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Shamli News: अब नहीं रही वह होली, न ही रहा वह हुड़दंग
Sat, 04 Mar 2023 10:34 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
संवाद न्यूज एजेंसी, शामली
Updated Sat, 04 Mar 2023 10:34 AM IST
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शामली। होली का नाम ही सुन कर अंग अंग में जोश और उत्साह का संचार हो जाता है। चाहे अपना हो या पराया बस सभी को रंग से सराबोर कर देने का काम एक पखवारा पहले से ही शुरु हो जाता था। बदलते परिवेश में त्योहार मनाने की भी परंपरा अब बदल गई। कभी पंद्रह दिन तक मनाई जाने वाली होली अब एक ही दिन तक सिमट कर रह गई। न तो वह फाग के गीत रह गए और न ही होली के वह हुड़दंग।
फाल्गुन के गीत होली खेलत रंग बनाय ठाकुर धाम में गुनगुनाते हुए तथा अपने जमाने को याद करते हुए ऐरही गांव निवासी ओंकार सिंह कहते है कि फाल्गुन महीना शुरु होते ही गांवों की गलियों में शाम को झाल, मंजीरा, ढोलक आदि लेकर श्रृंगार रस से भरी फागुनी गीतों की बौछार होने लगती थी। बस जो भी आता उसी रंग में रंग जाता इससे भाइचारे को मजबूती मिलती। काका नगर निवासी सत्यप्रभा बताती हैं कि होली की इस ठिठोली से मुहल्लों की घरों से महिलाएं फागुनी गीतों को सुनने के लिए आतुर हो जाती थी। अब वह सब बात नहीं रह गई है। गीतों में फूहड़ता आ गई है।
पुरानी परंपरा को जिंदा रखते हुए काका नगर निवासी राजो कहती हैं कि आज के समय में लोग तनाव के बीच पर्व को मना रहे है। भाईचारे से लोग भटक गए है। अश्लीलता बढ़ गई हैं। पहले के गीतों में रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों को जोड़ते हुए प्राकृतिक रूपों से जुड़ाव हुआ करता था।
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सिंभालका निवासी लीला देवी कहती है कि पहले के दौर में बहन हो, बेटी हो, पत्नी हो, बड़े-छोटे भाइयों के बीच रह कर फाल्गुन गीतों में डूबकर होली की हुड़दंग होती थी। अब पूरा माहौल बदल गया है। गांवों में होली के पंद्रह दिन पहले से फाल्गुन गीतों की वातावरण बन जाता था। एक जगह बैठकर सबको सम्मान दिया जाता था। युवा पीढ़ी पुराने लोगों के बीच बैठने से कतरा रही है। युवा अश्लीलता को महत्व देते हुए शराब के नशे में लिप्त हो रहे हैं।
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फाल्गुन के गीत होली खेलत रंग बनाय ठाकुर धाम में गुनगुनाते हुए तथा अपने जमाने को याद करते हुए ऐरही गांव निवासी ओंकार सिंह कहते है कि फाल्गुन महीना शुरु होते ही गांवों की गलियों में शाम को झाल, मंजीरा, ढोलक आदि लेकर श्रृंगार रस से भरी फागुनी गीतों की बौछार होने लगती थी। बस जो भी आता उसी रंग में रंग जाता इससे भाइचारे को मजबूती मिलती। काका नगर निवासी सत्यप्रभा बताती हैं कि होली की इस ठिठोली से मुहल्लों की घरों से महिलाएं फागुनी गीतों को सुनने के लिए आतुर हो जाती थी। अब वह सब बात नहीं रह गई है। गीतों में फूहड़ता आ गई है।
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पुरानी परंपरा को जिंदा रखते हुए काका नगर निवासी राजो कहती हैं कि आज के समय में लोग तनाव के बीच पर्व को मना रहे है। भाईचारे से लोग भटक गए है। अश्लीलता बढ़ गई हैं। पहले के गीतों में रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों को जोड़ते हुए प्राकृतिक रूपों से जुड़ाव हुआ करता था।
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सिंभालका निवासी लीला देवी कहती है कि पहले के दौर में बहन हो, बेटी हो, पत्नी हो, बड़े-छोटे भाइयों के बीच रह कर फाल्गुन गीतों में डूबकर होली की हुड़दंग होती थी। अब पूरा माहौल बदल गया है। गांवों में होली के पंद्रह दिन पहले से फाल्गुन गीतों की वातावरण बन जाता था। एक जगह बैठकर सबको सम्मान दिया जाता था। युवा पीढ़ी पुराने लोगों के बीच बैठने से कतरा रही है। युवा अश्लीलता को महत्व देते हुए शराब के नशे में लिप्त हो रहे हैं।

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