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तीन महीने से आंगनबाड़ी केंद्रों पर नहीं बंटा पोषाहार
siddharthnagar
Updated Wed, 04 Apr 2018 11:48 PM IST
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आंगनबाड़ी केंद्र सोनबरसा में पांच अति कुपोषित व चार कुपोषित बच्चे पाए गए। ।
- फोटो : अमर उजाला
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सिद्धार्थनगर। बच्चों को स्वस्थ और खुशहाल बचपन देना सरकार की प्राथमिकताओं है। बावजूद इसके पिछले तीन माह से आंगनबाड़ी केंद्रों पर न तो पोषाहार बंट रहा है, न ही अन्य कोई आहार। ऐेसे बच्चे आंगनबाड़ी केंद्रों में आते हैं और मौज-मस्ती करके लौट जाते हैं। इससे स्पष्ट है कि कुपोषण से ‘जंग’ सिर्फ कागजों में और जुबानी चल रही है। यह हाल तब जब देश के पिछड़े जिलों में शामिल सिद्धार्थनगर को नीति आयोग ने गोद ले रखा है। विभिन्न कार्ययोजनाओं में कुपोषण का खात्मा भी शामिल है।
करीब 28 लाख की आबादी वाले जिले में शून्य से पांच वर्ष के तक के बच्चों की संख्या तीन लाख है। इन बच्चों का बचपन स्वस्थ रखने के लिए भोजन के साथ आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से पूरक आहार देने की योजना है। जिले में संचालित कुल 3112 आंगनबाड़ी केंद्रों पर पहले पोषाहार वितरण के साथ हाटकुक्ड योजना लागू थी, बाद में सपा सरकार ने हौसला पोषण मिशन शुरू किया। इसमें बच्चों को दूध, घी, फल आदि देने की व्यवस्था थी। सूबे में सत्ता परिवर्तन के बाद इस पर भी ब्रेक लग गया। शबरी पोषण योजना के रूप में नई शुरुआत हुई और मॉनिटरिंग पर जोर दिया गया। यह योजना तो अभी तक धरातल पर नहीं उतर पाई, अलबत्ता बच्चों को पोषाहार का वितरण भी ठप हो गया है। पिछले तीन माह से आंगनबाड़ी केंद्रों से न पोषाहार बंट रहा है और न ही कोई अन्य आहार।
कुपोषण की चपेट में हैं 1.19 लाख बच्चे
देश के अति पिछड़े जिले में शामिल सिद्धार्थनगर में कुपोषण की स्थिति भयावह है। बाल विकास विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां पांच वर्ष तक के बच्चों की संख्या करीब तीन लाख है। इसमें 1.19 लाख बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं। इसमें से 31800 बच्चे अति कुपोषित, 88 हजार बच्चे कुपोषित हैं। इन बच्चों को ही सामान्य श्रेणी में लाने के लिए सरकार पूरा जोर लगाए हुए है। मगर संसाधनों के अभाव में कोशिशें सफल नहीं हो पा रहीं।
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डुमरियागंज, इटवा में स्थिति भयावह
कुपोषण का सर्वाधिक असर डुमरियागंज और इटवा क्षेत्र के गांवों में हैं। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक अकेले डुमरियागंज क्षेत्र में ही 12 हजार बच्चे कुपोषित और अति कुपोषित श्रेणी के हैं।
नई सरकार में बिगड़ी स्थिति
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व सहायिका वेलफेयर एसोसिएशन की प्रदेश महामंत्री प्रभावती देवी का कहना है कि पिछले एक साल में स्थिति काफी बिगड़ी है। हौसला पोषण मिशन से बच्चों को दूध, दही आदि मिल जाता था। बजट न मिलने से यह योजना बंद हो गई। संशोधन कर अब शबरी पोषण मिशन लागू कर दिया गया, लेकिन उसके अनुपालन के लिए कोई संसाधन नहीं दिए जा रहे। जब पोषाहार नहीं बंटेगा तो कुपोषण से कैसे लड़ेंगे। पिछले तीन माह से आंगनबाड़ी कार्यकर्ता केंद्रों पर जाती हैं, बच्चों को बुलाती हैं और फिर लौट आती हैं। सुविधाओं के लिए लगातार सरकार से मांग की जा रही हैं, मगर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा।
जनवरी से पोषाहार की आपूर्ति शासन स्तर से ही रुकी हुई है। उम्मीद है जल्द ही आपूर्ति शुरू हो जाएगी। आंगनबाड़ी का कार्य सिर्फ पोषाहार बांटने तक ही नहीं है। बच्चों के बौद्धिक विकास का भी प्रयास किया जा रहा है। माताओं को जागरूक कर बच्चों को छह माह तक केवल अपना दूध पिलाने, इसके बाद धीरे-धीरे खुराक बढ़ाते हुए अन्य सामग्री देने का सही तरीका भी बताया जा रहा है। जागरूकता आए तो भी कुपोषण को रोका जा सकता है।
- राजीव कुमार सिंह, जिला कार्यक्रम अधिकारी, बाल विकास।
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करीब 28 लाख की आबादी वाले जिले में शून्य से पांच वर्ष के तक के बच्चों की संख्या तीन लाख है। इन बच्चों का बचपन स्वस्थ रखने के लिए भोजन के साथ आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से पूरक आहार देने की योजना है। जिले में संचालित कुल 3112 आंगनबाड़ी केंद्रों पर पहले पोषाहार वितरण के साथ हाटकुक्ड योजना लागू थी, बाद में सपा सरकार ने हौसला पोषण मिशन शुरू किया। इसमें बच्चों को दूध, घी, फल आदि देने की व्यवस्था थी। सूबे में सत्ता परिवर्तन के बाद इस पर भी ब्रेक लग गया। शबरी पोषण योजना के रूप में नई शुरुआत हुई और मॉनिटरिंग पर जोर दिया गया। यह योजना तो अभी तक धरातल पर नहीं उतर पाई, अलबत्ता बच्चों को पोषाहार का वितरण भी ठप हो गया है। पिछले तीन माह से आंगनबाड़ी केंद्रों से न पोषाहार बंट रहा है और न ही कोई अन्य आहार।
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कुपोषण की चपेट में हैं 1.19 लाख बच्चे
देश के अति पिछड़े जिले में शामिल सिद्धार्थनगर में कुपोषण की स्थिति भयावह है। बाल विकास विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां पांच वर्ष तक के बच्चों की संख्या करीब तीन लाख है। इसमें 1.19 लाख बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं। इसमें से 31800 बच्चे अति कुपोषित, 88 हजार बच्चे कुपोषित हैं। इन बच्चों को ही सामान्य श्रेणी में लाने के लिए सरकार पूरा जोर लगाए हुए है। मगर संसाधनों के अभाव में कोशिशें सफल नहीं हो पा रहीं।
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डुमरियागंज, इटवा में स्थिति भयावह
कुपोषण का सर्वाधिक असर डुमरियागंज और इटवा क्षेत्र के गांवों में हैं। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक अकेले डुमरियागंज क्षेत्र में ही 12 हजार बच्चे कुपोषित और अति कुपोषित श्रेणी के हैं।
नई सरकार में बिगड़ी स्थिति
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व सहायिका वेलफेयर एसोसिएशन की प्रदेश महामंत्री प्रभावती देवी का कहना है कि पिछले एक साल में स्थिति काफी बिगड़ी है। हौसला पोषण मिशन से बच्चों को दूध, दही आदि मिल जाता था। बजट न मिलने से यह योजना बंद हो गई। संशोधन कर अब शबरी पोषण मिशन लागू कर दिया गया, लेकिन उसके अनुपालन के लिए कोई संसाधन नहीं दिए जा रहे। जब पोषाहार नहीं बंटेगा तो कुपोषण से कैसे लड़ेंगे। पिछले तीन माह से आंगनबाड़ी कार्यकर्ता केंद्रों पर जाती हैं, बच्चों को बुलाती हैं और फिर लौट आती हैं। सुविधाओं के लिए लगातार सरकार से मांग की जा रही हैं, मगर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा।
जनवरी से पोषाहार की आपूर्ति शासन स्तर से ही रुकी हुई है। उम्मीद है जल्द ही आपूर्ति शुरू हो जाएगी। आंगनबाड़ी का कार्य सिर्फ पोषाहार बांटने तक ही नहीं है। बच्चों के बौद्धिक विकास का भी प्रयास किया जा रहा है। माताओं को जागरूक कर बच्चों को छह माह तक केवल अपना दूध पिलाने, इसके बाद धीरे-धीरे खुराक बढ़ाते हुए अन्य सामग्री देने का सही तरीका भी बताया जा रहा है। जागरूकता आए तो भी कुपोषण को रोका जा सकता है।
- राजीव कुमार सिंह, जिला कार्यक्रम अधिकारी, बाल विकास।