विजय दिवस: शामली के वीरों ने दुश्मन के कब्जे से छुड़ाई थीं दुर्गम चोटियां, 27 साल बाद भी नहीं बना स्मारक
वर्ष 1999 में 60 दिन लंबे कारगिल युद्ध में शामली के जांबाज सैनिकों ने अदम्य साहस और पराक्रम से दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए थे।
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कारगिल युद्ध में शामिल रहे चुनसा गांव के पूर्व सैनिक विदेश मलिक ने बताया कि द्वितीय बटालियन राजपूताना राइफल्स में तेजपाल सिंह (लिलौन), सुधीर (किवाना) और संजय (बंतीखेड़ा) तैनात थे। इसी बटालियन के यशवीर सिंह (सिरसली, बागपत) और बच्चन सिंह (पचेंडा कला, मुजफ्फरनगर) युद्ध में शहीद हो गए थे।

कारगिल विजय दिवस.. विदेश मलिक
लिलौन निवासी पूर्व सैनिक तेजपाल सिंह ने बताया कि वह करीब 200 सैनिकों के दल के साथ युद्ध में तैनात थे। युद्ध के दौरान उनके दो साथी जवान शहीद हो गए, लेकिन भारतीय सेना ने पीछे हटने के बजाय दुश्मन को करारा जवाब दिया। वहीं, चूनसा निवासी नायक हवलदार लोकेंद्र मलिक युद्ध के दौरान घायल होने के बावजूद मोर्चे पर डटे रहे।
पूर्व सैनिक विदेश मलिक ने बताया कि उनकी भर्ती कारगिल युद्ध के दौरान हुई थी। युद्ध समाप्त होने के बाद जब वह कारगिल पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि भारतीय सेना ने तोलोलिंग के बाद थ्री पिंपल्स पर भी ऐतिहासिक विजय प्राप्त की थी।
27 साल बाद भी नहीं बना कारगिल शहीद स्मारक
कारगिल विजय के 27 वर्ष बाद भी शामली में शहीदों और वीर सैनिकों की स्मृति में कोई शहीद स्मारक नहीं बन सका है। पूर्व सैनिक लोकेंद्र मलिक और विदेश मलिक ने बताया कि संगठन कई बार जिला प्रशासन से शहीद स्मारक के लिए भूमि की मांग कर चुका है।
तत्कालीन जिलाधिकारी ने भूमि उपलब्ध कराने का आश्वासन भी दिया था, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। स्मारक नहीं होने के कारण शामली के पूर्व सैनिकों को कारगिल विजय दिवस पर श्रद्धांजलि देने के लिए पानीपत जाना पड़ता है।