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नेपाल से पारिवारिक रिश्ते भावनाएं बांटना मुश्किल
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श्रावस्ती। भारत के साथ नेपाल के संबंध भले ही इस समय राजनीतिक तौर पर तनावपूर्ण हों लेकिन, दोनों ओर रोटी व बेटी के संबंध आज भी मधुर हैं। श्रावस्ती की हजारों बेटियां नेपाल में कुटुंब बढ़ा रही हैं। वहीं नेपाल की भी बेटियां श्रावस्ती में वंश वृक्ष को समृद्ध कर रही हैं।
यह परंपराएं हजारों साल से चल रही हैं। यहां से प्रति वर्ष वहां डोलियां जाती हैं और आती हैं। लेकिन ताजा हालात से दोनों देशों के लोग पशोपेश में हैं। आज जहां स्थानीय अभिभावक अपनी बेटी व बहू को लेकर परेशान हैं। तो यहां या फिर वहां के रहने वाले लोग अपने व्यापार के भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
भारत व नेपाल का संबंध आज के नहीं हैं। हजारों वर्षों से लोग एक-दूसरे पर निर्भर हैं। खासतौर पर श्रावस्ती के संबंध पड़ोसी देश नेपाल से अलग ही हैं। इसका आंकलन इसी से किया जा सकता है कि लगभग 1100 ईसवीं में राजा सुहेलदेव के उत्तराधिकारी महाराजा हरि सिंह देव श्रावस्ती से नेपाल में जाकर बस गये थे।
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वहां पर उन्होंने ठकुरी वंश की स्थापना की थी। यह परंपराएं यहीं नहीं रुकीं। लगातार नेपाल व श्रावस्ती के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित होते रहे हैं। ऐसा कोई वर्ष नहीं बीता जिसमें श्रावस्ती से दूल्हा सज धज कर नेपाल न गया हो या फिर नेपाल से दूल्हा श्रावस्ती न आया हो।
ताजा हालत यह है कि यदि केवल भिनगा नगर में ही देख जाए तो करीब दो हजार से अधिक बेटियां नेपाल में ब्याही हैं, तो वहां की बेटियां भी जिले में हैं। आम लोगों का कहना है कि माहौल चाहे जो भी हो भावनाओं को बांटना आसान नहीं होगा। नियम चाहे जो बनें लेकिन एक दूसरे से संबंध कभी नहीं टूटेंगे।
यही नहीं नेपाल में रहने वाले परिवार ताजा व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं। वहीं भारतीय लोग भी सरकार से अपेक्षा कर रहे हैं कि वह रोटी बेटी के इस संबंध को सीमा की रेखाओं से अलग करने वाले नेपाल के विचारों में हस्तक्षेप करे।
नेपाल से मेरा पीढ़ियों का संबंध
मेरे नाना नेपालगंज के एमटी स्कूल के निकट रहते हैं। वहां उनकी दुकान है। मौसी सहनीदेव नेपाल की भूतपूर्व सांसद व नेपाल महिला आयोग की सदस्य रही हैं। हम लोगों का लगभग रोज का आना जाना है। नेपाल सरकार भले ही कानूनी दांव-पेच से सीमा रेखा को और गाढ़ा करना चाहती हो लेकिन मन की रेखा को अलग नहीं किया जा सकता। सरकार के इस फैसले का मधेसी फोरम विरोध कर रहा है। नेपाल सरकार को अपना विचार वापस लेना होगा। - जगदंबिका प्रसाद, व्यापारी भिनगा
अचानक परिवर्तन चीन की चाल
नेपाल से मेरा लगभग पीढ़ियों का संबंध है। मेरा विवाह नेपाल आंख अस्पताल के पास में हुआ है। मेरी पत्नी रेखा व मेरा वैवाहिक जीवन लगभग चौदह वर्ष पुराना है। कभी भी कोई समस्या नहीं आई। नेपाल जाने पर हमेशा से सम्मान मिलता है। यहां तक कि नेपाली मूल के पहाड़ी भी ऐसे संबंधों को महत्व देते हैं। अचानक हो रहा परिवर्तन चीन की ही चाल है।
- वेद गुप्ता व पत्नी रेखा देवी
जब नेपाल मूल के लोगों ने ही की थी सारी व्यवस्था
मुझे वह दिन याद है जब मैं बरात लेकर नेपालगंज गया था। बॉर्डर पार करने में देर हो गई थी। जिसके चलते गाड़ियों को बॉर्डर पर रोक दिया गया था। इसकी सूचना जग नेपालगंज पहुंची तो नेपाली मूल के कई स्थानीय नेता बॉर्डर पर गये थे। वहां सभी की गाड़ियां सीमा के अंदर ले ली गई। यही नहीं सारी व्यवस्था भी नेपाली मूल के लोगों ने की थी। उस समय मधेशी व नेपाली का कोई बंटवारा नहीं था। - बृजेश कुमार गुप्ता अपनी पत्नी पिंकी गुप्ता व बच्चे के साथ
परिवारों को सीमा रेखा में बांधना होगा मुश्किल
भारत व नेपाल की सीमा पर दुश्मनों जैसा व्यवहार कभी नहीं हो सकता। इसका कारण है कि नेपाल मूल के लोगों में भी हमारी ही संस्कृति घुली बसी है। हमारे लगभग सभी त्योहार वहां मनाए जाते हैं। तीस से पैंतीस फीसदी नेपाली मूल का विवाह भी मधेशी परिवार में हुआ या फिर मधेशी में नेपाली मूल का हुआ है। ऐसे में सीमा रेखा से रक्त के संबंध को कैसे अलग किया जा सकता है।
-समीर
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यह परंपराएं हजारों साल से चल रही हैं। यहां से प्रति वर्ष वहां डोलियां जाती हैं और आती हैं। लेकिन ताजा हालात से दोनों देशों के लोग पशोपेश में हैं। आज जहां स्थानीय अभिभावक अपनी बेटी व बहू को लेकर परेशान हैं। तो यहां या फिर वहां के रहने वाले लोग अपने व्यापार के भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
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भारत व नेपाल का संबंध आज के नहीं हैं। हजारों वर्षों से लोग एक-दूसरे पर निर्भर हैं। खासतौर पर श्रावस्ती के संबंध पड़ोसी देश नेपाल से अलग ही हैं। इसका आंकलन इसी से किया जा सकता है कि लगभग 1100 ईसवीं में राजा सुहेलदेव के उत्तराधिकारी महाराजा हरि सिंह देव श्रावस्ती से नेपाल में जाकर बस गये थे।
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वहां पर उन्होंने ठकुरी वंश की स्थापना की थी। यह परंपराएं यहीं नहीं रुकीं। लगातार नेपाल व श्रावस्ती के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित होते रहे हैं। ऐसा कोई वर्ष नहीं बीता जिसमें श्रावस्ती से दूल्हा सज धज कर नेपाल न गया हो या फिर नेपाल से दूल्हा श्रावस्ती न आया हो।
ताजा हालत यह है कि यदि केवल भिनगा नगर में ही देख जाए तो करीब दो हजार से अधिक बेटियां नेपाल में ब्याही हैं, तो वहां की बेटियां भी जिले में हैं। आम लोगों का कहना है कि माहौल चाहे जो भी हो भावनाओं को बांटना आसान नहीं होगा। नियम चाहे जो बनें लेकिन एक दूसरे से संबंध कभी नहीं टूटेंगे।
यही नहीं नेपाल में रहने वाले परिवार ताजा व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं। वहीं भारतीय लोग भी सरकार से अपेक्षा कर रहे हैं कि वह रोटी बेटी के इस संबंध को सीमा की रेखाओं से अलग करने वाले नेपाल के विचारों में हस्तक्षेप करे।
नेपाल से मेरा पीढ़ियों का संबंध
मेरे नाना नेपालगंज के एमटी स्कूल के निकट रहते हैं। वहां उनकी दुकान है। मौसी सहनीदेव नेपाल की भूतपूर्व सांसद व नेपाल महिला आयोग की सदस्य रही हैं। हम लोगों का लगभग रोज का आना जाना है। नेपाल सरकार भले ही कानूनी दांव-पेच से सीमा रेखा को और गाढ़ा करना चाहती हो लेकिन मन की रेखा को अलग नहीं किया जा सकता। सरकार के इस फैसले का मधेसी फोरम विरोध कर रहा है। नेपाल सरकार को अपना विचार वापस लेना होगा। - जगदंबिका प्रसाद, व्यापारी भिनगा
अचानक परिवर्तन चीन की चाल
नेपाल से मेरा लगभग पीढ़ियों का संबंध है। मेरा विवाह नेपाल आंख अस्पताल के पास में हुआ है। मेरी पत्नी रेखा व मेरा वैवाहिक जीवन लगभग चौदह वर्ष पुराना है। कभी भी कोई समस्या नहीं आई। नेपाल जाने पर हमेशा से सम्मान मिलता है। यहां तक कि नेपाली मूल के पहाड़ी भी ऐसे संबंधों को महत्व देते हैं। अचानक हो रहा परिवर्तन चीन की ही चाल है।
- वेद गुप्ता व पत्नी रेखा देवी
जब नेपाल मूल के लोगों ने ही की थी सारी व्यवस्था
मुझे वह दिन याद है जब मैं बरात लेकर नेपालगंज गया था। बॉर्डर पार करने में देर हो गई थी। जिसके चलते गाड़ियों को बॉर्डर पर रोक दिया गया था। इसकी सूचना जग नेपालगंज पहुंची तो नेपाली मूल के कई स्थानीय नेता बॉर्डर पर गये थे। वहां सभी की गाड़ियां सीमा के अंदर ले ली गई। यही नहीं सारी व्यवस्था भी नेपाली मूल के लोगों ने की थी। उस समय मधेशी व नेपाली का कोई बंटवारा नहीं था। - बृजेश कुमार गुप्ता अपनी पत्नी पिंकी गुप्ता व बच्चे के साथ
परिवारों को सीमा रेखा में बांधना होगा मुश्किल
भारत व नेपाल की सीमा पर दुश्मनों जैसा व्यवहार कभी नहीं हो सकता। इसका कारण है कि नेपाल मूल के लोगों में भी हमारी ही संस्कृति घुली बसी है। हमारे लगभग सभी त्योहार वहां मनाए जाते हैं। तीस से पैंतीस फीसदी नेपाली मूल का विवाह भी मधेशी परिवार में हुआ या फिर मधेशी में नेपाली मूल का हुआ है। ऐसे में सीमा रेखा से रक्त के संबंध को कैसे अलग किया जा सकता है।
-समीर