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10:02 बजे तक भद्रा, 10:37 के बाद होलिका दहन का शुभ मुहूर्त

Wed, 12 Mar 2025 10:46 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 12 Mar 2025 10:46 PM IST
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Bhadra till 10:02, auspicious time for Holika Dahan after 10:37
आचार्य अच्युतय रामानुजाचार्य।
संवाद न्यूज एजेंसी
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सिद्धार्थनगर। होलिका दहन के दिन भद्रा काल होने से बृहस्पतिवार को भद्रा के बाद रात 10.37 बजे के बाद होलिका दहन किया जाएगा। बृहस्पतिवार को रात 10 बजकर 2 मिनट के बाद फाल्गुनी पूर्णिमा लग रहा है। शुभ मुहूर्त में होलिका दहन किया जाना फलदायी है। होलिका दहन के बाद दूसरे दिन शुक्रवार को होली मनाई जाएगी।
ज्योतिषाचार्य आचार्य अच्युत रामानुजाचार्य ने बताया होली का त्योहार प्रतिवर्ष फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। त्योहार पर लोग एक दूसरे को अबीर और गुलाल लगाकर एक दूसरे को गले मिलकर खुशियां मनाते हैं।
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पौराणिक कथा के हवाले से ज्योतिषाचार्य ने बताया कि हिरण्य कश्यप नाम का असुर राजा था। जो अपने पुत्र प्रह्लाद से प्रेम नहीं करता था क्योंकि प्रह्लाद भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था।
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वहीं हिरण्य कश्यप भगवान विष्णु को शत्रु मानता था। हिरण्य कश्यप को प्रह्लाद के निरंतर हरि की स्तुति पसंद नहीं थी। इसलिए वह पुत्र को मृत्यु दंड देना चाहता था।
उन्होंने भक्त प्रह्लाद को मृत्यु दंड देने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन भक्त वत्सल हरि ने हर बार उसे बचा लिए। अंत में प्रह्लाद को मारने के लिए हिरण्य कश्यप ने अपनी बहन होलिका की मदद ली। होलिका को वरदान था कि वह आग में कभी नहीं जल सकती।
राक्षस राजा ने पुत्र प्रह्लाद को होलिका के साथ आग में समर्पित कर दिया, लेकिन जलती आग में प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ, लेकिन होलिका जलकर राख हो गई। यह देखकर हिरण्य कश्यप स्तब्ध रह गया। अपनी असफलता और अपनी बहन के जलने पर शोक मनाने लगा। तब से ही होलिका दहन मनाया जाने लगा।

ज्योतिषाचार्य ने बताया कि होलिका दहन की कहानी पाकिस्तान के मुल्तान शहर में प्रह्लादपुरी मंदिर से जुड़ी हुई है। माना जाता है कि यहीं पर होलिका अग्नि में जलकर भस्म हुई थी। मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर का निर्माण हजारों साल पहले भक्त प्रह्लाद ने कराया था।
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