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शहादत देकर इमाम हुसैन ने बचाई इंसानियत : मौलाना
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हल्लौर स्थित इमामबाड़ा हुसैनिया बाबुल में मजलिस को संबोधित करते मौलाना मो. मोहसिन। संवाद
- फोटो : SIDDHARTHNAGAR
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शहादत देकर इमाम हुसैन ने बचाई इंसानियत : मौलाना
डुमरियागंज। शहादत-ए-इमाम हुसैन (अलै.) से हमें सब्र, वफा, हक और सच्चाई के रास्ते पर चलने का सबक मिलता है। इमाम हुसैन ने शहादत देकर इंसानियत और इस्लाम को बचाया। पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद साहब अल्लाह की ओर से तमाम इंसानों के लिए रसूल बनकर आए। ये बातें मौलाना मोहम्मद मोहसिन प्रधानाचार्य वसीका अरबी कॉलेज फैजाबाद ने शनिवार की रात हल्लौर स्थित इमामबाड़ा हुसैनिया बाबुल में अंजुमन हुसैनिया मातम की ओर से आयोजित दसवीं मजलिस में कहीं।
उन्होंने कहा कि सन 61 हिजरी में सुन्नते रसूल शरीयत ए मोहम्मदी को यजीद ने बदलने की कोशिश की। तब नवासे रसूल हजरत इमाम हुसैन ने अपने परिजनों और साथियों के साथ कर्बला में शहीद होकर दीन-ए-इस्लाम को बचाया। समझाया कि इस्लाम सिर्फ हुकूमत करने का नाम नहीं है, वक्त पड़ने पर कुर्बानी भी देनी होती है।
उन्होंने कहा कि शहादत-ए-हुसैन से इस्लाम भी बचा और इंसानियत भी। यही वजह है कि हर कौम और मिल्लत इमाम हुसैन से मोहब्बत करती है। जरूरी है कि इंसानियत को बचाने के लिए कर्बला वालों का पैगाम आम किया जाए। मौलाना ने मजलिस के दौरान सभी लोगों के साथ अच्छे से पेश आने और मेहमाननवाजी (अतिथियों के सम्मान) पर भी जोर दिया। हर कौम और धर्म में मेहमान के साथ अच्छे से पेश आने की सीख दी गई है। आखिर में मौलाना ने हजरत इमाम हुसैन की शहादत को बयान किया तो मजलिस हाय हुसैन, की सदा बुलंद करके रोने लगी। मरसिया हैदरे कर्रार और उनके सहयोगी ने पढ़ा।
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इस दौरान मौलाना मोहम्मद हसन, मौलाना नेहाल, काजिम मेहंदी, प्रिंस अंजुम कदर, तनवीर हसन, अकबर मेहंदी, शान, मोजिज, सीमाब हैदर, आरजू आदि मौजूद रहे।
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डुमरियागंज। शहादत-ए-इमाम हुसैन (अलै.) से हमें सब्र, वफा, हक और सच्चाई के रास्ते पर चलने का सबक मिलता है। इमाम हुसैन ने शहादत देकर इंसानियत और इस्लाम को बचाया। पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद साहब अल्लाह की ओर से तमाम इंसानों के लिए रसूल बनकर आए। ये बातें मौलाना मोहम्मद मोहसिन प्रधानाचार्य वसीका अरबी कॉलेज फैजाबाद ने शनिवार की रात हल्लौर स्थित इमामबाड़ा हुसैनिया बाबुल में अंजुमन हुसैनिया मातम की ओर से आयोजित दसवीं मजलिस में कहीं।
उन्होंने कहा कि सन 61 हिजरी में सुन्नते रसूल शरीयत ए मोहम्मदी को यजीद ने बदलने की कोशिश की। तब नवासे रसूल हजरत इमाम हुसैन ने अपने परिजनों और साथियों के साथ कर्बला में शहीद होकर दीन-ए-इस्लाम को बचाया। समझाया कि इस्लाम सिर्फ हुकूमत करने का नाम नहीं है, वक्त पड़ने पर कुर्बानी भी देनी होती है।
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उन्होंने कहा कि शहादत-ए-हुसैन से इस्लाम भी बचा और इंसानियत भी। यही वजह है कि हर कौम और मिल्लत इमाम हुसैन से मोहब्बत करती है। जरूरी है कि इंसानियत को बचाने के लिए कर्बला वालों का पैगाम आम किया जाए। मौलाना ने मजलिस के दौरान सभी लोगों के साथ अच्छे से पेश आने और मेहमाननवाजी (अतिथियों के सम्मान) पर भी जोर दिया। हर कौम और धर्म में मेहमान के साथ अच्छे से पेश आने की सीख दी गई है। आखिर में मौलाना ने हजरत इमाम हुसैन की शहादत को बयान किया तो मजलिस हाय हुसैन, की सदा बुलंद करके रोने लगी। मरसिया हैदरे कर्रार और उनके सहयोगी ने पढ़ा।
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इस दौरान मौलाना मोहम्मद हसन, मौलाना नेहाल, काजिम मेहंदी, प्रिंस अंजुम कदर, तनवीर हसन, अकबर मेहंदी, शान, मोजिज, सीमाब हैदर, आरजू आदि मौजूद रहे।