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चाय पर भी महंगाई की मार, गरीबों से बढ़ी दूरी
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श्रावस्ती। दशकों से आम लोगों के स्वागत सत्कार का जरिया बनी एक कप चाय पर भी महंगाई की ऐसी मार पड़ी की वह गरीबों की पहुंचे से दूर होने लगी है। लगभग एक दशक के बाद एक कप चाय की फुटकर बिक्री दर में दो गुना से अधिक इजाफा हुआ है। हर गली मोहल्ले में पांच रुपये में आसानी से मिलने वाली एक कप चाय पीने के लिए भी 10 से 12 रुपया तक चुकाना पड़ रहा है। कीमत बढ़ने के बावजूद चाय की गुणवत्ता में भी कमी आई है।
तराई क्षेत्र में चाय का अपना महत्व है। कहा जाता है कि जब सोहेलवा व भिनगा के जंगल में अंग्रेज अफसर शिकार के लिए आते थे तो वह दो दो माह तक कैंप करते थे। स्थानीय लोगों को जंगल में हाका (जंगली पशुओं को एक तरफ ले जाने के लिए ग्रामीण ढोल नगाढ़ों के साथ आवाज लगाते थे) लगाने के लिए बुलाया जाता था। इस हाका के बदले उन्हें दिन में दो बार भूजा व चाय मिलता था। यहां से शुरू हुआ तराई क्षेत्रों के गांवों में चाय का चलन अब तक बदस्तूर जारी है। गांवों पहले वहीं लोग चाय पीते थे, जो अंग्रेजों के लिए जंगल में हाका लगाने जाते थे। अमीर से लेकर गरीब तक में चाय की बढ़ती तलब के कारण ही गांव हो चाहे शहर चाय बेचने की दुकान व ठेला अवश्य मिल जाएगा।
एक दशक पहले चाय की कीमत प्रति गिलास (कप) दो रुपये थी। एक दशक बाद कीमत में हुए इजाफे के बाद इसकी कीमत 2 से 5 रुपये हो गयी। बीते कई सालों से यह कीमत स्थिर बनी हुई थी। बीते छह माह में चीनी, चायपत्ती, दूध से लेकर चाय बनाने में इस्तेमाल होने वाली अदरक तक की कीमत महंगाई के कारण आसमान छूने लगी है। इसके दंश से बड़े से लेकर गरीबों तक की पसंदीदा चाय भी अछूती नहीं रह पायी। चाय की फुटकर कीमत भी बीते कुछ माह में पांच से बढ़कर 10 से 12 रुपया प्रति गिलास (कप) पहुंच गयी है।
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चाय पत्ती लोकल - 250 रुपये प्रति किग्रा
चाय पत्ती ब्रांडेड - 600 रुपये प्रति किग्रा
चीनी - - 44 रुपये प्रति किग्रा
गैस सिलेंडर की कीमत - 980 रुपये घरेलू फ्री सेल
मेरे पिता पीते थे एक लोटा चाय
चाय से आज सभी परिचित है। लेकिन ऐसा पहले नहीं था। इसे केवल अंग्रेज अफसर या फिर उनकी सेवा में लगे भारतीय ही पीते थे। पिता जी बताते थे कि जब हाका लगाने जाते थे तो लौटने पर उन्हें मिट्टी के बड़े कुल्हड़ में चाय मिलती थी। धीरे धीरे उनकी आदत बन गई और घर पर चाय बनायी जाने लगी। वह दिन भर में एक लोटा चाय जरूर पीते थे। यह कहना है तराई के राम निवास का। चाय की ऐसे ही कहानी तराई के दीनाथ, राम कृपाल व राम बहादुर भी सुनाते हैं।
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तराई क्षेत्र में चाय का अपना महत्व है। कहा जाता है कि जब सोहेलवा व भिनगा के जंगल में अंग्रेज अफसर शिकार के लिए आते थे तो वह दो दो माह तक कैंप करते थे। स्थानीय लोगों को जंगल में हाका (जंगली पशुओं को एक तरफ ले जाने के लिए ग्रामीण ढोल नगाढ़ों के साथ आवाज लगाते थे) लगाने के लिए बुलाया जाता था। इस हाका के बदले उन्हें दिन में दो बार भूजा व चाय मिलता था। यहां से शुरू हुआ तराई क्षेत्रों के गांवों में चाय का चलन अब तक बदस्तूर जारी है। गांवों पहले वहीं लोग चाय पीते थे, जो अंग्रेजों के लिए जंगल में हाका लगाने जाते थे। अमीर से लेकर गरीब तक में चाय की बढ़ती तलब के कारण ही गांव हो चाहे शहर चाय बेचने की दुकान व ठेला अवश्य मिल जाएगा।
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एक दशक पहले चाय की कीमत प्रति गिलास (कप) दो रुपये थी। एक दशक बाद कीमत में हुए इजाफे के बाद इसकी कीमत 2 से 5 रुपये हो गयी। बीते कई सालों से यह कीमत स्थिर बनी हुई थी। बीते छह माह में चीनी, चायपत्ती, दूध से लेकर चाय बनाने में इस्तेमाल होने वाली अदरक तक की कीमत महंगाई के कारण आसमान छूने लगी है। इसके दंश से बड़े से लेकर गरीबों तक की पसंदीदा चाय भी अछूती नहीं रह पायी। चाय की फुटकर कीमत भी बीते कुछ माह में पांच से बढ़कर 10 से 12 रुपया प्रति गिलास (कप) पहुंच गयी है।
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चाय पत्ती लोकल - 250 रुपये प्रति किग्रा
चाय पत्ती ब्रांडेड - 600 रुपये प्रति किग्रा
चीनी - - 44 रुपये प्रति किग्रा
गैस सिलेंडर की कीमत - 980 रुपये घरेलू फ्री सेल
मेरे पिता पीते थे एक लोटा चाय
चाय से आज सभी परिचित है। लेकिन ऐसा पहले नहीं था। इसे केवल अंग्रेज अफसर या फिर उनकी सेवा में लगे भारतीय ही पीते थे। पिता जी बताते थे कि जब हाका लगाने जाते थे तो लौटने पर उन्हें मिट्टी के बड़े कुल्हड़ में चाय मिलती थी। धीरे धीरे उनकी आदत बन गई और घर पर चाय बनायी जाने लगी। वह दिन भर में एक लोटा चाय जरूर पीते थे। यह कहना है तराई के राम निवास का। चाय की ऐसे ही कहानी तराई के दीनाथ, राम कृपाल व राम बहादुर भी सुनाते हैं।