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बदमाशों के पैरों पर गोलियां मार रही पुलिस

Sun, 18 Jun 2017 12:39 AM IST
शामली, अमर उजाला ब्यूरो
शामली, अमर उजाला ब्यूरो Updated Sun, 18 Jun 2017 12:39 AM IST
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Policeman kills policemen on foot
crime - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
शामली/मुजफ्फरनगर। दो माह में तीन मुठभेड़, चार बदमाश और नतीजा एक ही जैसा। सिरदर्द बन गए बदमाशों को मुठभेड़ में ढेर करने के बजाए पुलिस अब उन्हें जिंदगी भर के लिए अपाहिज बनाकर जेल की सलाखों के पीछे भेज रही हैं।
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फुरकान के बाद विपुल खूनी, उसके साथी शत्रु और मुजफ्फरनगर में आकाश को पुलिस ने मुठभेड़ में धर दबोचा, इस दौरान दोनों ओर से फायरिंग भी हुई, लेकिन गोली शातिर बदमाशों के सिर या सीने में नहीं बल्कि पैरों में लगी हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि मुठभेड़ की घटनाओं पर उठते सवालों और जांच की फजीहत से बचने के लिए पुलिस ने अपनी रणनीति तो नहीं बदली है। आतंक का पर्याय बन गए बदमाशों से निपटने का अब यह पुलसिया फार्मूला तो नहीं। 
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 कानून के जानकारों का मानना है कि पुलिस ट्रेनिंग में भी यही सिखाया जाता है कि मुठभेड़ के दौरान बदमाश को पहले सरेंडर के लिए मजबूर किया जाए। यदि बदमाश सरेंडर नहीं करता है और पुलिस पर फायरिंग करता है, तो पुलिस को उसकी टांगों को निशाना बनाना चाहिए, ताकि उसको जिंदा पकड़ा जा सके।
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लेकिन यह सबक पुलिस लगभग भूल ही गई थी। लंबे समय तक अपराधियों का निपटने का पुलिस का फार्मूला उन्हें मुठभेड़ में ढेर करना ही रहा। मुठभेड़ के कई मामलों में पुलिस फंसी और बाद में मुठभेड़ में शामिल पुलिस कर्मियों को जेल तक जाना पड़ा। पहले पीठ ठोंकने वाले अफसर भी बाद में साथ छोड़ गए।

मुजफ्फरनगर के छपार थाना क्षेत्र में सात जुलाई 2007 को भाज्जू (भौराकलां) गांव के प्रताप और 21 अक्तूबर 2007 को अजय उर्फ नीटू को मुठभेड़ में मार गिराने के मामले में पुलिसकर्मियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई।

मुठभेड़ के बाद जांच में फंसने के डर से पुलिस वाले बदमाशों को ढेर करने से बचने लगे हैं और उन्हें ट्रेनिंग के दौरान दिया गया पैरों में गोली मारने का सबक याद आ गया है। पुलिस सूत्र बताते हैं कि पैरों में गोली लगने के बाद बदमाश जिंदगी भर के लिए अपाहिज हो जाता है और ठीक से चलने लायक भी नहीं रहता। ऐसे में वारदात के बाद वह भाग नहीं पाएगा और दूसरे प्रतिद्वंदी गिरोह से चल रही गैंगवार में आसान शिकार बनने का भी डर उसे सताने लगता है।

मथुरा में दो सराफा कारोबारियों की हत्या के बाद चार करोड़ का सोना लूटने की घटना में शामिल बदमाशों के साथ भी पुलिस ने यही फार्मूला अपनाया था। 

अब अपने पैरों से चल नहीं पाता फुरकान
  आठ अप्रैल को रंगदारी मांगने के मामलों में फरार चल रहे 50 हजार के इनामी कुख्यात फुरकान को मुठभेड़ के दौरान कांधला क्षेत्र से गिरफ्तार किया। पुलिस ने दावा किया था कि फुरकान को पांच गोलियां लगीं, लेकिन पांचों गोली उसकी पैरों में लगीं। सरकारी अस्पताल में प्राथमिक उपचार के बाद फुरकान को निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया।

फिर उसे न्यायालय में पेश करके जेल भेज दिया गया। अब फुरकान जेल से पुलिस कस्टडी में पेशी के लिए न्यायालय लाया जाता है। वह ठीक से अभी भी अपने पैरों के सहारे नहीं चल पाता। उसे पुलिसकर्मी ही कंधे का सहारे से बंदी वाहन से न्यायालय तक ले जाते हैं।  

पुलिस का काम बदमाश को पकड़ना, मारना नहीं 
शामली। सेवानिवृत्त आईजी विजय कुमार गर्ग का कहना है कि संविधान में कहीं नहीं लिखा कि बदमाश को मुठभेड़ के दौरान मार दिया जाए। इसीलिए पुलिस का पहला प्रयास बदमाश को जिंदा गिरफ्तार करना होता है।

संविधान के दायरे में रहकर पुलिस अपना काम करती है। उन्होंने कहा कि कुख्यात बदमाशों को गिरफ्तारी के लिए घेराबंदी करने के दौरान यदि फायरिंग होती है तो पुलिस आत्मरक्षार्थ गोलियां चलाती है।


यदि बदमाश को जिंदा गिरफ्तार करना संभव है तो गोली चलाने की कोई जरूरत नहीं पड़ती। यह बात अलग है कि बदमाश ही पुलिस की जान लेने पर अमादा हो जाए और फायरिंग में बदमाश की जान चली जाए। उनके कार्यकाल के दौरान भी कई बार ऐसे मौके आए जब बदमाशों से सीधा मुकाबला हुआ। कहना है कि पुलिस को अपना कार्य संविधान के दायरे में रहकर ही करना चाहिए। मानवाधिकार का भी पालन करना चाहिए। अपराधी को सजा देने का कार्य न्यायालय का है। पुलिस को भी अपराधी को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश करना चाहिए। एक सवाल के जवाब में कहा कि पूर्व में एनकाउंटर के दौरान बदमाशों के खिलाफ किस तरह कार्रवाई हो रही थी, वह तब के हालात रहे होंगे। ब्यूरो
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