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Siddharthnagar News: कमीशन के खेल में मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़, सिस्टम की लापरवाही से आफत
Sat, 03 Oct 2026 03:00 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Sat, 03 Oct 2026 03:00 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। सिस्टम की लाचारी और विभाग में मरीज माफियाओं की सेंधमारी जरूरतमंदों की सांसों को छीन रहा है। अवैध रूप से संचालित अस्पताल और जांच सेंटर में इलाज में होने वाली लापरवाही में हर माह किसी ने किसी की जान जा रही है तो किसी मरीज की जान पर बन आ रही है। मरीज की जान भी गई तो जुर्माना भरकर अवैध रूप से संचालित यह जांच सेंटर, अस्पताल और क्लीनिक फिर संचालित होने लग रहे हैं।
पिछले एक पखवारे में दो अलग-अलग अस्पतालों में गलत इलाज के गंभीर आरोप लगे। एक मामले में प्रसूता की जान चली गई, जबकि दूसरे में इलाज के दौरान गर्भपात होने का मामला सामने आया। परिवार खोकर गरीब पीड़ित कार्रवाई के लिए आगे आवाज नहीं उठा पाया।
सीएमओ ने खुद संज्ञान में लेकर जांच कमेटी तो बनाई गई, लेकिन अभी तक रिपोर्ट और कार्रवाई दूर की बात है। वहीं, दो अस्पतालों में बिना लाइसेंस के अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालित किए जा रहे थे। इन घटनाओं ने न केवल निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
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समय-समय पर निजी अस्पतालों और जांच केंद्रों की जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश के बावजूद कई स्थानों पर नियमों को दरकिनार कर अवैध तरीके से इलाज और जांच का काम जारी है। हाल के दिनों में सामने आए चारों मामलों ने पूरे जिले में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब विभागीय स्तर पर निगरानी और कार्रवाई के निर्देश दिए जाते हैं तो फिर अवैध रूप से अस्पताल और जांच केंद्र कैसे संचालित हो रहे हैं।
सेंधमारी से नहीं टूट रहा अवैध संचालन का सिंडिकेट : विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कई निजी अस्पतालों में मरीजों को कमीशन के आधार पर जांच केंद्रों और दूसरे अस्पतालों में भेजा जाता है।
इस प्रक्रिया में मरीजों के इलाज की गुणवत्ता से ज्यादा महत्व आर्थिक लाभ को दिया जाता है। यही वजह है कि कई बार बिना पर्याप्त संसाधन और विशेषज्ञता के भी इलाज शुरू कर दिया जाता है, जिससे मरीजों की जान जोखिम में पड़ जाती है। जब जान जाती है तो शोर मचता है, जांच होती है फिर किसी दूसरे नाम या पंजीकरण करवाकर अस्पताल का संचालन शुरू कर दिया जाता है।
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सिद्धार्थनगर। सिस्टम की लाचारी और विभाग में मरीज माफियाओं की सेंधमारी जरूरतमंदों की सांसों को छीन रहा है। अवैध रूप से संचालित अस्पताल और जांच सेंटर में इलाज में होने वाली लापरवाही में हर माह किसी ने किसी की जान जा रही है तो किसी मरीज की जान पर बन आ रही है। मरीज की जान भी गई तो जुर्माना भरकर अवैध रूप से संचालित यह जांच सेंटर, अस्पताल और क्लीनिक फिर संचालित होने लग रहे हैं।
पिछले एक पखवारे में दो अलग-अलग अस्पतालों में गलत इलाज के गंभीर आरोप लगे। एक मामले में प्रसूता की जान चली गई, जबकि दूसरे में इलाज के दौरान गर्भपात होने का मामला सामने आया। परिवार खोकर गरीब पीड़ित कार्रवाई के लिए आगे आवाज नहीं उठा पाया।
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सीएमओ ने खुद संज्ञान में लेकर जांच कमेटी तो बनाई गई, लेकिन अभी तक रिपोर्ट और कार्रवाई दूर की बात है। वहीं, दो अस्पतालों में बिना लाइसेंस के अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालित किए जा रहे थे। इन घटनाओं ने न केवल निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
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समय-समय पर निजी अस्पतालों और जांच केंद्रों की जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश के बावजूद कई स्थानों पर नियमों को दरकिनार कर अवैध तरीके से इलाज और जांच का काम जारी है। हाल के दिनों में सामने आए चारों मामलों ने पूरे जिले में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोलकर रख दी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब विभागीय स्तर पर निगरानी और कार्रवाई के निर्देश दिए जाते हैं तो फिर अवैध रूप से अस्पताल और जांच केंद्र कैसे संचालित हो रहे हैं।
सेंधमारी से नहीं टूट रहा अवैध संचालन का सिंडिकेट : विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कई निजी अस्पतालों में मरीजों को कमीशन के आधार पर जांच केंद्रों और दूसरे अस्पतालों में भेजा जाता है।
इस प्रक्रिया में मरीजों के इलाज की गुणवत्ता से ज्यादा महत्व आर्थिक लाभ को दिया जाता है। यही वजह है कि कई बार बिना पर्याप्त संसाधन और विशेषज्ञता के भी इलाज शुरू कर दिया जाता है, जिससे मरीजों की जान जोखिम में पड़ जाती है। जब जान जाती है तो शोर मचता है, जांच होती है फिर किसी दूसरे नाम या पंजीकरण करवाकर अस्पताल का संचालन शुरू कर दिया जाता है।