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Siddharthnagar News: वटवासिनी गालापुर के दर से खाली हाथ नहीं लौटते भक्त

Thu, 03 Oct 2024 01:07 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर Updated Thu, 03 Oct 2024 01:07 AM IST
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Devotees do not return empty handed from the temple of Vatvasini Galapur.
तहसील मुख्यालय से दस किलो मीटर दूर पूर्व में स्थित सिंह स्थल पर आज से बढ़ जाएगी श्रद्धालुओं की भीड़
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संवाद न्यूज एजेंसी
डुमरियागंज। तहसील मुख्यालय से दस किलो मीटर दूर पूर्व में स्थित सिंह स्थल ’वटवासिनी गालापुर’ से भक्त कभी खाली हाथ नहीं जाता है। मान्यता है कि यहां पर जो भी व्यक्ति सच्ची श्रद्धा और भक्ति भावना से आता है उसकी मुराद जरूर पूरी होती है। वैसे तो यहां पर पूरे साल भक्तों के आने-जाने का सिलसिला लगा रहता है। लेकिन शारदीय नवरात्र और चैत्र नवरात्र में यहां पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ता है।
बृहस्पतिवार से शुरू हो रहे शारदीय नवरात्र के चलते महाकाली स्थान को विधिवत रूप से सजावट की गई है। यहां पर पूरे नौ दिन श्रद्धालुओं का भारी जनसैलाब उमड़ेगा और यहां पर भजन कीर्तन, आरती आदि धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाएंगे। बताया जाता है कि इस स्थान के प्रति हिंदु ही नहीं मुस्लिमों की भी काफी आस्था है और तमाम लोग ऐसे भी है। जिनके असाध्य रोग ठीक हुए है व मिन्नत यहां आने पर पूरी हुई है। फिलहाल महाकाली स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। शारदीय नवरात्र शुरू होने के साथ यहां पर श्रद्धालुओं के आने का तांता लग गया है। जो पूरे 9 दिनों तक लगातार चलता रहेगा। इस दौरान यहां पर भजन कीर्तन तथा आरती के कार्यक्रम आयोजित होंगे
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ये है मान्यता
इस प्रसिद्ध धार्मिक एवं पर्यटन स्थल के बारे में कहा जाता है कि लगभग दो हजार साल पहले कलहंश वंश के राजा अपने पुरोहितों के साथ पड़ोसी जनपद गोंडा में आए और राज किया। यहां पर अपना साम्राज्य बढ़ाते हुए लटेरा गांव में पहुंचे तब यह क्षेत्र स्वतंत्र था। फिर उन्होंने गोंडा से अपनी कुलदेवी को गालापुर गांव में बसे पुरोहितों के माध्यम से लाने को भेजा। जहां से काफी तपस्या के बाद यह लोग कुलदेवी को लाने में सफल हुए और जब पुरोहित मदार के पेड़ के रूप में कुल देवी को लटेरा गांव की सरहद पर लेकर पहुंचे और तब के राजा केसरी सिंह को संदेश भिजवाया तो मदार के पेड़ के रूप में कुल देवी के आगमन का राजा को विश्वास नहीं हुआ और उसने पुरोहितों से गुस्से में कहा कि जहां पहुंचे हो वहीं उतार दो। और पुरोहितों ने नाराज होकर वहीं उसे रख दिया। फिर जैसे ही इस पेड़ का पृथ्वी से स्पर्श हुआ जमीन फट गई और वहां एक वट वृक्ष निकल आया और आकाशवाणी हुई कि अविश्वास के चलते राजा का विनाश हो गया। राजा के क्षमा याचना के बाद साक्षात देवी काली के रूप में दर्शन देकर कहा कि श्राप तो मिथ्या नहीं हो सकता, लेकिन 14 पुस्त के बाद ही राजा के वंशज राजपाठ पायेगे। तभी से इस स्थान का महत्व है। शारदीय व चैत्र नवरात्र पर यहां पर विशेष पूजा अर्चना होती है। मां काली स्थान पर मेले जैसा दृश्य दिखाई देता है। यहां पर बस्ती मंडल ही नहीं प्रदेश भर के श्रद्धालु पूरे साल आते रहते हैं। ऐसी धारणा है कि जो भी यहां पर सच्चे मन से मिन्नतें मांगता है मां काली उसकी मनोकामना जरूर पूरी करतीं है।
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