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क्रांतिकारियों का ठिकाना रहा गांव भैंसवाल
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शामली क्षेत्र के गांव भैंसवाल में मार्श की कोठी
- फोटो : SHAMLI
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शामली। जिले का गांव भैंसवाल आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों का ठिकाना था। यहां पर आजादी के दीवाने इकट्ठे होकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई की योजना बनाते थे। गांव में नहर के किनारे स्थित अंग्रेज कलक्टर पीडब्ल्यू मार्श की कोठी क्रांतिकारियों के निशाने पर रहती थी। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ समय-समय पर क्रांतिकारियों ने कोठी पर जाकर अंग्रेजों के खिलाफ प्रदर्शन किया था।
गांव भैंसवाल में नहर के किनारे स्थित कोठी आज खंडहर की हालत में मौजूद है। यह कोठी अंग्रेज कलक्टर पीडब्ल्यू मार्श के नाम से जानी जाती है। यह गांव अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में क्रांतिकारियों का ठिकाना रहा है। नहर किनारे लगे पेड़ की छांव में आजादी के दीवाने बैठकर आजादी की लड़ाई की योजना बनाते थे और मार्श की कोठी क्रांतिकारियों का निशाने पर रहती थी। गांव के 92 वर्षीय चौधरी उदयवीर सिंह ने बताया कि कलक्टर मार्श का जन्म गांव भैंसवाल में इसी कोठी में हुआ था। उनके पिता सिंचाई विभाग में थे। बाद में पीडब्ल्यू मार्श 1919 से 1923 तक मुजफ्फरनगर के कलक्टर रहे थे।
इस कोठी के आसपास घना जंगल था। अंग्रेजी हुकूमत किसानों से लगान वसूलती थी, लगान न देने पर किसानों की फसल को जबरन उठाकर ले जाती थी। आजादी की लड़ाई में आसपास के लोगों में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा भड़कने लगा था। क्रांतिकारी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोठी पर इकट्ठे होकर विरोध प्रदर्शन करते थे।
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90 वर्षीय महेंद्र सिंह ने बताया कि कई बार अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों की आवाज दबाने की कोशिश की लेकिन क्रांतिकारियों ने उनका मुकाबला किया और आजादी की लड़ाई की राह पर आगे बढ़ते गए। क्रांतिकारी नहर किनारे जंगल में पेड़ों के नीचे इकट्ठे होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई की योजनाएं बनाते थे।
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खील बताशे बांटकर मनाया था आजादी का जश्न
1947 में देश के आजाद होने की जैसे ही सूचना गांव भैंसवाल में पहुंची, तो लोगों में उत्साह और उमंग का माहौल बन गया। हर तरफ जश्न का माहौल था। लोगों ने गांव में खील बताशे बांटकर आजादी की खुशियां मनाई थी। ग्रामीणों का कहना है कि देश को आजादी मिलने के बाद से मार्श की कोठी वीरान हो गई थी, जो आज खंडहर की हालत में पहुंच गई।
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गांव भैंसवाल में नहर के किनारे स्थित कोठी आज खंडहर की हालत में मौजूद है। यह कोठी अंग्रेज कलक्टर पीडब्ल्यू मार्श के नाम से जानी जाती है। यह गांव अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में क्रांतिकारियों का ठिकाना रहा है। नहर किनारे लगे पेड़ की छांव में आजादी के दीवाने बैठकर आजादी की लड़ाई की योजना बनाते थे और मार्श की कोठी क्रांतिकारियों का निशाने पर रहती थी। गांव के 92 वर्षीय चौधरी उदयवीर सिंह ने बताया कि कलक्टर मार्श का जन्म गांव भैंसवाल में इसी कोठी में हुआ था। उनके पिता सिंचाई विभाग में थे। बाद में पीडब्ल्यू मार्श 1919 से 1923 तक मुजफ्फरनगर के कलक्टर रहे थे।
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इस कोठी के आसपास घना जंगल था। अंग्रेजी हुकूमत किसानों से लगान वसूलती थी, लगान न देने पर किसानों की फसल को जबरन उठाकर ले जाती थी। आजादी की लड़ाई में आसपास के लोगों में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा भड़कने लगा था। क्रांतिकारी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोठी पर इकट्ठे होकर विरोध प्रदर्शन करते थे।
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90 वर्षीय महेंद्र सिंह ने बताया कि कई बार अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों की आवाज दबाने की कोशिश की लेकिन क्रांतिकारियों ने उनका मुकाबला किया और आजादी की लड़ाई की राह पर आगे बढ़ते गए। क्रांतिकारी नहर किनारे जंगल में पेड़ों के नीचे इकट्ठे होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई की योजनाएं बनाते थे।
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खील बताशे बांटकर मनाया था आजादी का जश्न
1947 में देश के आजाद होने की जैसे ही सूचना गांव भैंसवाल में पहुंची, तो लोगों में उत्साह और उमंग का माहौल बन गया। हर तरफ जश्न का माहौल था। लोगों ने गांव में खील बताशे बांटकर आजादी की खुशियां मनाई थी। ग्रामीणों का कहना है कि देश को आजादी मिलने के बाद से मार्श की कोठी वीरान हो गई थी, जो आज खंडहर की हालत में पहुंच गई।