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Shravasti News: जन्म व मृत्यु का भेद जानने को भिक्षु बने सिद्धार्थ

Sun, 30 Jul 2023 09:56 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 30 Jul 2023 09:56 PM IST
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Siddhartha became a monk to know the difference between birth and death
कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती रविवार को बौद्ध अनुयायियों से गुलजार रही। श्रीलंका से आए 120 सदस्यीय दल ने माता सुमेदा के नेतृत्व में आनंद बोधि पर विशेष पूजा किया। इसके बाद दल के सदस्यों ने तपोस्थली के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर वहां मौजूद स्तूपों के महत्व के बारे में जानकारी ली।
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विशेष पूजन के दौरान माता सुमेदा ने कहा कि सिद्धार्थ बचपन से ही अत्यंत करुण हृदय वाले थे। वह किसी को भी दुख नहीं देख सकते थे। 21 वर्ष की आयु में एक बार वह अपने राज्य कपिलवस्तु की गलियों में धूम रहे थे। इस दौरान उनकी दृष्टि चार दृश्यों पर पड़ी। उन्होंने देखा कि एक वृद्ध विकलांग है, एक रोगी, एक पार्थिव शरीर और एक साधु।
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इन चार दृश्यों को देखकर सिद्धार्थ समझ गए थे कि सब का जन्म होता है, सब को बुढ़ापा आता है, सब को बीमारी होती है, और एक दिन, सब मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इससे व्यथित होकर उन्होंने अपना घर द्वार, पत्नी पुत्र एवं राजपाठ का त्याग करते हुए साधु का जीवन अपना लिया और वह जन्म, बुढ़ापा, दर्द, बीमारी और मृत्यु से जुड़े सवालों की खोज में निकल पड़े।
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सिद्धार्थ अपने प्रश्नों के उत्तर ढूंढ रह थे। समुचित ध्यान लगाने के बाद भी उन्हें इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले। फिर उन्होंने तपस्या भी की। लेकिन उन्हें अपने प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले। इसके बाद कुछ और साथियों के साथ अधिक कठोर तपस्या प्रारंभ की। ऐसा करते हुए छह वर्ष बीत गए। भूख से व्याकुल मृत्यु के निकट पहुंचकर बिना प्रश्नों के उत्तर पाए वह कुछ और करने के बारे में विचार करने लगे थे। एक गांव में भोजन की तलाश में निकल गए। वहां थोड़ा सा भोजन ग्रहण किया।

इसके बाद वह कठोर तपस्या छोड़कर एक पीपल के पेड़ के नीचे प्रतिज्ञा करके बैठ गए कि वह सत्य जाने बिना उठेंगे नहीं। वह सारी रात बैठे रहे और माना जाता है यही वह क्षण था जब सुबह के समय उन्हें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। उनकी अविजया नष्ट हो गई और उन्हें निर्वन यानि बोधि प्राप्त हुई। 35 वर्ष की आयु में वह बुद्ध बन गए। इस मौके पर काफी संख्या में अनुयायी मौजूद रहे। संवाद
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