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2.83 करोड़ से जेम पोर्टल के मार्फत होगी स्वेटर खरीद
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श्रावस्ती। परिषदीय स्कूलों के बच्चों को 15 अक्तूबर से स्वेटर मिलेगा। इसकी प्रक्रिया प्रारंभ हो गई है। निशुल्क स्वेटर वितरण के लिए दो करोड़ तिरासी लाख रुपये खर्च होंगे। यह खरीद जेम पोर्टल से की जाएगी।
परिषदीय विद्यालयों में स्कूल टू स्कूल स्वेटर की खरीद व बिक्री नहीं होगी। अब अलग-अलग विद्यालयों में भिन्न-भिन्न गुणवत्ता वाला सामान नहीं होगा, पूरी खरीद केंद्रीकृत होगी। खरीद प्रक्रिया का संचालन बीएसए कार्यालय से ही होगा। इसके लिए प्रक्रिया भी प्रारंभ हो गई है। खरीद के लिए जेम पोर्टल को अधिकृत किया गया है।
इस पोर्टल पर विभाग द्वारा ऑनलाइन नोटीफिकेशन किया जाएगा। इसी के बाद पोर्टल पर मौजूद निर्माता व विक्रेता अपना टेंडर डाल सकेंगे। ऑनलाइन टेंडर के माध्यम से ही विक्रेता का चयन होगा। यही नहीं विक्रेता को अपने प्रोडक्ट की क्वालिटी की भी जांच करानी होगी। इसके तहत जो भी प्रोडक्ट स्वीकृत होगा, उसी की आपूर्ति पूरे जिले में होगी।
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बीएसए ओमकार राणा ने कहा कि यह प्रक्रिया अभी नई है। फिलहाल जेम पोर्टल पर नोटिफिकेशन किया गया है। अभी टेंडर में लोगों को प्रतिभाग करने दीजिए। इसके बाद क्वालिटी भी देखी जाएगी।
इतने की होगी खरीद
जेम पोर्टल के तहत जिले में अध्ययनरत एक लाख इकचालिस हजार तीन सौ छप्पन बच्चों के लिए दो सौ रुपये प्रति स्वेटर की दर से दो करोड़ बयासी लाख इकहत्तर हजार दो सौ रुपये से स्वेटर खरीदा जाना है। इस नई व्यवस्था के तहत टेंडर तो बीएसए कार्यालय द्वारा निकाला जाएगा लेकिन स्वेटर संगठित रूप से बीईओ द्वारा प्राप्त किया जाएगा। वहीं से स्कूलों में मांग के सापेक्ष आपूर्ति होगी।
प्रक्रिया नई लेकिन विक्रेता पुराने
जेम पोर्टल से खरीद की प्रक्रिया नई है लेकिन विक्रेता सबके सब पुराने हैं। सभी विक्रेताओं ने जेम पोर्टल पर अपना पंजीकरण करा लिया। जिले में तो कुछ ऐसे भी विक्रेता हैं जो मिलीभगत करके अपने प्रोडक्ट का चयन करवाने की फिराक में हैं। इसी के बाद वही पेटी कांट्रेक्टरों के माध्यम से आपूर्ति करेंगे।
न नाप, न साइज फिर भी प्रक्रिया प्रारंभ
छात्र-छात्राओं को कितने नंबर का स्वेटर लगेगा, इसका सर्वेक्षण विभाग द्वारा नहीं किया गया है। केवल कक्षा के अनुसार छात्र संख्या को आधार मानकर डिमांड जनरेट किया गया है।
फोटो देख कर जांची जाएगी गुणवत्ता
जेम पोर्टल पर मौजूद विक्रेताओं ने स्वेटर की फोटो अपलोड कर रखी है। इसी के साथ ही उसके मूल्य का टैग भी है जिसे देखकर विभाग को उसकी गुणवत्ता पहचाननी होगी। इसी के आधार पर उसे टेंडर भी फाइनल करना होगा। टेंडर फाइनल होने के बाद ठेकेदार को प्रोडक्ट दिखाना होगा जिसकी मिलान फोटो से की जा सकती है।
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परिषदीय विद्यालयों में स्कूल टू स्कूल स्वेटर की खरीद व बिक्री नहीं होगी। अब अलग-अलग विद्यालयों में भिन्न-भिन्न गुणवत्ता वाला सामान नहीं होगा, पूरी खरीद केंद्रीकृत होगी। खरीद प्रक्रिया का संचालन बीएसए कार्यालय से ही होगा। इसके लिए प्रक्रिया भी प्रारंभ हो गई है। खरीद के लिए जेम पोर्टल को अधिकृत किया गया है।
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इस पोर्टल पर विभाग द्वारा ऑनलाइन नोटीफिकेशन किया जाएगा। इसी के बाद पोर्टल पर मौजूद निर्माता व विक्रेता अपना टेंडर डाल सकेंगे। ऑनलाइन टेंडर के माध्यम से ही विक्रेता का चयन होगा। यही नहीं विक्रेता को अपने प्रोडक्ट की क्वालिटी की भी जांच करानी होगी। इसके तहत जो भी प्रोडक्ट स्वीकृत होगा, उसी की आपूर्ति पूरे जिले में होगी।
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बीएसए ओमकार राणा ने कहा कि यह प्रक्रिया अभी नई है। फिलहाल जेम पोर्टल पर नोटिफिकेशन किया गया है। अभी टेंडर में लोगों को प्रतिभाग करने दीजिए। इसके बाद क्वालिटी भी देखी जाएगी।
इतने की होगी खरीद
जेम पोर्टल के तहत जिले में अध्ययनरत एक लाख इकचालिस हजार तीन सौ छप्पन बच्चों के लिए दो सौ रुपये प्रति स्वेटर की दर से दो करोड़ बयासी लाख इकहत्तर हजार दो सौ रुपये से स्वेटर खरीदा जाना है। इस नई व्यवस्था के तहत टेंडर तो बीएसए कार्यालय द्वारा निकाला जाएगा लेकिन स्वेटर संगठित रूप से बीईओ द्वारा प्राप्त किया जाएगा। वहीं से स्कूलों में मांग के सापेक्ष आपूर्ति होगी।
प्रक्रिया नई लेकिन विक्रेता पुराने
जेम पोर्टल से खरीद की प्रक्रिया नई है लेकिन विक्रेता सबके सब पुराने हैं। सभी विक्रेताओं ने जेम पोर्टल पर अपना पंजीकरण करा लिया। जिले में तो कुछ ऐसे भी विक्रेता हैं जो मिलीभगत करके अपने प्रोडक्ट का चयन करवाने की फिराक में हैं। इसी के बाद वही पेटी कांट्रेक्टरों के माध्यम से आपूर्ति करेंगे।
न नाप, न साइज फिर भी प्रक्रिया प्रारंभ
छात्र-छात्राओं को कितने नंबर का स्वेटर लगेगा, इसका सर्वेक्षण विभाग द्वारा नहीं किया गया है। केवल कक्षा के अनुसार छात्र संख्या को आधार मानकर डिमांड जनरेट किया गया है।
फोटो देख कर जांची जाएगी गुणवत्ता
जेम पोर्टल पर मौजूद विक्रेताओं ने स्वेटर की फोटो अपलोड कर रखी है। इसी के साथ ही उसके मूल्य का टैग भी है जिसे देखकर विभाग को उसकी गुणवत्ता पहचाननी होगी। इसी के आधार पर उसे टेंडर भी फाइनल करना होगा। टेंडर फाइनल होने के बाद ठेकेदार को प्रोडक्ट दिखाना होगा जिसकी मिलान फोटो से की जा सकती है।