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528 ईशापूर्व बुद्ध को बोधगया में पीपल के नीचे प्राप्त हुआ ज्ञान..

Mon, 10 Feb 2020 11:33 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 10 Feb 2020 11:33 PM IST
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taposthali sravasti
कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती सोमवार को बौद्ध अनुयायियों से गुलजार रही। थाईलैंड, वर्मा, श्रीलंका, वियतनाम, भूटान व नेपाल आदि देशों के अनुयायियों ने बौद्ध भिक्षु दीपालोक महाथेरो के नेतृत्व में आनंद बोधि पर विशेष प्रार्थना की। इसके बाद तपोस्थली के विभिन्न मूमेंटो का भ्रमण कर उसकी ऐतिहासिक जानकारी भी ली।
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बौद्ध भिक्षु दीपालोक महाथेरो ने कहा कि तथागत भगवान बुद्ध को ईशा पूर्व 528 वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में बोधिवृक्ष (पीपल) के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके बाद वह मूल बोधिवृक्ष के पहले सम्यक संबुद्ध उत्तराधिकारी बने। श्रावस्ती के लोगों को ऐसा लगता था कि तथागत कहीं श्रावस्ती को छोड़कर दूसरी जगह न चले जाएं। आखिरकार तथागत बुद्ध के श्रावस्ती छोड़ने का संकल्प श्रावस्ती वासियों को पता चला। इसलिए वे बेहद दुखी और बेचैन हो गए।
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तथागत की याद सदा के लिए श्रावस्ती में बनी रहे, इसलिए बोधगया के बोधि वृक्ष की एक टहनी लाकर श्रावस्ती में लगाई जाए, उन्होंने तथागत से ऐसी विनती की। सभी लोगों की श्रद्धा देखकर खुद तथागत बुद्ध ने बोधिवृक्ष की टहनी लाने के लिए आनंद को बोधगया भेजा। आनंद ने बोधिवृक्ष की एक टहनी लाकर तथागत बुद्ध के आदेशानुसार श्रावस्ती के जेतवन में विधिवत रूप से लगाया। आज इस वृक्ष को आनंद बोधिवृक्ष कहा जाता हैं।
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मूल बोधिवृक्ष का दूसरा उत्तराधिकारी सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को बनाया। सम्राट अशोक ने संघमित्रा के साथ बहुत से भिक्षु और भिक्षुनिओं को बोधगया के मूल बोधिवृक्ष की एक टहनी देकर धम्म प्रचार करने के लिए श्रीलंका भेजा। संघमित्रा ने श्रीलंका की राजधानी अनुराधापुर में बोधिवृक्ष की उस टहनी को रोपित किया।

आज श्रीलंका के बोधिवृक्ष की ही शाखाएं (टहनी) वाराणसी, सांची, सारनाथ, दिल्ली और दिक्षाभूमि नागपूर में लगाई गईं हैं। इसके साथ ही उसी बोधिवृक्ष की एक एक टहनी नई दिल्ली के बुद्ध जयंती पार्क और डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर भवन, दिल्ली के भारतीय बौद्ध महासभा के कार्यालय परिसर में सन 1956 में लगाई गई। इस दौरान थाईलैंड, वर्मा, श्रीलंका, वियतनाम, भूटान व नेपाल आदि देशों के कई बौद्ध अनुयायी मौजूद रहे।
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