अपनी महत्ता को पहचानें शिक्षक

Siddhartha nagar Updated Sun, 25 Nov 2012 12:00 PM IST
सिद्धार्थनगर। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने तथा और इसे बेहतर बनाने के लिए अभिभावकों के साथ ही शिक्षकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। जब दोनों मिलकर प्रयास करेंगे तो इसे और भी बेहतर बनाया जा सकता है।
ये बातें शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर लेकर शिक्षकों से ली गई प्रतिक्रिया में सामने आई। एक स्कूल के प्रबंधक सैय्यद सरवर कहते हैं कि गुरु को संस्कृत ग्रंथों में ब्रह्म, विष्णु, महेश के समकक्ष रखकर प्रणाम किया गया है। वास्तव में आज गुरु ने स्वयं ही अपनी गुरुता को छोड़ दिया है। इस पर विचार किए जाने की आवश्यकता है। पहले शिक्षक के पास धन का अभाव रहता था, लेकिन अब सरकार जीविकोपार्जन के लिए आकर्षक वेतन इत्यादि भत्ते भी दे रही है। एक अन्य स्कूल के प्रबंधक अनिल उपाध्याय कहते हैं कि शिक्षकों का भी दायित्व बनता है कि शिक्षा के स्तर में गुणवत्ता पर ध्यान दें। सुधार की दिशा में ऐसी पहल करें जो अन्य विद्यालय के शिक्षकों के लिए सीख हो। घर की खेती-बारी, गांव की राजनीति में अधिकतर शिक्षक लिप्त रहते हैं। प्रधानाचार्य पाटेश्वरी प्रसाद श्रीवास्तव का कहना है कि यदि वास्तव में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में शिक्षक कार्य करें तो इस क्षेत्र में हमारा जिला भी अग्रणी बनेगा। शिक्षकों को अपने काम के प्रति निष्ठा रखना इस लिए आवश्यक है, क्योंकि इसी से हमें सम्मान मिलता है। जब हम पूर्ण आस्था से पूरा परिश्रम करेंगे, अपने दायित्व को निभाएंगे तो कोई कारण नहीं है कि लोग सम्मान न करें। जेनिस के मोहन कहते हैं कि अब तक शिक्षकों को बेहतर शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने पर राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा रहा है। इसका उदाहरण जयकिसान इंटर कालेज सनई के पूर्व प्रधानाचार्य चंद्रप्रकाश श्रीवास्तव हैं। अनूप परशुरामका का कहना है कि छात्र-छात्राओं की परस्पर चर्चा अध्यापकों की पोल खोलती है। ऐसे अध्यापक आजकल बहुत कम देखने को मिल रहे हैं जो परिश्रम के बल पर अपने शिष्यों को बेहतर बनाते हैं। यही शिक्षकों की पूंजी होती है। शिक्षकों में यह भाव होना चाहिए कि उन्होंने एक आदर्श पथ को स्वीकार किया है।

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