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आरक्षण ही नहीं आधी आबादी को मिले पूरा हक
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श्रावस्ती। आरक्षण देने मात्र से महिलाएं समाज की मुख्य धारा में नहीं जुड़ सकेंगी। इसके लिए पुरुषों को अपनी मानसिकता में भी बदलाव लाना होगा।
महिलाओं को समाज में उनका पूरा हक देना होगा। यह बातें अमर उजाला की मुहिम अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स के तहत गुरुवार को उच्च प्राथमिक विद्यालय कटरा में परिचर्चा के दौरान अतिथियों ने कहीं।
कार्यक्रम में महामाया राजकीय महाविद्यालय इकौना की छात्राओं ने महिला अधिकारों को धरातल पर उतारने की पुरजोर वकालत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्रवक्ता डॉ. एसएन वर्मा ने की।
उन्होंने कहा कि महिलाएं देश की आधी आबादी है। जिन्हें संविधान में आरक्षण देकर आगे बढ़ने का मौका दिया गया है। आज भी कई क्षेत्रों में वह अपनी सोच व क्षमता का प्रदर्शन करने से वंचित हैं।
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उच्च प्राथमिक विद्यालय की सहायक शिक्षिका सुषमा तिवारी ने महिलाओं को अपनी सोच व क्षमता के प्रदर्शन के लिए पूरा मौका देने की बात कही।
आरक्षण के कारण आज भले ही महिलाएं ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक के पदों पर आसीन हों, लेकिन वह सिर्फ कठपुतली बनी हुई हैं। समाज में आज भी उन्हें वह अधिकार नहीं मिले है, जिसकी वह पात्र हैं।
- सुषमा तिवारी
कुछ महिलाओं को छोड़ दिया जाए तो शेष महिला जन प्रतिनिधियों का कार्य पुरुष ही करते हैं। यहां तक कि बैठकों में भी उनके स्थान पर प्रतिनिधि जा रहे हैं। महिलाएं देश की आधी आबादी है, ऐसे में यह भेद भाव गलत है।
- शीलम
समाज भले ही महिलाओं के अधिकारों के प्रति खुल कर बोले, लेकिन यही अधिकार जब परिवार में बहू बेटियों को देने की बात आती है तो वह दोहरी नीति अपनाते हैं। पुरुषों के समान ही महिलाओं को भी उनका पूरा हक मिले।
- सुनीता
महिला और पुरुष दोनों ही समाज में एक दूसरे के पूरक हैं। ऐसे में राष्ट्र व समाज के विकास में महिलाओं की भी राय लेनी चाहिए। महिलाओं पर समाज को जबरदस्ती अपनी मर्जी थोपने से बचना चाहिए। तभी समानता आएगी।
- खुशबू
आज हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर उनके साथ खड़ी हैं। ऐसे में जब अपने घर परिवार की महिलाओं को बाहर निकलने की बात आती है तो परिवार के लोग चुप्पी साध लेते हैं, इसमें बदलाव की जरूरत है।
- ममता शर्मा
आज देश में बढ़ती आबादी विकराल समस्या बनती जा रही है। इसके बावजूद परिवार नियोजन की जिम्मेदारी पुरुष महिलाओं पर ही थोप रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े इसका प्रमाण है। लोगों को यह सोच बदलनी होगी।
- सरिता देवी
बेटा व बेटी दोनों ही समान है। इसके बावजूद आज भी समाज बेटों को ही अधिक महत्व दे रहा है। पुत्र की चाह में जहां कन्या भ्रूण हत्या की जा रही है, जो गलत है। इसको रोकने के लिए समाज के हर तबके को आगे आना होगा।
- इकरा परवीन
आज के समय में बेटियां किसी पर बोझ नहीं रहीं। उन्हें बेहतर देखभाल, शिक्षा व स्वास्थ्य मुहैया कराएं। बेटियों के अपने पैरों पर खड़ा होने के बाद ही उनके विवाह के बारे में सोचना चाहिए, तभी बेटियों को मूल अधिकार मिलेंगे।
- गीता
शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े इस जिले में आज भी लोग अंधविश्वास पर ध्यान देते हैं। बेटियों की कम उम्र में शादी कर जिम्मेदारी से मुक्ति ले लेते हैं। यह गलत है। इससे बेटियों को शारीरिक व मानसिक परेशानियों का समाना करना पड़ता है।
- शालिनी
सभी माता पिता चाहते हैं कि उनकी बेटी जिस घर में जाए वहां वह रानी बनकर रहे, लेकिन बहू से अपेक्षा करते हैं कि वह नौकरानी की तरह घर का सारा काम करे। यह भेद भाव मिटाना होगा, क्यों कि बहू भी किसी की बेटी है।
- कांती देवी
महिलाओं के पिछड़ेपन और उपेक्षा के लिए पुरुष के साथ ही महिलाएं भी बराबर की जिम्मेदार हैं। यदि किसी घर में बहू अथवा बेटी के साथ अन्याय होता है तो उस परिवार की महिला भी उसमें बराबर की दोषी होती है।
- सुमन चौधरी
माता पिता पहले बेटियों को पढ़ने व आगे बढ़ाने के लिए यथा संभव सहयोग करें। यह भी प्रयास करें कि बेटी पहले आत्म निर्भर बने। इसके बाद सही उम्र आने पर ही उनकी शादी के बारे में सोचें। इससे वे हमेशा खुश रहेगी।
- मधु आनंद
अधिकारियों को चाहिए कि बैठकों में यदि महिलाओं के स्थान पर उनके परिवार के पुरुष प्रतिनिधि आए तो उन्हें बाहर कर दें। जब ऐसा होगा तभी महिलाओं को आगे बढ़ कर सबके सामने अपनी बात रखने का मौका मिलेगा।
- रोशनी पटवा
महिलाओं के स्वास्थ्य व शिक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा। जिस दिन महिलाएं स्वस्थ व शिक्षित हो जाएंगी। उस दिन न सिर्फ उनका शोषण कम होगा बल्कि वह भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन सबके सामने कर सकेंगी।
- अनुपमा तिवारी
नारी अबला ही नहीं सबला भी है। वह घर के चूल्हा चौकी से लेकर देश की रक्षा के लिए लड़ाकू विमान भी चलाने की क्षमता रखती है। ऐसे में उसे कमजोर मानने वाले लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी।
- अंचल गुप्ता
संतुलन हर क्षेत्र में जरूरी है, चाहे वह पर्यावरण संतुलन हो या जनसंख्या के लिंगानुपात का संतुलन। इसे बराबर जब तक नहीं किया जाएगा तब तक इसका दुष्परिणाम दुनिया और समाज को समय समय पर भुगतना पड़ेगा।
- सुमन
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महिलाओं को समाज में उनका पूरा हक देना होगा। यह बातें अमर उजाला की मुहिम अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स के तहत गुरुवार को उच्च प्राथमिक विद्यालय कटरा में परिचर्चा के दौरान अतिथियों ने कहीं।
कार्यक्रम में महामाया राजकीय महाविद्यालय इकौना की छात्राओं ने महिला अधिकारों को धरातल पर उतारने की पुरजोर वकालत की। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय के प्रवक्ता डॉ. एसएन वर्मा ने की।
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उन्होंने कहा कि महिलाएं देश की आधी आबादी है। जिन्हें संविधान में आरक्षण देकर आगे बढ़ने का मौका दिया गया है। आज भी कई क्षेत्रों में वह अपनी सोच व क्षमता का प्रदर्शन करने से वंचित हैं।
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उच्च प्राथमिक विद्यालय की सहायक शिक्षिका सुषमा तिवारी ने महिलाओं को अपनी सोच व क्षमता के प्रदर्शन के लिए पूरा मौका देने की बात कही।
आरक्षण के कारण आज भले ही महिलाएं ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक के पदों पर आसीन हों, लेकिन वह सिर्फ कठपुतली बनी हुई हैं। समाज में आज भी उन्हें वह अधिकार नहीं मिले है, जिसकी वह पात्र हैं।
- सुषमा तिवारी
कुछ महिलाओं को छोड़ दिया जाए तो शेष महिला जन प्रतिनिधियों का कार्य पुरुष ही करते हैं। यहां तक कि बैठकों में भी उनके स्थान पर प्रतिनिधि जा रहे हैं। महिलाएं देश की आधी आबादी है, ऐसे में यह भेद भाव गलत है।
- शीलम
समाज भले ही महिलाओं के अधिकारों के प्रति खुल कर बोले, लेकिन यही अधिकार जब परिवार में बहू बेटियों को देने की बात आती है तो वह दोहरी नीति अपनाते हैं। पुरुषों के समान ही महिलाओं को भी उनका पूरा हक मिले।
- सुनीता
महिला और पुरुष दोनों ही समाज में एक दूसरे के पूरक हैं। ऐसे में राष्ट्र व समाज के विकास में महिलाओं की भी राय लेनी चाहिए। महिलाओं पर समाज को जबरदस्ती अपनी मर्जी थोपने से बचना चाहिए। तभी समानता आएगी।
- खुशबू
आज हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर उनके साथ खड़ी हैं। ऐसे में जब अपने घर परिवार की महिलाओं को बाहर निकलने की बात आती है तो परिवार के लोग चुप्पी साध लेते हैं, इसमें बदलाव की जरूरत है।
- ममता शर्मा
आज देश में बढ़ती आबादी विकराल समस्या बनती जा रही है। इसके बावजूद परिवार नियोजन की जिम्मेदारी पुरुष महिलाओं पर ही थोप रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े इसका प्रमाण है। लोगों को यह सोच बदलनी होगी।
- सरिता देवी
बेटा व बेटी दोनों ही समान है। इसके बावजूद आज भी समाज बेटों को ही अधिक महत्व दे रहा है। पुत्र की चाह में जहां कन्या भ्रूण हत्या की जा रही है, जो गलत है। इसको रोकने के लिए समाज के हर तबके को आगे आना होगा।
- इकरा परवीन
आज के समय में बेटियां किसी पर बोझ नहीं रहीं। उन्हें बेहतर देखभाल, शिक्षा व स्वास्थ्य मुहैया कराएं। बेटियों के अपने पैरों पर खड़ा होने के बाद ही उनके विवाह के बारे में सोचना चाहिए, तभी बेटियों को मूल अधिकार मिलेंगे।
- गीता
शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़े इस जिले में आज भी लोग अंधविश्वास पर ध्यान देते हैं। बेटियों की कम उम्र में शादी कर जिम्मेदारी से मुक्ति ले लेते हैं। यह गलत है। इससे बेटियों को शारीरिक व मानसिक परेशानियों का समाना करना पड़ता है।
- शालिनी
सभी माता पिता चाहते हैं कि उनकी बेटी जिस घर में जाए वहां वह रानी बनकर रहे, लेकिन बहू से अपेक्षा करते हैं कि वह नौकरानी की तरह घर का सारा काम करे। यह भेद भाव मिटाना होगा, क्यों कि बहू भी किसी की बेटी है।
- कांती देवी
महिलाओं के पिछड़ेपन और उपेक्षा के लिए पुरुष के साथ ही महिलाएं भी बराबर की जिम्मेदार हैं। यदि किसी घर में बहू अथवा बेटी के साथ अन्याय होता है तो उस परिवार की महिला भी उसमें बराबर की दोषी होती है।
- सुमन चौधरी
माता पिता पहले बेटियों को पढ़ने व आगे बढ़ाने के लिए यथा संभव सहयोग करें। यह भी प्रयास करें कि बेटी पहले आत्म निर्भर बने। इसके बाद सही उम्र आने पर ही उनकी शादी के बारे में सोचें। इससे वे हमेशा खुश रहेगी।
- मधु आनंद
अधिकारियों को चाहिए कि बैठकों में यदि महिलाओं के स्थान पर उनके परिवार के पुरुष प्रतिनिधि आए तो उन्हें बाहर कर दें। जब ऐसा होगा तभी महिलाओं को आगे बढ़ कर सबके सामने अपनी बात रखने का मौका मिलेगा।
- रोशनी पटवा
महिलाओं के स्वास्थ्य व शिक्षा पर विशेष ध्यान देना होगा। जिस दिन महिलाएं स्वस्थ व शिक्षित हो जाएंगी। उस दिन न सिर्फ उनका शोषण कम होगा बल्कि वह भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन सबके सामने कर सकेंगी।
- अनुपमा तिवारी
नारी अबला ही नहीं सबला भी है। वह घर के चूल्हा चौकी से लेकर देश की रक्षा के लिए लड़ाकू विमान भी चलाने की क्षमता रखती है। ऐसे में उसे कमजोर मानने वाले लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी।
- अंचल गुप्ता
संतुलन हर क्षेत्र में जरूरी है, चाहे वह पर्यावरण संतुलन हो या जनसंख्या के लिंगानुपात का संतुलन। इसे बराबर जब तक नहीं किया जाएगा तब तक इसका दुष्परिणाम दुनिया और समाज को समय समय पर भुगतना पड़ेगा।
- सुमन