाता, हाथ वाला पंखा व्यंजनादि जरूरतमंद या पुरोहित को दान में देना चाहिए। परंपरा अनुसार तिथि पर स्वर्णादि समेत स्थिर लक्ष्मी क्रय का प्रचलन बढ़ा है। कारण यह कि इस दिन कोई शुभ कार्य दान के साथ स्वर्णादि खरीदने पर वह भी अक्षय हो जाता है। वैशाख शुक्ल तृतीया को ही भगवान परशुराम व हयग्रीव की जयंती भी मनाई जाती है।
अपुच्छ मुहूर्त में ही हुआ था त्रेतायुग का आरंभ
पं. राकेश शास्त्री के अनुसार अक्षय तृतीया पर किसी भी शुभ कार्य को किया जा सकता है। इस दिन अपुच्छ मुहूर्त माना जाता है। इस तिथि में ही त्रेता युग आरंभ हुआ। वहीं उत्तराखंड के अधिष्ठाता बद्रीनाथ का ग्रीष्मकालीन पट इस दिन खुलता है। काशी में गंगा स्नान के साथ त्रिलोचन महादेव की यात्रा, पूजन-वंदन का महत्व है। हालांकि इस बार कोरोना संकट के कारण घर-आंगन में ही स्नान करना श्रेयष्कर है।
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इस विधिविधान से करें पूजन
अक्षय तृतीया पर व्रतियों को प्रात: स्नानादि कर पूजन और संकल्प लेना चाहिए। भगवान को पंचामृत से स्नान, सुगंधित फूल-माला अर्पण, नैवेद्य में नर नारायण के निमित्त जौ व गेहूं का सत्तू, परशुराम के निमित्त कोमल ककड़ी व हयग्रीव के निमित्त भीगी चने की दाल अर्पित कर व्रत आरंभ करना चाहिए। भगवान श्रीहरि को केसर युक्त श्वेत चंदन का लेप अर्पित करना चाहिए।
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14 की सुबह 3:26 से 15 की सुबह 5:08 बजे तक रहेगी अक्षय तृतीया
संवाद न्यूज एजेंसी
डुमरियागंज। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया कहते हैं। पं. राकेश शास्त्री के अनुसार इस दिन स्नान-दान, व्रत व पूजन का फल अक्षय हो जाता है। अक्षय तृतीया इस बार 14 मई शुक्रवार की भोर में 3:26 बजे लग रही है, जो 15 मई शनिवार की भोर 5:08 बजे तक रहेगी।
शास्त्रों में अक्षय तृतीया को सनातन धर्म के लोगों का प्रमुख पर्व बताया गया है। पंडित राकेश शास्त्री के अनुसार इस तिथि पर पूजन, दान आदि समस्त कर्मों का फल अक्षय हो जाता है। इस कारण ही इस व्रत पर्व को शास्त्रों में अक्षय कहा गया। किसी भी क्षेत्र में सफलता कामना से व्रत, दान में जल पूरित कलश, छाता, हाथ वाला पंखा व्यंजनादि जरूरतमंद या पुरोहित को दान में देना चाहिए। परंपरा अनुसार तिथि पर स्वर्णादि समेत स्थिर लक्ष्मी क्रय का प्रचलन बढ़ा है। कारण यह कि इस दिन कोई शुभ कार्य दान के साथ स्वर्णादि खरीदने पर वह भी अक्षय हो जाता है। वैशाख शुक्ल तृतीया को ही भगवान परशुराम व हयग्रीव की जयंती भी मनाई जाती है।
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अपुच्छ मुहूर्त में ही हुआ था त्रेतायुग का आरंभ
पं. राकेश शास्त्री के अनुसार अक्षय तृतीया पर किसी भी शुभ कार्य को किया जा सकता है। इस दिन अपुच्छ मुहूर्त माना जाता है। इस तिथि में ही त्रेता युग आरंभ हुआ। वहीं उत्तराखंड के अधिष्ठाता बद्रीनाथ का ग्रीष्मकालीन पट इस दिन खुलता है। काशी में गंगा स्नान के साथ त्रिलोचन महादेव की यात्रा, पूजन-वंदन का महत्व है। हालांकि इस बार कोरोना संकट के कारण घर-आंगन में ही स्नान करना श्रेयष्कर है।
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इस विधिविधान से करें पूजन
अक्षय तृतीया पर व्रतियों को प्रात: स्नानादि कर पूजन और संकल्प लेना चाहिए। भगवान को पंचामृत से स्नान, सुगंधित फूल-माला अर्पण, नैवेद्य में नर नारायण के निमित्त जौ व गेहूं का सत्तू, परशुराम के निमित्त कोमल ककड़ी व हयग्रीव के निमित्त भीगी चने की दाल अर्पित कर व्रत आरंभ करना चाहिए। भगवान श्रीहरि को केसर युक्त श्वेत चंदन का लेप अर्पित करना चाहिए।