{"_id":"5f80a4a28ebc3e75047cdfc6","slug":"muzaffarnagar-rally-created-turmoil-in-jatland-shamli-news-mrt5053405181","type":"story","status":"publish","title_hn":"जाटलैंड में उथल-पुथल मचा गई मुजफ्फरनगर की रैली","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जाटलैंड में उथल-पुथल मचा गई मुजफ्फरनगर की रैली
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जाटलैंड में उथल-पुथल मचा गई मुजफ्फरनगर की रैली
शामली। मुजफ्फरनगर में हुई लोकतंत्र बचाओ रैली पश्चिमी उत्तर में जाटों को एक धुरी पर लाने की कोशिश थी। यह प्रयास कितना सफल होगा यह तो आने वाला विधानसभा चुनाव बताएगा, लेकिन इतना जरूर है कि रैली ने जाटलैंड में उथल-पुथल मचा दी है। खाप चौधरियों को मंच पर जगह नहीं मिलने का मुद्दा भी खूब उठ रहा है, मगर खुद खाप चौधरी इसे लेकर ज्यादा गंभीर नहीं हैं।
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद सेे राष्ट्रीय लोकदल का जनाधार खिसक चुका है। दंगे में लोगों के बीच नहीं पहुंचने की नाराजगी से जाट समाज का युवा वर्ग भाजपा की ओर आकर्षित हो गया और इसका असर 2014 के लोकसभा और 2017 के विधान सभा चुनाव में दिखा। बीते वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में खुद चौधरी अजित सिंह ने मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़कर जाटों को जोड़ने की कोशिश की, लेकिन उन्हें भी हार का मुंह देखना पड़ा। अजित सिंह ने चुनाव से करीब एक साल पहले से दंगे में उपजी खाई पाटने के लिए सम्मेलन करने शुरू कर दिए थे, लेकिन इनका भी ज्यादा असर नहीं दिखा।
हाथरस की घटना रालोद के लिए अच्छा मौका रहा, जिसके जरिए जाटों को एक धुरी पर लाने की कोशिश की गई। रैली में जुटी भीड़ को देख यह प्रयास फलीभूत होता भी नजर आया, लेकिन रालोद को इसका कितना फल मिलेगा यह 2021 के चुनाव में ही पता लगेगा। फिलहाल तो रैली के बाद हर किसी की जुबान पर इसी की चर्चा है। राजनीति से जुड़े लोग इस रैली के नफा-नुकसान का आंकलन करने में लगे हैं। रालोद जिलाध्यक्ष योगेंद्र चेयरमैन कहते हैं कि आम जन सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ खड़ा हो गया है। चुनाव पर असर के सवाल पर उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव सब कुछ उलट-पुलट हो जाएगा।
विज्ञापन
मुस्लिमों की कम भागीदारी रही चर्चाओं में
मुुजफ्फरनगर की रैली में जुटी भीड़ जाट समाज की ही थी। इस रैली में मुस्लिम समाज की कम भागीदारी चर्चाओं में रही। फिलहाल रैली का उद्देश्य भी जाट समाज को एकजुट करना ही बताया जा रहा था। इस लिहाज से देखा जाए तो रैली अपने उद्देश्य में सफल कही जा सकती है।
भाजपा की पहले से तैयारी, अब और बढ़ी चुनौती
पश्चिम की जाट राजनीति में पकड़ बनाने के लिए भाजपा की तैयारी शुरुआत से ही है। 2013 के दंगे के बाद से भाजपा ने जाट नेताओं को तरजीह दी। डा. संजीव बालियान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ा जाट चेहरा हैं। बागपत सांसद सत्यपाल सिंह भी जाट राजनीति के केंद्र में हैं। हाल ही में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कमान जाट समाज के मोहित बेनीवाल को देकर संगठन स्तर पर भी बड़ा दांव खेला गया है। भाजपा के इन जाट चेहरों के सामने मुजफ्फरनगर की रैली के बाद चुनौती और बढ़ गई है।
विज्ञापन
शामली। मुजफ्फरनगर में हुई लोकतंत्र बचाओ रैली पश्चिमी उत्तर में जाटों को एक धुरी पर लाने की कोशिश थी। यह प्रयास कितना सफल होगा यह तो आने वाला विधानसभा चुनाव बताएगा, लेकिन इतना जरूर है कि रैली ने जाटलैंड में उथल-पुथल मचा दी है। खाप चौधरियों को मंच पर जगह नहीं मिलने का मुद्दा भी खूब उठ रहा है, मगर खुद खाप चौधरी इसे लेकर ज्यादा गंभीर नहीं हैं।
मुजफ्फरनगर दंगे के बाद सेे राष्ट्रीय लोकदल का जनाधार खिसक चुका है। दंगे में लोगों के बीच नहीं पहुंचने की नाराजगी से जाट समाज का युवा वर्ग भाजपा की ओर आकर्षित हो गया और इसका असर 2014 के लोकसभा और 2017 के विधान सभा चुनाव में दिखा। बीते वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में खुद चौधरी अजित सिंह ने मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़कर जाटों को जोड़ने की कोशिश की, लेकिन उन्हें भी हार का मुंह देखना पड़ा। अजित सिंह ने चुनाव से करीब एक साल पहले से दंगे में उपजी खाई पाटने के लिए सम्मेलन करने शुरू कर दिए थे, लेकिन इनका भी ज्यादा असर नहीं दिखा।
विज्ञापन
हाथरस की घटना रालोद के लिए अच्छा मौका रहा, जिसके जरिए जाटों को एक धुरी पर लाने की कोशिश की गई। रैली में जुटी भीड़ को देख यह प्रयास फलीभूत होता भी नजर आया, लेकिन रालोद को इसका कितना फल मिलेगा यह 2021 के चुनाव में ही पता लगेगा। फिलहाल तो रैली के बाद हर किसी की जुबान पर इसी की चर्चा है। राजनीति से जुड़े लोग इस रैली के नफा-नुकसान का आंकलन करने में लगे हैं। रालोद जिलाध्यक्ष योगेंद्र चेयरमैन कहते हैं कि आम जन सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ खड़ा हो गया है। चुनाव पर असर के सवाल पर उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव सब कुछ उलट-पुलट हो जाएगा।
विज्ञापन
मुस्लिमों की कम भागीदारी रही चर्चाओं में
मुुजफ्फरनगर की रैली में जुटी भीड़ जाट समाज की ही थी। इस रैली में मुस्लिम समाज की कम भागीदारी चर्चाओं में रही। फिलहाल रैली का उद्देश्य भी जाट समाज को एकजुट करना ही बताया जा रहा था। इस लिहाज से देखा जाए तो रैली अपने उद्देश्य में सफल कही जा सकती है।
भाजपा की पहले से तैयारी, अब और बढ़ी चुनौती
पश्चिम की जाट राजनीति में पकड़ बनाने के लिए भाजपा की तैयारी शुरुआत से ही है। 2013 के दंगे के बाद से भाजपा ने जाट नेताओं को तरजीह दी। डा. संजीव बालियान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ा जाट चेहरा हैं। बागपत सांसद सत्यपाल सिंह भी जाट राजनीति के केंद्र में हैं। हाल ही में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कमान जाट समाज के मोहित बेनीवाल को देकर संगठन स्तर पर भी बड़ा दांव खेला गया है। भाजपा के इन जाट चेहरों के सामने मुजफ्फरनगर की रैली के बाद चुनौती और बढ़ गई है।