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बौद्ध अनुयायियों से गुलजार रही तपोस्थली

Mon, 16 Sep 2019 11:15 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Mon, 16 Sep 2019 11:15 PM IST
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Taposthali buzzing with Buddhist followers
बौद्ध तपोस्थली स्थित आनंद बोधित पर पूजा अर्चना करते अनुयायी। - फोटो : SRAWASTI
कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती सोमवार को बौद्ध अनुयायियों से गुलजार रही। श्रीलंका से आए तीन सौ सदस्यीय दल ने माता सुमेदा महाथेरो के नेतृत्व में आनंद बोधि पर विशेष वर्षावाष पूजा की। इसके बाद दल के सदस्यों ने तपोस्थली के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर स्तूपों की महत्ता के बारे में जानकारी ली।
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विशेष वर्षावास पूजा के दौरान माता सुमेदा महाथेरो ने कहा कि सिद्धार्थ बचपन से ही अत्यंत करुण हृदय वाले थे। वह किसी को भी दुखी नहीं देख सकते थे। 21 वर्ष की आयु में एक बार वह अपने राज्य कपिलवस्तु की गलियों में घूम रहे थे। उस दौरान उनकी दृष्टि एक विकलांग वृद्ध, एक रोगी, एक पार्थिव शरीर और एक साधु पर पड़ी।
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इन चार दृश्यों को देखकर सिद्धार्थ समझ गए कि सबका जन्म होता है, सबको बुढ़ापा आता है, सबको बीमारी होती है, और एक दिन सब मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। इससे व्यथित होकर उन्होंने अपना घर-द्वार, पत्नी-पुत्र एवं राजपाठ का त्याग करते हुए साधु का जीवन अपना लिया। वह जन्म, बुढ़ापा, दर्द, बीमारी और मृत्यु से जुड़े सवालों के जवाब की खोज में निकल पड़े।
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सिद्धार्थ अपने प्रश्नों के उत्तर ढूंढ रह थे। समुचित ध्यान लगाने के बाद भी उन्हें इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले। तपस्या करने पर भी उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले। इसके बाद कुछ और साथियों के साथ अधिक कठोर तपस्या प्रारंभ की। ऐसा करते हुए छह वर्ष बीत गए। भूख से व्याकुल मृत्यु के निकट पहुंचकर बिना प्रश्नों के उत्तर पाए वह कुछ और करने के बारे में विचार करने लगे।

एक गांव में भोजन की तलाश में निकल गए। वहां थोड़ा सा भोजन ग्रहण किया। इसके बाद वह कठोर तपस्या छोड़कर एक पीपल के पेड़ (जो अब बोधिवृक्ष के नाम से जाना जाता है) के नीचे प्रतिज्ञा करके बैठ गए कि वह सत्य जाने बिना उठेंगे नहीं। वह सारी रात बैठे रहे और माना जाता है यही वह क्षण था जब सुबह के समय उन्हें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई। 35 वर्ष की आयु में वह बुद्ध बन गये। इस मौके पर धम्म सागर, आनंद सागर, सुख सागर, नाग ज्योति व माता विद्यावती आदि मौजूद रहीं।
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