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जलमार्ग से फिर जुड़ सकेंगे नदी किनारे के शहर, बढ़ेगा व्यापार

Sun, 14 Nov 2021 10:54 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sun, 14 Nov 2021 10:54 PM IST
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Riverside cities will be able to connect again with waterways, business will increase
श्रावस्ती। श्रावस्ती के प्राचीन गौरव को वापस लाने के लिए सरयू नहर परियोजना तैयार है। पहले श्रावस्ती के जल मार्ग से देश के भी सभी प्रमुख व्यापारिक महानगर जुड़े हुए थे। उम्मीद यह भी जताई जा रही है कि भविष्य में इन नहरों का इस्तेमाल इस रूप में हो सकता है। वैसे भी नदियों को आपस में जोड़ने का विचार 161 वर्ष पुराना है।
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सरयू राष्ट्रीय परियोजना पूरी हो चुकी है। इसी के साथ लोगों की उम्मीद भी अब इससे बढ़ने लगी हैं। इस परियोजना के दोनों ओर की पटरियां इतनी चौड़ी हैं कि फोर लेन सड़क बन कर तैयार हो जाए। यही नहीं इस परियोजना से निकलने वाली राप्ती मुख्य नहर की चौड़ाई 180 मीटर है। गहराई भी पर्याप्त है। ऐसे में यदि भविष्य में पटरियों का इस्तेमाल सड़क व नहर का उपयोग जल मार्ग के लिए हो तो पर्यटन व व्यापारिक रास्ते अपने आप खुल सकते हैं। यही श्रावस्ती का प्राचीन गौरव भी है। प्राचीन श्रावस्ती से निकलने वाली अचिरावती जिसे आज राप्ती के नाम से जाना जाता है। उसका इस्तेमाल जल मार्ग के रूप में किया जाता था। इस जल मार्ग से व्यापारिक पत्तन की एक पूरी श्रंखला थी। यदि बुद्ध कालीन श्रावस्ती के इस व्यापारिक जल मार्ग को देखा जाए तो बौद्ध ग्रंथों में श्रावस्ती से व्यापारिक बड़े जनपदों की दूरियां भी लिखी हैं। श्रावस्ती से राजगृह आने-जाने का मार्ग काफी प्रचलन में था।
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श्रावस्ती से साकेत, कपिल वस्तु, कुशीनारा, पावा, भोगनगर व वैशाली व राजगृह का एक मार्ग था। दूसरा मार्ग श्रावस्ती से प्रतिष्ठानपुर, दक्षिणपथ का था। यह रास्ता श्रावस्ती साकेत (अयोध्या), कौशांबी, उज्जैन, माहिष्मती व अंतिम पड़ाव प्रतिष्ठानपुर का था। तीसरा मार्ग उत्तरापथ कहलाता था। यह श्रावस्ती से तक्षशिला को जोड़ता था। भगवान बुद्ध के पाली साहित्य में श्रावस्ती से तक्षशिला की दूरी 192 योजन, मच्छिकासंड 30 योजन, उग्गनगर 12 योजन तथा चंद्रभागा (चेनाव नदी) 120 योजन थी। श्रावस्ती से साकेत सात योजन था। यही नहीं श्रावस्ती के इस व्यापारिक मार्ग की पुष्टि यहां बिकने वाले धान के पुआल से बने रस्से भी है।
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श्रावस्ती के बंदरगाह से देश के कोने-कोन में नाव को बांधने के लिए बनाए जाने वाले रस्से ले जाते थे। जिसकी पुष्टि कई बौद्ध ग्रंथों से हुई है। ऐसे में बौद्ध काल में श्रावस्ती व्यापारिक प्रतिष्ठानों का एक प्रचलित केंद्र बिंदु था। जिसका आधार राप्ती नदी थी। अज फिर इस राप्ती नदी को सरयू राष्ट्रीय परियोजना के रूप में एक नई दिशा मिली है। यह संयोग मात्र है कि आज भी इसकी दिशा प्राचीन श्रावस्ती के व्यापारिक मार्गों वाली ही है। यह नदी सरयू (अयोध्या), घाघरा, राप्ती, बाणगंगा व रोहिणी को आपस में जोड़ कर श्रावस्ती को बहराइच गोंडा, बलरामपुर, बस्ती, सिद्धार्थनगर, संत कबीर नगर, गोरखुपर व महराजगंज को नहरों के माध्यम से आपस में जोड़ देगी।
योजना से सूखे से मिलेगी निजात
नदियों को आपस में जोड़ने का विचार 161 साल पुराना है। 1858 में ब्रिटिश सैन्य इंजीनियर आर्थर थॉमस कॉटन ने बड़ी नदियों के बीच नहर जोड़ने का प्रस्ताव दिया था। जिससे ईस्ट इंडिया कंपनी को बंदरगाहों की सुविधा मिल सके। इसके साथ ही दक्षिण-पूर्वी प्रांतों में बार-बार पड़ने वाले सूखे से निपटा जा सके।

प्राचीन श्रावस्ती व्यापारिक दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण नगर था। यहां से जल व थल दोनों मार्ग से तत्कालीन वृहद भारत के कई महानगर जो व्यापारिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण थे। वह जुड़े हुए थे। भगवान बुद्ध को श्रावस्ती का आमंत्रण एक व्यापारी ने ही दिया था। ऐसे में सरयू परियोजना निश्चय ही श्रावस्ती के लिए एक नया अध्याय लेकर आएगी। -डॉ. एसएन पांडे, एसोसिएट प्रोफेसर
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