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लक्ष्मीनारायण मंदिर व हजरत महल मकबरा को बनवाएं स्मारक

Wed, 20 Oct 2021 10:57 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 20 Oct 2021 10:57 PM IST
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श्रावस्ती। देश में इस समय आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। सभी राज्यों और जिलों में विशेष आयोजन किए जा रहे हैं। ऐसे में नेपाल में भी स्थित भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के स्मारकों को सहेजने के लिए आवाज उठ रही है। नेपाल के मधेशी मंच ने काठमांडू स्थित बेगम हजरत महल के मकबरा व महाराष्ट्र के अंतिम पेशवा नानासाहेब द्वारा स्थापित लक्ष्मी नारायण मंदिर को स्मारक घोषित करने की मांग भारत सरकार से की है।
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मधेशी मंच का कहना है कि 1857 के गदर में अवध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली बेगम हजरत महल व नानासाहेब पेशवा को भारत सरकार संभवत: भूल गई। बेगम हजरत महल ने 1857 की जंग के बाद पलायन कर 1859 में नेपाल चली आईं थीं। जहां तात्कालिक प्रधानमंत्री जंगबहादुर राणा ने उन्हें शरण दी और वह काठमांडू में रहने लगीं। यहीं पर बेगम हजरत महल की सात अप्रैल 1879 में मौत हो गई थी। जिनका मकबरा आज भी काठमांडू के बाग बाजार में मौजूद है। इस मकबरे पर बेगम हजरत महल को श्रद्धांजलि देने के लिए 2014 में उनकी 135वीं पुण्यतिथि भी मनाई गई थी। जिसमें भारतीय राजदूत भी शामिल हुए थे।
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काठमांडू में ही पेशवा नानासाहेब के नेपाल प्रवास के दौरान लक्ष्मीनारायण मंदिर का निर्माण कराया गया था। आज यह दोनों ही स्थल अतिक्रमण की चपेट में है। यह वह स्थल हैं जहां से भारत नेपाल के संबंध की डोर जुड़ी हुई है। साथ ही 1857 के गदर का इतिहास भी काठमांडू में आकर ही पूरा होता है। इसके बावजूद भारत सरकार नेपाल में स्वतंत्रता सेनानियों की इन दो धरोहर को भूल गई। ऐसे में मधेशी मंच ने इन दो स्थलों को स्मारक घोषित कराने के लिए भारत सरकार से अपील की है।
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तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री जंगबहादुर राणा ने बेगम हजरत महल को शरण दी थी। बेगम के साथ जो लोग आए वह बागबाजार और आसपास के इलाकों में रहते थे। जब बेगम की मृत्यु हुई, तो उन्हें वहीं दफना दिया गया। बाद में उनका बेटा बिरजिस कदर कलकत्ता लौट गया।
- गिरिजा प्रसाद पाठक, मधेशी नेता नेपालगंज।
बेगम हजरत महल के वंशज अंजुम कद्र, कौकुब कद्र और नैयर कद्र, जो बिरजिस कद्र के पोते हैं। उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात कर हजरत महल के मकबरे को संरक्षित करने की मांग की थी। कद्र के वंशजों की फ़ैमिली वेबसाइट पर यह वाक्या दर्ज है। लेकिन सरकार ने कोई खास कदम नहीं उठाया।
- रमेश कुमार अम्लानी, संयोजक अंतर्राष्ट्रीय भारत नेपाल संवाद।
बेगम हजरत महल ने 1859 में अपने 10 वर्ष के बेटे के साथ काठमांडू में शरण ली। 8 अप्रैल 2014 को काठमांडू में बेगम हजरत महल की 135वीं पुण्य तिथि पर उनकी मजार पर एक पुष्पांजलि समारोह आयोजित किया गया था। जिसमें भारत के तत्कालीन राजदूत रंजीत राय भी शामिल हुए थे। इसके बाद से इस स्थान को पूछने के लिए कोई नहीं आया।

- विजय कुमार वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार नेपाल।
पेशवा नाना साहेब 1859 में नेपाल गए थे। वहां पर उन्हें नेपाल के प्रधानमंत्री जंगबहादुर राणा ने संरक्षण दिया था। रिरिथांग के पास थापतेली में पश्चिमी नेपाल में अपने दिन गुजारे थे। यही नहीं नेपाल में नाना जी की पत्नियों को भी शरण मिली थी, वह थापथाली के पास रहती थीं। इसी दौरान नानासाहेब पेशवा द्वारा वहीं पर लक्ष्मी नारायण मंदिर की स्थापना की गई थी।
- अजय कुमार टंडन, भारत मैत्री संघ नेपाल।
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