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विरासत की सीट नहीं बन सकी वरासत
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श्रावस्ती। विधानसभा चुनाव जिले में कभी भी विरासत की वरासत नहीं बन पाई। अतीत के आइने में कई नेता ऐसे हुए जो छह-छह बार एक ही विधानसभा से सदन पहुंचे। लेकिन जब उन्होंने अपनी पत्नी व पुत्र को मैदान में उतारा तो उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा। जबकि कुछ नेता ऐसे हैं जो स्वयं कई बार विधानसभा का सफर जिले की सीट से करके आए। लेकिन उनकी आने वाली पीड़ी इस क्षेत्र में सफलता के किनारे पर नहीं पहुंच पाई।
जिले में दो विधानसभाएं हैं। दोनों विधानसभाएं 1952 से ही हैं। जब से विधानसभा का चुनाव जिले के लिए शुरू हुआ। तभी से अधिकांश प्रतिनिधि कम से कम दो बार चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे। लेकिन राजा चंद्रमणि कांत सिंह का नाम इस सूची में सबसे आगे है। वह छह बार भिनगा विधानसभा का प्रतिनिधित्व करते हुए सदन पहुंचे। लेकिन इन धुरंधर नेताओं की आने वाली पीढ़ी शायद उतनी भाग्यशाली नहीं थी। जितना कि वह स्वयं। जनता ने पुराने धुरंधर नेताओं पर अपनी आस्था व्यक्त की। लेकिन जब उनकी विरासत का वरासत होने का समय आया तो जनता ने अपना हाथ पीछे खींच लिया। जिससे उनके अगली पीढ़ी को शिकस्त का सामना करना पड़ा।
ऐसे ही देखा जाए तो वर्ष 1969, 1989, 1991, 1993, 1998 व 2002 में भिनगा विधानसभा क्षेत्र से सदन में नुमाइंदगी करने वाले चंद्रमणि कांत सिंह ने अपनी विरासत को सबसे पहले 2007 में सपा से अपनी दूसरी पत्नी सुभाश्री देवी के नाम वरासत करने का प्रयास किया था। लेकिन उन्हें चुनाव में शिकस्त का सामना करना पड़ा था। वह तीसरे स्थान पर पहुंच गई थीं। यह वह अवसर था जब पहली बार इस विधानसभा सीट पर बसपा का कब्जा दद्दन मिश्रा के रूप में हुआ। इसी के बाद राजा चंद्रमणि कांत सिंह ने दूसरी बार 2017 में भाजपा के चुनाव चिह्न पर अपने पुत्र अलक्षेंद्र कांत सिंह को चुनावी मैदान में उतारा।
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यह वह दौर था जब माना जाता था चारों तरफ भाजपा की लहर चल रही है। इस चुनाव ने भाजपा ने भारी बहुमत के साथ प्रदेश में सरकार भी बनाई थी। लेकिन इस प्रचंड माहौल के बाद भी राजा चंद्रमणि कांत सिंह के पुत्र को जनता ने अपना साथ नहीं दिया। इस चुनाव में फिर से बसपा के असलम रायनी को जनता ने अपना समर्थन दिया। ऐसे में ही यदि नामों की फेहरिस्त पर जाएं तो भिनगा विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक रहे 1952 व 1957 में कांग्रेस के आरके राव के आगे की पीढ़ी इस विधानसभा में कभी सफल नहीं हुई। इसी सूची में 1967,1974 व1977 में जनसंघ से विधायक बने कमला प्रसाद वर्मा की पीढ़ी राजनीति के अखाड़े से दूर ही हो गई। ऐसे ही 1980 व 1985 में दो बार निर्दल विधायक रहे खुर्शीद अहमद की अगली पीढ़ी ने कई बार अपनी विरासत को वरासत के रूप में लेने के लिए जनता के दरबार तक पहुंची। लेकिन जनता ने अपनी मोहर नहीं लगाई।
यही स्थिति पहले इकौना विधानसभा क्षेत्र जिसका नाम बदल कर श्रावस्ती विधानसभा क्षेत्र रखा गया। उसमें कांग्रेस के 1952 व 1957 में विधायक रहे बाबू शिवशरण लाल, 1967 व 1969 में जनसंघ के विधायक भगौती प्रसाद, 1989 व 1991 में भाजपा के विष्णू दयाल व 1993, 1998 व 2002 में लगातार इकौना से विधायक रहे अक्षयवरलाल गोंड जो मौजूदा समय बहराइच के सांसद हैं। लेकिन कभी उनकी पीढ़ी उनके विधानसभा क्षेत्र से अपनी विरासत नहीं दर्ज करा पाई। जबकि इन सभी नेताओं की अगली पीढ़ियां राजनीति में अपना भाग्य आजमा रही हैं।
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जिले में दो विधानसभाएं हैं। दोनों विधानसभाएं 1952 से ही हैं। जब से विधानसभा का चुनाव जिले के लिए शुरू हुआ। तभी से अधिकांश प्रतिनिधि कम से कम दो बार चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे। लेकिन राजा चंद्रमणि कांत सिंह का नाम इस सूची में सबसे आगे है। वह छह बार भिनगा विधानसभा का प्रतिनिधित्व करते हुए सदन पहुंचे। लेकिन इन धुरंधर नेताओं की आने वाली पीढ़ी शायद उतनी भाग्यशाली नहीं थी। जितना कि वह स्वयं। जनता ने पुराने धुरंधर नेताओं पर अपनी आस्था व्यक्त की। लेकिन जब उनकी विरासत का वरासत होने का समय आया तो जनता ने अपना हाथ पीछे खींच लिया। जिससे उनके अगली पीढ़ी को शिकस्त का सामना करना पड़ा।
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ऐसे ही देखा जाए तो वर्ष 1969, 1989, 1991, 1993, 1998 व 2002 में भिनगा विधानसभा क्षेत्र से सदन में नुमाइंदगी करने वाले चंद्रमणि कांत सिंह ने अपनी विरासत को सबसे पहले 2007 में सपा से अपनी दूसरी पत्नी सुभाश्री देवी के नाम वरासत करने का प्रयास किया था। लेकिन उन्हें चुनाव में शिकस्त का सामना करना पड़ा था। वह तीसरे स्थान पर पहुंच गई थीं। यह वह अवसर था जब पहली बार इस विधानसभा सीट पर बसपा का कब्जा दद्दन मिश्रा के रूप में हुआ। इसी के बाद राजा चंद्रमणि कांत सिंह ने दूसरी बार 2017 में भाजपा के चुनाव चिह्न पर अपने पुत्र अलक्षेंद्र कांत सिंह को चुनावी मैदान में उतारा।
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यह वह दौर था जब माना जाता था चारों तरफ भाजपा की लहर चल रही है। इस चुनाव ने भाजपा ने भारी बहुमत के साथ प्रदेश में सरकार भी बनाई थी। लेकिन इस प्रचंड माहौल के बाद भी राजा चंद्रमणि कांत सिंह के पुत्र को जनता ने अपना साथ नहीं दिया। इस चुनाव में फिर से बसपा के असलम रायनी को जनता ने अपना समर्थन दिया। ऐसे में ही यदि नामों की फेहरिस्त पर जाएं तो भिनगा विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक रहे 1952 व 1957 में कांग्रेस के आरके राव के आगे की पीढ़ी इस विधानसभा में कभी सफल नहीं हुई। इसी सूची में 1967,1974 व1977 में जनसंघ से विधायक बने कमला प्रसाद वर्मा की पीढ़ी राजनीति के अखाड़े से दूर ही हो गई। ऐसे ही 1980 व 1985 में दो बार निर्दल विधायक रहे खुर्शीद अहमद की अगली पीढ़ी ने कई बार अपनी विरासत को वरासत के रूप में लेने के लिए जनता के दरबार तक पहुंची। लेकिन जनता ने अपनी मोहर नहीं लगाई।
यही स्थिति पहले इकौना विधानसभा क्षेत्र जिसका नाम बदल कर श्रावस्ती विधानसभा क्षेत्र रखा गया। उसमें कांग्रेस के 1952 व 1957 में विधायक रहे बाबू शिवशरण लाल, 1967 व 1969 में जनसंघ के विधायक भगौती प्रसाद, 1989 व 1991 में भाजपा के विष्णू दयाल व 1993, 1998 व 2002 में लगातार इकौना से विधायक रहे अक्षयवरलाल गोंड जो मौजूदा समय बहराइच के सांसद हैं। लेकिन कभी उनकी पीढ़ी उनके विधानसभा क्षेत्र से अपनी विरासत नहीं दर्ज करा पाई। जबकि इन सभी नेताओं की अगली पीढ़ियां राजनीति में अपना भाग्य आजमा रही हैं।