बुद्ध की धरा पर सौहार्द की अनोखी मिसाल

Siddhartha nagar Updated Sat, 24 Nov 2012 12:00 PM IST
सिद्धार्थनगर। भगवान बुद्ध की पावन धरती सदा से ही धार्मिक एकता की प्रतीक रही है। हिंदुओं के त्योहारों में जहां मुसलमान शरीक होकर एकता का परिचय देते हैं, वहीं हिंदू धर्म के लोगों का उत्साह मुसलमानों के त्योहार मोहर्रम में देखने को मिलता है। जोगिया विकास खंड का लखनापार गांव पिछले 99 वर्षों से सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल कायम कर रहा है। इस गांव में हिंदू धर्म के लोग विगत 99 वर्षों से ताजिया स्थापित करते हैं। इस बार का मोहर्रम यहां के लिए 100 वां मोहर्रम है, जिसे लेकर गांव के लोग काफी उत्साहित हैं। गांव के दो टोलों में इस बार कुल 100 ताजिए स्थापित किए गए हैं।
बुद्ध की धरती पर अब तक अगर मजहबी नारे आक्रामक नहीं हुए तो इसके पीछे सांप्रदायिक सौहार्द की भावना ही है। मुस्लिम धर्म में मोहर्रम ऐसा त्योहार है, जिसे काफी संख्या में हिंदू भी मनाते हैं। जनपद में कई ऐसे गांव हैं, जहां हिंदुओं की ओर से ताजिया स्थापित किए जाते हैं। जोगिया विकास खंड के ग्राम लखनपार का मामला कुछ अलग है। लखनापार गांव में अधिकतर आबादी हिंदुओं की है, जो विगत 99 वर्षों से लगातार मोहर्रम का त्योहार मनाते हैं। ताजिया के रूप में इमाम साहब बाबा की स्थापना करते हैं और मोहर्रम की आखिरी तारीख तक मर्सिया गाकर शोक भी प्रकट करते हैं। इस बार यहां मोहर्रम के 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं और गांव के दो टोलों में मिलाकर कुल 100 स्थानों पर ताजिए स्थापित किए गए हैं। लखनापार गांव में ही पांच गांवों का कर्बला स्थित है। बावजूद इसके लखनापार और बड़हरा दो गांवों में मोहर्रम का त्योहार पूरी अकीदत के साथ हिंदू वर्ग के लोग मनाते हैं।

क्या कहते हैं गांव के लोग
गांव के मनिराम बताते हैं कि गांव में मोहर्रम का त्योहार हमारे पूर्वजों ने शुरू किया था, जिसे वे लोग अब तक मनाते हुए चले आ रहे हैं और अपनी पीढ़ियों को यही संदेश देते हैं कि आने वाले समय में भी यह त्योहार इसी प्रकार मनाया जाता रहे। सर्वेश कहते हैं कि पिछले वर्ष तक गांव में 25 से 30 ताजिए स्थापित किए जाते थे, लेकिन इस बार त्योहार मनाते हुए 100 वां वर्ष पूरा हो रहा है, इस लिए दो टोलों के चौक पर कुल 100 ताजिए स्थापित किए गए हैं। उनका कहना है कि इमाम हुसैन के प्रतीक के रूप में ताजिए की स्थापना की जाती है। लोगों का मानना है कि ताजिए की स्थापना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। अनिल कुमार कहते हैं कि मोहर्रम मनाते हुए अब 99 वर्ष पूरे हो गए हैं। यह एक लंबा समय है। लोग पूरी अकीदत के साथ इस त्योहार को मनाते हैं। इस गांव में कभी भी तनाव की स्थिति नहीं पैदा हुई। रमजान अली का कहना है कि गांव में हिंदू भाई मोहर्रम पूरे जोशोखरोश के साथ मनाते चले आ रहे हैं। लखनापार और बड़हरा दोनों टोलों के हिंदू मोहर्रम पर ताजिए की स्थापना करते हैं, जो सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है।

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