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Shravasti News: जहां कभी नहीं हुई चकबंदी, उसका मांगा प्रस्ताव
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जमुनहा (श्रावस्ती)। जिन गांवों की चकबंदी आज तक नहीं हुई। उन गांवों का प्रस्ताव चकबंदी आयुक्त ने मांगा है। इस पत्र के साथ ही जमुनहा में वर्षों से चार गांवों में चकबंदी की मांग अब पूरी होगी। यह वह गांव हैं जहां चकबंदी के अभाव में जमीन केवल कागजों में ही उपलब्ध है। मौके पर कुछ भी नहीं है।
किसानों के छोटे-छोटे खेत एक स्थान पर एकत्र हो जाएं। ताकि कृषि करने में आसानी हो। इसके साथ ही जमीन का मूल्यांकन उसकी उपयोगिता के साथ नए सिरे से हो जाएग। इसलिए चकबंदी गांवों में की जाती है। इस चकबंदी के बाद पंचायतों में बदले स्वरूप का निर्धारण भी हो जाता है। लेकिन जिले में अभी 20 से 22 गांव ऐसे हैं जहां आज तक चकबंदी नहीं हुई। जिसके चलते किसानों के खेतों के छोटे-छोटे टुकड़े फैले हुए हैं। ऐसे में किसान खेती के लिए कहीं चार तो कहीं 10 किलोमीटर का चक्कर लगा रहे हैं।
इन्हीं समस्याओं को देखते चकबंदी आयुक्त ने आठ दिसंबर को सभी जिलाधिकारियों को पत्र लिखा था। जिसमें उन पंचायतों की सूची मांगी गई जहां आज तक एक भी बार चकबंदी नहीं कराई गई। यह रिपोर्ट चकबंदी आयुक्त को मुख्यमंत्री कार्यालय में भेजनी है। इसके बाद उम्मीद है कि प्रदेश में एक बार फिर चकबंदी प्रक्रिया जो अभी बंद पड़ी है। वह प्रारंभ होगी। इस आदेश के बाद लगभग एक दशक से जमुनहा के बांसगढ़ी, घुमना, कुड़वा के साथ तिघरवा में चकबंदी कराने के लिए संघर्ष करने वाले किसानों के सामने कुछ उम्मीद जगी है।
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इन गांवों में चकबंदी के लिए संघर्ष कर रहे किसान ओमप्रकाश आर्य का कहना है कि उन्होंने कई प्रत्यावेदन अब तक दिए। इन प्रत्यावेदन के आधार पर यह बताया गया था कि बांसगढ़ी में 1998 में चकबंदी को स्वीकृति मिली थी। लेकिन अभी तक उस स्वीकृति के बाद चकबंदी प्रक्रिया प्रारंभ नहीं हुई।
ऐसे ही बांसगढ़ी, घुमना व कुड़वा में भी 1998 चकबंदी प्रक्रिया के लिए अभिलेख राजस्व विभाग से मांगे गए थे। लेकिन राजस्व विभाग ने पूरा अभिलेख चकबंदी विभाग को नहीं दिया। जिसके चलते लगभग 13-14 वर्षों तक अभिलेख रखने के बाद चकबंदी विभाग ने राजस्व विभाग को अभिलेख लौटा दिया।
यहां तक कि ग्रामीणों का दावा है कि घुमना पंचायत में मौजूद भूमि का राजस्व विभाग के पास भूचित्र ही उपलब्ध नहीं है। ऐसे में चकबंदी ही एक ऐसा विकल्प है जिससे गांव पंचायतों की सीमा का नया रेखाचित्र तैयार किया जा सके।
राप्ती नदी के किनारे ज्यादा समस्या
जो गांव राप्ती नदी के किनारे हें उनकी समस्याएं कुछ ज्यादा है। राप्ती नदी प्रति वर्ष कटान करती है। ऐसे में कृषि योग्य भूमि के साथ ही गांव का नक्शा भी बदल जाता है।
तैयार हो रही सूची
जिन पंचायतों में एक भी बार चकबंदी नहीं हुई। ऐसे पंचायतों की सूची तैयार की जा रही है। जल्द ही इसे चकबंदी आयुक्त के यहां भेजा जाएगा। -डीपी सिंह, एडीएम
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किसानों के छोटे-छोटे खेत एक स्थान पर एकत्र हो जाएं। ताकि कृषि करने में आसानी हो। इसके साथ ही जमीन का मूल्यांकन उसकी उपयोगिता के साथ नए सिरे से हो जाएग। इसलिए चकबंदी गांवों में की जाती है। इस चकबंदी के बाद पंचायतों में बदले स्वरूप का निर्धारण भी हो जाता है। लेकिन जिले में अभी 20 से 22 गांव ऐसे हैं जहां आज तक चकबंदी नहीं हुई। जिसके चलते किसानों के खेतों के छोटे-छोटे टुकड़े फैले हुए हैं। ऐसे में किसान खेती के लिए कहीं चार तो कहीं 10 किलोमीटर का चक्कर लगा रहे हैं।
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इन्हीं समस्याओं को देखते चकबंदी आयुक्त ने आठ दिसंबर को सभी जिलाधिकारियों को पत्र लिखा था। जिसमें उन पंचायतों की सूची मांगी गई जहां आज तक एक भी बार चकबंदी नहीं कराई गई। यह रिपोर्ट चकबंदी आयुक्त को मुख्यमंत्री कार्यालय में भेजनी है। इसके बाद उम्मीद है कि प्रदेश में एक बार फिर चकबंदी प्रक्रिया जो अभी बंद पड़ी है। वह प्रारंभ होगी। इस आदेश के बाद लगभग एक दशक से जमुनहा के बांसगढ़ी, घुमना, कुड़वा के साथ तिघरवा में चकबंदी कराने के लिए संघर्ष करने वाले किसानों के सामने कुछ उम्मीद जगी है।
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इन गांवों में चकबंदी के लिए संघर्ष कर रहे किसान ओमप्रकाश आर्य का कहना है कि उन्होंने कई प्रत्यावेदन अब तक दिए। इन प्रत्यावेदन के आधार पर यह बताया गया था कि बांसगढ़ी में 1998 में चकबंदी को स्वीकृति मिली थी। लेकिन अभी तक उस स्वीकृति के बाद चकबंदी प्रक्रिया प्रारंभ नहीं हुई।
ऐसे ही बांसगढ़ी, घुमना व कुड़वा में भी 1998 चकबंदी प्रक्रिया के लिए अभिलेख राजस्व विभाग से मांगे गए थे। लेकिन राजस्व विभाग ने पूरा अभिलेख चकबंदी विभाग को नहीं दिया। जिसके चलते लगभग 13-14 वर्षों तक अभिलेख रखने के बाद चकबंदी विभाग ने राजस्व विभाग को अभिलेख लौटा दिया।
यहां तक कि ग्रामीणों का दावा है कि घुमना पंचायत में मौजूद भूमि का राजस्व विभाग के पास भूचित्र ही उपलब्ध नहीं है। ऐसे में चकबंदी ही एक ऐसा विकल्प है जिससे गांव पंचायतों की सीमा का नया रेखाचित्र तैयार किया जा सके।
राप्ती नदी के किनारे ज्यादा समस्या
जो गांव राप्ती नदी के किनारे हें उनकी समस्याएं कुछ ज्यादा है। राप्ती नदी प्रति वर्ष कटान करती है। ऐसे में कृषि योग्य भूमि के साथ ही गांव का नक्शा भी बदल जाता है।
तैयार हो रही सूची
जिन पंचायतों में एक भी बार चकबंदी नहीं हुई। ऐसे पंचायतों की सूची तैयार की जा रही है। जल्द ही इसे चकबंदी आयुक्त के यहां भेजा जाएगा। -डीपी सिंह, एडीएम