{"_id":"5f5f9b548ebc3e51e34b65b4","slug":"praised-the-importance-of-hindi-srawasti-news-lko540143688","type":"story","status":"publish","title_hn":"हिंदी दिवस पर आयोजित हुई गोष्ठी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हिंदी दिवस पर आयोजित हुई गोष्ठी
विज्ञापन
कटरा (श्रावस्ती)। कैंपस मार्टियस एकेडमी इकौना में सोमवार को हिंदी दिवस पर गोष्ठी हुई जिसकी अध्यक्षता प्रधानाचार्य ने की। इस दौरान वक्ताओं ने हिंदी की महत्ता व उपयोगिता के बारे में विचार रखे।
विद्यालय के प्रधानाचार्य मोहम्मद अब्दुल हफीज ने कहा कि हिंदी दिवस का इतिहास और इसे दिवस के रूप में मनाने का कारण बहुत पुराना है। वर्ष 1918 में महात्मा गांधी के दोस्त नोनो ने इसे जनमानस की भाषा कही थी। इसे देश की राष्ट्रभाषा भी बनाने को कहा था लेकिन आजादी के बाद ऐसा कुछ नहीं हो सका। सत्ता में आसीन लोगों और जाति भाषा के नाम पर राजनीति करने वालों ने कभी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने नहीं दिया।
प्रबंधक हरीश कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविंददास और व्यौहार राजेंद्र सिंह आदि लोगों ने बहुत से प्रयास किए जिसके चलते इन्होंने दक्षिण भारत की कई यात्राएं भी की।
विज्ञापन
शिक्षक संतोष कुमार पांडे ने कहा कि अंग्रेजी भाषा के बढ़ते चलन और हिंदी की अनदेखी को रोकने के लिए हर साल 14 सितंबर को देशभर में हिंदी दिवस मनाया जाता है। आजादी मिलने के दो साल बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में एक मत से हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया था और तभी से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
14 सितंबर 1949 को हिंदी के पुरोधा व्यौहार राजेंद्र सिंह का 50वां जन्मदिन था जिन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत लंबा संघर्ष किया। इस मौके पर सिराज अहमद, साजिया, लता सिंह, सुनीता सैनी, आराधना, शबनम, सपना पटवा आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
विद्यालय के प्रधानाचार्य मोहम्मद अब्दुल हफीज ने कहा कि हिंदी दिवस का इतिहास और इसे दिवस के रूप में मनाने का कारण बहुत पुराना है। वर्ष 1918 में महात्मा गांधी के दोस्त नोनो ने इसे जनमानस की भाषा कही थी। इसे देश की राष्ट्रभाषा भी बनाने को कहा था लेकिन आजादी के बाद ऐसा कुछ नहीं हो सका। सत्ता में आसीन लोगों और जाति भाषा के नाम पर राजनीति करने वालों ने कभी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनने नहीं दिया।
विज्ञापन
प्रबंधक हरीश कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, रामचंद्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविंददास और व्यौहार राजेंद्र सिंह आदि लोगों ने बहुत से प्रयास किए जिसके चलते इन्होंने दक्षिण भारत की कई यात्राएं भी की।
विज्ञापन
शिक्षक संतोष कुमार पांडे ने कहा कि अंग्रेजी भाषा के बढ़ते चलन और हिंदी की अनदेखी को रोकने के लिए हर साल 14 सितंबर को देशभर में हिंदी दिवस मनाया जाता है। आजादी मिलने के दो साल बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में एक मत से हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया था और तभी से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
14 सितंबर 1949 को हिंदी के पुरोधा व्यौहार राजेंद्र सिंह का 50वां जन्मदिन था जिन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत लंबा संघर्ष किया। इस मौके पर सिराज अहमद, साजिया, लता सिंह, सुनीता सैनी, आराधना, शबनम, सपना पटवा आदि मौजूद रहे।