फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Siddharthnagar News ›   Facilities are state of the art...Surgery is not being done

Siddharthnagar News: सुविधाएं अत्याधुनिक...नहीं हो पा रही सर्जरी

Sat, 30 Nov 2024 11:52 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर Updated Sat, 30 Nov 2024 11:52 PM IST
विज्ञापन
Facilities are state of the art...Surgery is not being done
मेडिकल कालेज में ​स्थित ओटी। 
सिद्धार्थनगर। माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने का दावा खोखला साबित हो रहा है। बेहोशी के विशेषज्ञ न होने के कारण हर माह 100 से अधिक गले के अंदर घेघा, टांसिल, हड्डी और मांस बढ़ने के ऑपरेशन नहीं हो पा रहे हैं। जांच के बाद ऑपरेशन की स्थिति में मरीजाें को हायर सेंटर भेज दिया जाता है।
विज्ञापन

इसमें अधिकांश मरीज गोरखपुर लखनऊ के बजाए निजी अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। जहां औसतन हर माह में सर्जरी के नाम पर 80 लाख से एक करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं। जबकि, मेडिकल कॉलेज में ईएनटी में सर्जन हैं और सर्जरी में भी सक्षम हैं। सरकारी फीस पर ऑपरेशन हो जाता।
विज्ञापन

ऐसे मरीज निजी अस्पतालों में जा रहे हैं और उनका 40 हजार से डेढ़ लाख रुपये तक खर्च हो जा रहा है। विभाग के मुताबिक गले के अंदर का ऑपरेशन क्रिटिकल होता है। इसमें मरीज को बेहोश करना पड़ता है। यहां पर बेहोशी के विशेषज्ञ ही नहीं हैं। ऐसे में इस तरह के आपरेशन बंद हैं। अगर बेहोशी के डाॅक्टर होते तो मरीजों को काफी सहूलियत मिलती और आर्थिक क्षति से नहीं गुजरना पड़ता।
विज्ञापन
विज्ञापन

माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज के अस्तित्व में आने के बाद यहां पर कई विभागों में डॉक्टरों की तैनाती हुई। संसाधन में भी इजाफा हुआ, लेकिन सुविधा आज भी जिला अस्पताल जितनी मिल रही है। क्योंकि जो जरूरी है, वह काम नहीं हो पा रहा है। मेडिकल कॉलेज में ओपीडी और इमरजेंसी के अलावा सर्जरी की हकीकत क्या है।
इसके बारे में जानने की कोशिश की गई तो मुकम्मल होने के दावा खोखला पाया गया। सर्जरी में जो बेहद जरूरी है और जिसके मरीज अधिक हैं, उसके ऑपरेशन की सुविधा ही नहीं है। ईएनटी (नाक, कान, गला) विभाग में सीएमएस सहित तीन सर्जन हैं, जो ओपीडी के साथ ही सर्जरी भी करते हैं। पर मौजूदा समय में हालात यह है कि इस विभाग में शरीर के बाहर से होने वाला ऑपरेशन हो रहा है।
जैसे कान का पर्दा, कान में संक्रमण और अन्य छोटी समस्या। लेकिन जटिल और सबसे अधिक पाई जाने वाली समस्या गले में गांठ, घेघा सहित गले के अंदर की सर्जरी एकदम ठप है।
उसके ठप होने के पीछे जब कारण जानने की कोशिश की गई तो पता चला कि इसके लिए बेहोशी के अलग विशेषज्ञ की जरूरत होती है, जो नहीं हैं। उनकी मौजदूगी के बिना गले के अंदर और नाक के अंदर का ऑपरेशन हो पाना संभव नहीं है। अगर सर्जरी यहां नहीं हो रही है तो मरीज कहां जा रहे हैं।
इसे जानने की कोशिश में पता चला कि जांच रिपोर्ट में ऑपरेशन की पुष्टि होने पर उन्हें हायर सेंटर भेज दिया जाता है। अधिकांश मरीजों को गोरखपुर मेडिकल कॉलेज जाने की सलाह दी जाती है। ऐसा नहीं कि डॉक्टर सर्जरी में सक्षम नहीं हैं। आपरेशन के लिए मशीन सहित पूरी सुविधाएं भी है, लेकिन एक बेहोशी के विशेषज्ञ न होने के कारण हर माह औसतन 100 मरीजों को बाहर जाना पड़ रहा है।

अब उनके ऊपर है कि मेडिकल कॉलेज जा रहे हैं या फिर निजी अस्पताल में। वैसे अधिकांश निजी अस्पताल में जाते हैं। जहां उनके अस्पताल की चमक धमक और डॉक्टर के नाम के हिसाब से 40 हजार से डेढ़ लाख रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। यह समस्या लंबे समय से चली आ रही है, लेकिन जिम्मेदार समस्या से बेखबर हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed