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दुखी जीवों को सच्चे सुख का मार्ग दिखाना ही धर्म का सार : विमर्श सागर
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संवाद न्यूज एजेंसी
शामली। जैन आचार्य 108 विमर्श सागर महाराज ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने जीवन जीने का जो तरीका बताया वह केवल धार्मिक आचरण तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू होने वाला सार्वभौमिक मार्ग है। उन्होंने बताया कि संसार के दुखी जीवों को सच्चे सुख का मार्ग दिखाना ही धर्म का सार है।
दिगंबर जैन धर्मशाला में सोमवार को प्रवचन करते हुए जैन आचार्य ने कहा कि धर्म वही है, जिसमें सभी जीवों के प्रति मैत्री और सद्भाव का भाव हो। जब व्यक्ति मित्र या शत्रु, प्रशंसक या निंदक सभी के प्रति समान दृष्टि रखता है, तभी वह सच्चे धर्म के मार्ग पर चलता है।
उन्होंने बताया कि भगवान महावीर ने यह भी कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल स्वयं को सुखी बनाना नहीं, बल्कि दूसरों को दुख न देना है। मोह से उत्पन्न प्रेम सीमित होता है, जबकि सच्चा प्रेम वह है जो सभी जीवों में समान रूप से व्याप्त होता है। उन्होंने सिखाया कि धर्म की जड़ मैत्री है, जैसे वृक्ष बिना जड़ के नहीं फलता, वैसे ही धर्म बिना मैत्री के सफल नहीं हो सकता। उन्होंंने धर्म और मैत्री के संबंध को गहराई से समझाते हुए धर्म को मैत्री का पर्याय बताया।
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उन्होंने कहा कि धर्म वही है जो सभी में मित्रता, करुणा और अहिंसा का भाव जगाए। यदि किसी के जीवन में मैत्री नहीं है, तो पूजा, पाठ, व्रत या कोई भी धार्मिक कर्म केवल प्रदर्शन या ढोंग बन जाता है। सच्चा धर्म भीतर से उपजा समभाव है। धर्म के प्रत्येक अंग, दया, अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, भक्ति और पूजा में मैत्री का ही रूप छिपा है। जब व्यक्ति अपने और पराए, मित्र और शत्रु के भेद से ऊपर उठ जाता है, तब वह धर्म के शुद्ध स्वरूप को अनुभव करता है। उन्होंने मंदिर को धर्म की प्रयोगशाला बताते हुए कहा कि जैसे वैज्ञानिक प्रयोगशाला में औषधि का परीक्षण कर उसका जीवन में उपयोग किया जाता है, वैसे ही मंदिर में व्यक्ति धर्म के सिद्धांतों का अभ्यास करता है। यहां से सीखे गए सिद्धांतों को वह घर, दुकान और समाज में लागू करता है। मंदिर व्यक्ति को यह सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि आचरण में प्रकट होता है।
यही कारण है मंदिर व्यक्ति को मैत्री, समभाव और करुणा से युक्त जीवन जीने की प्रेरणा देता है, जो प्रभु महावीर का वास्तविक संदेश है।
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शामली। जैन आचार्य 108 विमर्श सागर महाराज ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने जीवन जीने का जो तरीका बताया वह केवल धार्मिक आचरण तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू होने वाला सार्वभौमिक मार्ग है। उन्होंने बताया कि संसार के दुखी जीवों को सच्चे सुख का मार्ग दिखाना ही धर्म का सार है।
दिगंबर जैन धर्मशाला में सोमवार को प्रवचन करते हुए जैन आचार्य ने कहा कि धर्म वही है, जिसमें सभी जीवों के प्रति मैत्री और सद्भाव का भाव हो। जब व्यक्ति मित्र या शत्रु, प्रशंसक या निंदक सभी के प्रति समान दृष्टि रखता है, तभी वह सच्चे धर्म के मार्ग पर चलता है।
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उन्होंने बताया कि भगवान महावीर ने यह भी कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल स्वयं को सुखी बनाना नहीं, बल्कि दूसरों को दुख न देना है। मोह से उत्पन्न प्रेम सीमित होता है, जबकि सच्चा प्रेम वह है जो सभी जीवों में समान रूप से व्याप्त होता है। उन्होंने सिखाया कि धर्म की जड़ मैत्री है, जैसे वृक्ष बिना जड़ के नहीं फलता, वैसे ही धर्म बिना मैत्री के सफल नहीं हो सकता। उन्होंंने धर्म और मैत्री के संबंध को गहराई से समझाते हुए धर्म को मैत्री का पर्याय बताया।
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उन्होंने कहा कि धर्म वही है जो सभी में मित्रता, करुणा और अहिंसा का भाव जगाए। यदि किसी के जीवन में मैत्री नहीं है, तो पूजा, पाठ, व्रत या कोई भी धार्मिक कर्म केवल प्रदर्शन या ढोंग बन जाता है। सच्चा धर्म भीतर से उपजा समभाव है। धर्म के प्रत्येक अंग, दया, अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, भक्ति और पूजा में मैत्री का ही रूप छिपा है। जब व्यक्ति अपने और पराए, मित्र और शत्रु के भेद से ऊपर उठ जाता है, तब वह धर्म के शुद्ध स्वरूप को अनुभव करता है। उन्होंने मंदिर को धर्म की प्रयोगशाला बताते हुए कहा कि जैसे वैज्ञानिक प्रयोगशाला में औषधि का परीक्षण कर उसका जीवन में उपयोग किया जाता है, वैसे ही मंदिर में व्यक्ति धर्म के सिद्धांतों का अभ्यास करता है। यहां से सीखे गए सिद्धांतों को वह घर, दुकान और समाज में लागू करता है। मंदिर व्यक्ति को यह सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि आचरण में प्रकट होता है।
यही कारण है मंदिर व्यक्ति को मैत्री, समभाव और करुणा से युक्त जीवन जीने की प्रेरणा देता है, जो प्रभु महावीर का वास्तविक संदेश है।