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राम-सीता विवाह प्रसंग सुन भाव विभोर हुए श्रद्धालु
ब्यूरो/अमर उजाला ब्यूरो, शामली
Updated Sat, 31 Dec 2016 12:10 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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कांधला। कस्बे के पूर्वी यमुना नहर स्थित प्राचीन सिद्धपीठ मनकामेश्वर महादेव मंदिर परिसर में आयोजित श्री राम कथा अमृत वर्षा के छठे दिन कथावाचक किरणचंद्र जी महाराज ने श्रीराम-सीता के विवाह का प्रसंग सुनाकर भावविभोर किया।
उन्होंने कहा कि भगवान राम-लक्षमण अपने गुरू विश्वामित्र के साथ सीता स्वयंवर में भाग लेने के लिये जनकपुरी पहुंचे। यहां भगवान राम की माता सीता से पुष्प वाटिका में भेंट होती है। दोनों एक-दूसरे को निहारते और मंद-मंद मुस्कुराते हैं। मां सीता मंदिर में जाकर सखियों के साथ गौरी पूजन कर भगवान राम को अपने मन मंदिर में विराजित कर लेती हैं।
उन्होंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने पांच प्रकार की भक्ति का वर्णन किया है। चातक श्रेणी की भक्ति उत्तम मानी गई है। ये चातक श्रेणी की भक्ति है। दूसरी कोकिल जो प्रभु का गुणगान करने वाली भक्ति है। कीर माला रटने वाली चकोर दर्शन की अभिलाषी भक्ति है। मोर भक्ति वह है जिसमें भक्त आनंदमय होकर मोर की तरह मस्त होता है।
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उन्होंने भगवान लक्ष्मण परशुराम संवाद पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जो अहंकार के वशीभूत हो जाता है वह सामने खड़े भगवान को भी नहीं पहचान पाता है। लेकिन भगवान स्वयं ही सामने आकर अपने भक्त के अंधकार रूपी अहंकार दूर करते हैं। कथा प्रसंग में महाराज श्री ने सीता स्वयंवर, विदाई और बनवास की मार्मिक लीला का वर्णन किया। इस दौरान सचिन गोयल, विपिन कुच्छल, मोहनलाल चावला, राजेंद्र उर्फ जंगी, मांगेराम, राकेश मित्तल, बाबू मौजूद रहे।
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उन्होंने कहा कि भगवान राम-लक्षमण अपने गुरू विश्वामित्र के साथ सीता स्वयंवर में भाग लेने के लिये जनकपुरी पहुंचे। यहां भगवान राम की माता सीता से पुष्प वाटिका में भेंट होती है। दोनों एक-दूसरे को निहारते और मंद-मंद मुस्कुराते हैं। मां सीता मंदिर में जाकर सखियों के साथ गौरी पूजन कर भगवान राम को अपने मन मंदिर में विराजित कर लेती हैं।
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उन्होंने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने पांच प्रकार की भक्ति का वर्णन किया है। चातक श्रेणी की भक्ति उत्तम मानी गई है। ये चातक श्रेणी की भक्ति है। दूसरी कोकिल जो प्रभु का गुणगान करने वाली भक्ति है। कीर माला रटने वाली चकोर दर्शन की अभिलाषी भक्ति है। मोर भक्ति वह है जिसमें भक्त आनंदमय होकर मोर की तरह मस्त होता है।
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उन्होंने भगवान लक्ष्मण परशुराम संवाद पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जो अहंकार के वशीभूत हो जाता है वह सामने खड़े भगवान को भी नहीं पहचान पाता है। लेकिन भगवान स्वयं ही सामने आकर अपने भक्त के अंधकार रूपी अहंकार दूर करते हैं। कथा प्रसंग में महाराज श्री ने सीता स्वयंवर, विदाई और बनवास की मार्मिक लीला का वर्णन किया। इस दौरान सचिन गोयल, विपिन कुच्छल, मोहनलाल चावला, राजेंद्र उर्फ जंगी, मांगेराम, राकेश मित्तल, बाबू मौजूद रहे।