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Shamli News: 150 साल पुराना है मां दुर्गा देवी का सिद्धपीठ मंदिर
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जलालाबाद। कस्बे का प्राचीन मां दुर्गा देवी सिद्धपीठ मंदिर आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता है। शारदीय नवरात्र के अवसर पर यहां आयोजित आठ दिवसीय वार्षिक मेले का शुभारंभ धूमधाम से हुआ। मंदिर का इतिहास करीब 150 वर्ष पुराना है। इसका निर्माण कस्बे के महंत योगी देवीनाथ ने कराया था। उनकी प्रतिमा आज भी मंदिर के दक्षिण छोर पर स्थापित है।
मंदिर परिसर में प्रत्येक चतुर्दशी को हवन-यज्ञ का आयोजन होता है। श्रद्धालु माता रानी के दर्शन कर हलवा-पूरी का प्रसाद अर्पित करते हैं और चुनरी, नारियल व छत्र आदि चढ़ाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मंदिर की विशेषता यह है कि इसका निर्माण वास्तु शास्त्र के अनुसार केवल चूना और लखौरी ईंटों से किया गया है। इसी कारण गर्मी में यह शीतल और सर्दी में गरम रहता है। मंदिर के शिखर पर शेर और बंदरों की आकृतियां आकर्षण का केंद्र हैं।
गर्भगृह में मां शाकंभरी देवी की संगमरमर की पांच फीट ऊंची मूर्ति के साथ श्री गणेश, मां भद्रकाली, नौ दुर्गा, मां संतोषी, हनुमान जी और राधा-कृष्ण की मूर्तियां विराजमान हैं। मंदिर को रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया गया है। मेला ग्राउंड में झूले, चाट-पकौड़ी, खिलौनों की दुकानों के साथ पारंपरिक कबड्डी प्रतियोगिता भी होती है, जिसमें हरियाणा, उत्तराखंड और दिल्ली से टीमें भाग लेती हैं।
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मंदिर समिति अध्यक्ष लाला उपेंद्र गुप्ता ने बताया कि मां के दरबार में दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। प्रतिदिन सुबह-शाम भजन कीर्तन और हवन यज्ञ आयोजित किए जाते हैं। समिति प्रबंधक एवं सभासद राकेश शर्मा ने बताया कि मेले की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और श्रद्धालुओं के लिए भव्य इंतजाम किए गए हैं। वहीं आदेश गर्ग ने कहा कि यह मेला दशहरे से शुरू होकर लगातार आठ दिन तक चलता है और श्रद्धालु आस्था व उल्लास के साथ इसमें हिस्सा लेते हैं।
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मंदिर परिसर में प्रत्येक चतुर्दशी को हवन-यज्ञ का आयोजन होता है। श्रद्धालु माता रानी के दर्शन कर हलवा-पूरी का प्रसाद अर्पित करते हैं और चुनरी, नारियल व छत्र आदि चढ़ाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। मान्यता है कि यहां पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मंदिर की विशेषता यह है कि इसका निर्माण वास्तु शास्त्र के अनुसार केवल चूना और लखौरी ईंटों से किया गया है। इसी कारण गर्मी में यह शीतल और सर्दी में गरम रहता है। मंदिर के शिखर पर शेर और बंदरों की आकृतियां आकर्षण का केंद्र हैं।
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गर्भगृह में मां शाकंभरी देवी की संगमरमर की पांच फीट ऊंची मूर्ति के साथ श्री गणेश, मां भद्रकाली, नौ दुर्गा, मां संतोषी, हनुमान जी और राधा-कृष्ण की मूर्तियां विराजमान हैं। मंदिर को रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया गया है। मेला ग्राउंड में झूले, चाट-पकौड़ी, खिलौनों की दुकानों के साथ पारंपरिक कबड्डी प्रतियोगिता भी होती है, जिसमें हरियाणा, उत्तराखंड और दिल्ली से टीमें भाग लेती हैं।
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मंदिर समिति अध्यक्ष लाला उपेंद्र गुप्ता ने बताया कि मां के दरबार में दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। प्रतिदिन सुबह-शाम भजन कीर्तन और हवन यज्ञ आयोजित किए जाते हैं। समिति प्रबंधक एवं सभासद राकेश शर्मा ने बताया कि मेले की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और श्रद्धालुओं के लिए भव्य इंतजाम किए गए हैं। वहीं आदेश गर्ग ने कहा कि यह मेला दशहरे से शुरू होकर लगातार आठ दिन तक चलता है और श्रद्धालु आस्था व उल्लास के साथ इसमें हिस्सा लेते हैं।