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मातृ भूमि पर मिट जाने की बस मेरी अभिलाषा है...
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शामली। मंगलम साहित्य मंच दिल्ली की ओर से में शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर ऑनलाइन सरस कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। शुभारंभ शामली के गीतकार सुनील अरोड़ा टम्मी की मां वाणी की सरस वंदना से हुआ।
गुरुग्राम के प्रसिद्ध कवि राजपाल सिंह राज ने शब्द शीर्षक से पढ़ी कविता को सभी ने बडे़ मनोयोग से सुना। सुभाष राहत बरेलवी ने सुनाया, गालिब सा मैं कहाऊं इसकी भी चाह नहीं, मनसे पे बैठ जाऊं इसकी भी चाह नहीं। अलीगढ़ के कवि अब्दुल रज्जाक नाचीज की इस रचना को सराहा गया, मैं बच्चा हूं बच्चों जैसी मेरी तो हर आशा है, मातृ भूमि पर मिट जाने की बस मेरी अभिलाषा है। युवा गीतकार ओंकार त्रिपाठी के सावन के इस गीत ने मंत्रमुग्ध कर दिया। ये मन जब-जब कजरी गाए समझ लेना कि सावन है, ये बादल जब-जब इतराते समझ लेना कि सावन है।
डॉ. जयसिंह आर्य ने गुरू महिमा पर इस गीत से सभी का दिल लूटा। निश्छलता के जल से वो ही सींच रहा है, मानव सच्चाई से आंखें मीच रहा है। वचन गुरू का अगर ग्रहण कर पाएगा तू उन्नति के पथ पर भी पग धर जाएगा। मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध गीतकार विनोद भृंग के इस गीत को तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सुना गया-जीवन तो बहता पानी है तू जान ले इसके पानी को, इक पल को भी भूल न जाना संतों की इस वाणी को। कार्यक्रम के संयोजक सुभाष राहत बरेलवी ने सभी कवियों व श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। संचालन कवयित्री पूनम माटिया ने किया।
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गुरुग्राम के प्रसिद्ध कवि राजपाल सिंह राज ने शब्द शीर्षक से पढ़ी कविता को सभी ने बडे़ मनोयोग से सुना। सुभाष राहत बरेलवी ने सुनाया, गालिब सा मैं कहाऊं इसकी भी चाह नहीं, मनसे पे बैठ जाऊं इसकी भी चाह नहीं। अलीगढ़ के कवि अब्दुल रज्जाक नाचीज की इस रचना को सराहा गया, मैं बच्चा हूं बच्चों जैसी मेरी तो हर आशा है, मातृ भूमि पर मिट जाने की बस मेरी अभिलाषा है। युवा गीतकार ओंकार त्रिपाठी के सावन के इस गीत ने मंत्रमुग्ध कर दिया। ये मन जब-जब कजरी गाए समझ लेना कि सावन है, ये बादल जब-जब इतराते समझ लेना कि सावन है।
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डॉ. जयसिंह आर्य ने गुरू महिमा पर इस गीत से सभी का दिल लूटा। निश्छलता के जल से वो ही सींच रहा है, मानव सच्चाई से आंखें मीच रहा है। वचन गुरू का अगर ग्रहण कर पाएगा तू उन्नति के पथ पर भी पग धर जाएगा। मुख्य अतिथि सुप्रसिद्ध गीतकार विनोद भृंग के इस गीत को तालियों की गड़गड़ाहट के साथ सुना गया-जीवन तो बहता पानी है तू जान ले इसके पानी को, इक पल को भी भूल न जाना संतों की इस वाणी को। कार्यक्रम के संयोजक सुभाष राहत बरेलवी ने सभी कवियों व श्रोताओं का आभार व्यक्त किया। संचालन कवयित्री पूनम माटिया ने किया।
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