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Siddharthnagar News: गालापुर की महाकाली करती हैं मुरादें पूरी
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डुमरियागंज क्षेत्र के गालापुर स्थित श्रद्धालुओं की आस्था विश्वास का केंद्र वटवासिनी महाकाली स्थ
शारदीय नवरात्र में दर्शन-पूजन के लिए श्रद्धालुओं की बढ़ेगी भीड़
फोटो-
सभी धर्म के लोगों के आस्था का केंद्र है गालापुर मंदिर
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। डुमरियागंज तहसील क्षेत्र में स्थित सिंह स्थली वटवासिनी गालापुर महाकाली मंदिर से कोई भक्त खाली हाथ नहीं जाता है। यहां पूरे साल भक्तों की भीड़ लगी रहती है। नवरात्र में यहां पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है। शारदीय नवरात्र के चलते महाकाली स्थान की सजावट की गई है।
लाखों लोगों की आस्था के प्रतीक इस धार्मिक एवं पर्यटन स्थल के बारे में किवंदंतिया प्रचलित हैं। लगभग दो हजार साल पहले कलहंस वंश के राजा अपने पुरोहित के साथ पड़ोसी जनपद गोंडा में आए। यहां राज किया। अपना साम्राज्य बढ़ाते हुए वह लटेरा गांव में पहु़ंचे तब यह क्षेत्र स्वतंत्र था। फिर उन्होंने गोंडा से अपनी कुलदेवी को गालापुर गांव में बसाने के लिए पुरोहित के माध्यम से आह्वान किया। घोर तपस्या के बाद माता आने लगीं।
पुरोहित मदार के पेड़ के रूप में कुल देवी को लटेरा गांव की सीमा पर लेकर पहुंचे। उन्होंने राजा को संदेश भेजवाया। तब राजा को मदार के पेड़ के रूप में माता आई हैं, यह विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने नाराज होकर पुरोहित से कहा कि जहां पर हो वहीं रख दो। पुरोहित ने राज की आज्ञा से वहीं रख दिया।
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जैसे ही मदार का पेड़ पृथ्वी से छुआ तो वह स्थान फट गया। वहां पर एक वट वृक्ष निकल आया। आकाशवाणी हुई कि अविश्वास के चलते राजा का विनाश हो गया। यह सुनते ही राजा ने देवी से क्षमा याचना की तब देवी काली ने दर्शन देकर राजा से कहा कि श्राप तो मिथ्या नहीं हो सकता, लेकिन 14 पुश्तों के बाद ही राजा के वंशज राजपाठ पाएंगे। तभी से इस स्थान का महत्व है।
शारदीय व चैत्र नवरात्र में यहां पर विशेष पूजा-अर्चना होती है। यहां पर बस्ती मंडल ही नहीं, अपितु, प्रदेश के श्रद्धालु पूरे साल आते रहते हैं। बताया जाता है कि इस स्थान के प्रति हिंदू ही नहीं मुस्लिमों की भी काफी आस्था है।
सजने लगे मां दुर्गा प्रतिमा पंडाल
पकड़ी बाजार। शारदीय नवरात्र के पहले दिन देवी दुर्गा की प्रतिमाओं को मंंडप में स्थापित करने के लिए शनिवार के दिन ट्राॅली से भक्त ले जाने लगे हैं। क्षेत्र के बभनी, खेतवला, डबरा, भटमला, टडिया, जनकपुर, जोगीबारी आदि जगहों पर देवी दुर्गा की प्रतिमाओं को मंडप में स्थापित करने के लिए गाजे-बाजे के साथ सड़क पर ले जाते भक्त दिखाई दे रहे थे।
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सभी धर्म के लोगों के आस्था का केंद्र है गालापुर मंदिर
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। डुमरियागंज तहसील क्षेत्र में स्थित सिंह स्थली वटवासिनी गालापुर महाकाली मंदिर से कोई भक्त खाली हाथ नहीं जाता है। यहां पूरे साल भक्तों की भीड़ लगी रहती है। नवरात्र में यहां पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है। शारदीय नवरात्र के चलते महाकाली स्थान की सजावट की गई है।
लाखों लोगों की आस्था के प्रतीक इस धार्मिक एवं पर्यटन स्थल के बारे में किवंदंतिया प्रचलित हैं। लगभग दो हजार साल पहले कलहंस वंश के राजा अपने पुरोहित के साथ पड़ोसी जनपद गोंडा में आए। यहां राज किया। अपना साम्राज्य बढ़ाते हुए वह लटेरा गांव में पहु़ंचे तब यह क्षेत्र स्वतंत्र था। फिर उन्होंने गोंडा से अपनी कुलदेवी को गालापुर गांव में बसाने के लिए पुरोहित के माध्यम से आह्वान किया। घोर तपस्या के बाद माता आने लगीं।
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पुरोहित मदार के पेड़ के रूप में कुल देवी को लटेरा गांव की सीमा पर लेकर पहुंचे। उन्होंने राजा को संदेश भेजवाया। तब राजा को मदार के पेड़ के रूप में माता आई हैं, यह विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने नाराज होकर पुरोहित से कहा कि जहां पर हो वहीं रख दो। पुरोहित ने राज की आज्ञा से वहीं रख दिया।
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जैसे ही मदार का पेड़ पृथ्वी से छुआ तो वह स्थान फट गया। वहां पर एक वट वृक्ष निकल आया। आकाशवाणी हुई कि अविश्वास के चलते राजा का विनाश हो गया। यह सुनते ही राजा ने देवी से क्षमा याचना की तब देवी काली ने दर्शन देकर राजा से कहा कि श्राप तो मिथ्या नहीं हो सकता, लेकिन 14 पुश्तों के बाद ही राजा के वंशज राजपाठ पाएंगे। तभी से इस स्थान का महत्व है।
शारदीय व चैत्र नवरात्र में यहां पर विशेष पूजा-अर्चना होती है। यहां पर बस्ती मंडल ही नहीं, अपितु, प्रदेश के श्रद्धालु पूरे साल आते रहते हैं। बताया जाता है कि इस स्थान के प्रति हिंदू ही नहीं मुस्लिमों की भी काफी आस्था है।
सजने लगे मां दुर्गा प्रतिमा पंडाल
पकड़ी बाजार। शारदीय नवरात्र के पहले दिन देवी दुर्गा की प्रतिमाओं को मंंडप में स्थापित करने के लिए शनिवार के दिन ट्राॅली से भक्त ले जाने लगे हैं। क्षेत्र के बभनी, खेतवला, डबरा, भटमला, टडिया, जनकपुर, जोगीबारी आदि जगहों पर देवी दुर्गा की प्रतिमाओं को मंडप में स्थापित करने के लिए गाजे-बाजे के साथ सड़क पर ले जाते भक्त दिखाई दे रहे थे।