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हनुमान जी ने राम नाम के सहारे पार लांघा समुद्र
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तुलसियापुर के घोरही उर्फ रौनिहवा में आयोजित श्रीरामकथा के दौरान कार्यक्रम का मंचन करते कलाकार।
- फोटो : SIDDHARTHNAGAR
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हनुमान जी ने राम नाम के सहारे पार लांघा समुद्र
रौनिहवा में आयोजित श्रीरामकथा के दौरान कलाकारों ने निकाली झांकी
तुलसियापुर। कलियुग में राम नाम के सहारे भवसागर पार किया जा सकता है। हनुमान जी ने भी राम नाम के सहारे समुद्र पार किया था। कथावाचक प्रेममूर्ति संत बलराम दास ने बढ़नी ब्लॉक के घोरही उर्फ रौनिहवा में आयोजित श्रीरामकथा के दूसरे दिन रविवार को प्रवचन में ये बातें कहीं।
संगीतमय कथा में बलराम दास जब मानस की चौपाइयां गाने लगे तो पूरा पंडाल उनके सुर में सुर मिलाने लगा। उन्होंने कहा कि पुण्य के कई रूप हैं। कथा सुनो वह पुण्य है, दया करो यह भी पुण्य है। शंकर मत के अनुसार, संसार में पुण्य के दो स्वरूप हैं। एक पुण्य देने वाला और दूसरा पाप हरने वाला। रामचरित मानस में कहा गया है कि जगत में एक मात्र पुण्य विप्र की पूजा है।
उन्होंने कहा कि शारीरिक श्रम जरूरी है, क्योंकि मृत्यु का दूसरा रूप आलस्य है। गुरु के सानिध्य में साधना करनी चाहिए। पूजा का मतलब चंदन लगाना नहीं, बल्कि ब्राह्मण सेवा है। ब्राह्मण का धर्म है पढ़ना-पढ़ाना। इस दौरान कलाकारों ने शिव-पार्वती विवाह की झांकी निकाली।
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इस दौरान यज्ञ आयोजक राहुल मिश्र वैदिक, बीडीसी सदस्य दुर्गेश पांडेय, शैलेंद्र पांडेय, अखिलेश पांडेय, संदीप पांडेय, राधा कृष्ण पांडेय, सूरज, राजन आदि मौजूद थे।
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रौनिहवा में आयोजित श्रीरामकथा के दौरान कलाकारों ने निकाली झांकी
तुलसियापुर। कलियुग में राम नाम के सहारे भवसागर पार किया जा सकता है। हनुमान जी ने भी राम नाम के सहारे समुद्र पार किया था। कथावाचक प्रेममूर्ति संत बलराम दास ने बढ़नी ब्लॉक के घोरही उर्फ रौनिहवा में आयोजित श्रीरामकथा के दूसरे दिन रविवार को प्रवचन में ये बातें कहीं।
संगीतमय कथा में बलराम दास जब मानस की चौपाइयां गाने लगे तो पूरा पंडाल उनके सुर में सुर मिलाने लगा। उन्होंने कहा कि पुण्य के कई रूप हैं। कथा सुनो वह पुण्य है, दया करो यह भी पुण्य है। शंकर मत के अनुसार, संसार में पुण्य के दो स्वरूप हैं। एक पुण्य देने वाला और दूसरा पाप हरने वाला। रामचरित मानस में कहा गया है कि जगत में एक मात्र पुण्य विप्र की पूजा है।
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उन्होंने कहा कि शारीरिक श्रम जरूरी है, क्योंकि मृत्यु का दूसरा रूप आलस्य है। गुरु के सानिध्य में साधना करनी चाहिए। पूजा का मतलब चंदन लगाना नहीं, बल्कि ब्राह्मण सेवा है। ब्राह्मण का धर्म है पढ़ना-पढ़ाना। इस दौरान कलाकारों ने शिव-पार्वती विवाह की झांकी निकाली।
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इस दौरान यज्ञ आयोजक राहुल मिश्र वैदिक, बीडीसी सदस्य दुर्गेश पांडेय, शैलेंद्र पांडेय, अखिलेश पांडेय, संदीप पांडेय, राधा कृष्ण पांडेय, सूरज, राजन आदि मौजूद थे।