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व्यक्ति सत्संग भले ही न करे, लेकिन कुसंग से जरूर बचे
Updated Thu, 27 Sep 2018 12:27 AM IST
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व्यक्ति सत्संग भले ही न करे, लेकिन कुसंग से जरूर बचे
शामली। श्रीराम कथा के चौथे दिन अमृतवर्षा करते हुए संत प्रवर विजय कौशल जी महाराज ने कहा कि जिस काम, आचरण अथवा व्यवहार से मन में हिचक हो, वही कुसंग है। कुसंग से भगवान राम और कृष्ण तक भी अपना घर नहीं बचा सके। कुसंग का दोष बड़ा भयानक होता है। कुसंग चिता तक साथ जाता है। व्यक्ति का जीते जी साथ नहीं छोड़ता है। व्यक्ति सत्संग भले ही न करे, लेकिन कुसंग से जरूर बचे।
बुधवार को कैराना रोड स्थित जे.जे.फार्म में चल रही श्रीराम कथा के चौथे दिन संत प्रवर विजय कौशल जी महाराज ने कैकेई द्वारा महाराजा दशरथ से दो वरदान मांगना, भरत को राज्य तथा राम को चौदह वर्ष के वनवास पर दशरथ के करुण विलाप, राम-लक्ष्मण-सीता का वन गमन तथा केवट प्रसंग के संवाद का रसास्वादन कराया। कथा व्यास विजय कौशल महाराज ने कहा कि राजा दशरथ ने राम का राज्याभिषेक करने का निर्णय लिया और वशिष्ठ जी को बुलाकर उन्हें यह प्रस्ताव सुनाया। वशिष्ठ जी ने सहर्ष प्रस्ताव का अनुमोदन करते हुए राम के राज्याभिषेक की अनुमति दी। राज्याभिषेक का मुहूर्त पूछने पर वशिष्ठ जी ने कहा कि शुभ कार्य के लिए मुहूर्त की आवश्यकता नहीं, उसे तुरंत करना चाहिए। परंतु राजा दशरथ से एक भूल हो गई। उन्होंने राज्याभिषेक को कल के लिए टाल दिया। यह संसार का भी नियम है हम शुभ कार्य के लिए मुहूर्त का इंतजार करते है, जबकि अशुभ कार्य तुरंत कर डालते हैं। राजा दशरथ से दूसरी भूल यह हुई कि उन्होंने वशिष्ठ को अपने दरबार में बुलाया। राजा दशरथ स्वयं वशिष्ठ जी के पास जाते। बाद में दशरथ ने वशिष्ठ जी को यह शुभ संदेश सुनाने के लिए राम के पास भेजा। गुरु का आगमन सुनकर राम तुरंत दौड़कर बाहर आए। यहां दशरथ का अहंकार और राम की विनम्रता स्पष्ट झलकती है। अपने पिता का अहंकार जानकर राम ने तभी निर्णय कर लिया कि वे ऐसे राज्य की गद्दी पर नहीं बैठेंगे, जहां का राजा गुरुओं और ऋषियों का सम्मान तक नहीं जानता। राम राज्य समर्पण से आता है अपहरण से नहीं, लेकिन विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था। स्वर्ग में देवताओं ने राम के राज्याभिषेक में विघ्न डालने के लिए सरस्वती को तैयार किया, सरस्वती अयोध्या पहुंचीं, लेकिन अवध का एक भी नागरिक ऐसा नहीं मिला, जिसकी बुद्धि में प्रवेश कर सके, बाद में उसे कैकेई की दासी मंथरा मिली। कैकेई देश से उसके साथ दहेज में आई थी। सरस्वती मंथरा की बुद्धि में प्रवेश कर गई। कैकेई देश वर्तमान कश्मीर में था। इस देश ने त्रेता युग में भी रुलाया और आज भी हमें रुला रहा है। संत प्रवर ने कहा कि मंथरा कुसंग की प्रतीक है। राम के वनवास से लौटकर आने के बाद भी मंथरा राज महल में बनी रही। इस मौके पर राजेश्वर बंसल, मृगांका सिंह, राजीव मलिक, श्रीनिवास गोयल, शिवचरण कुमार संगल, सुरेंद्र मित्तल, अशोक बंसल आदि मुख्य रूप से मौजूद रहे।
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शामली। श्रीराम कथा के चौथे दिन अमृतवर्षा करते हुए संत प्रवर विजय कौशल जी महाराज ने कहा कि जिस काम, आचरण अथवा व्यवहार से मन में हिचक हो, वही कुसंग है। कुसंग से भगवान राम और कृष्ण तक भी अपना घर नहीं बचा सके। कुसंग का दोष बड़ा भयानक होता है। कुसंग चिता तक साथ जाता है। व्यक्ति का जीते जी साथ नहीं छोड़ता है। व्यक्ति सत्संग भले ही न करे, लेकिन कुसंग से जरूर बचे।
बुधवार को कैराना रोड स्थित जे.जे.फार्म में चल रही श्रीराम कथा के चौथे दिन संत प्रवर विजय कौशल जी महाराज ने कैकेई द्वारा महाराजा दशरथ से दो वरदान मांगना, भरत को राज्य तथा राम को चौदह वर्ष के वनवास पर दशरथ के करुण विलाप, राम-लक्ष्मण-सीता का वन गमन तथा केवट प्रसंग के संवाद का रसास्वादन कराया। कथा व्यास विजय कौशल महाराज ने कहा कि राजा दशरथ ने राम का राज्याभिषेक करने का निर्णय लिया और वशिष्ठ जी को बुलाकर उन्हें यह प्रस्ताव सुनाया। वशिष्ठ जी ने सहर्ष प्रस्ताव का अनुमोदन करते हुए राम के राज्याभिषेक की अनुमति दी। राज्याभिषेक का मुहूर्त पूछने पर वशिष्ठ जी ने कहा कि शुभ कार्य के लिए मुहूर्त की आवश्यकता नहीं, उसे तुरंत करना चाहिए। परंतु राजा दशरथ से एक भूल हो गई। उन्होंने राज्याभिषेक को कल के लिए टाल दिया। यह संसार का भी नियम है हम शुभ कार्य के लिए मुहूर्त का इंतजार करते है, जबकि अशुभ कार्य तुरंत कर डालते हैं। राजा दशरथ से दूसरी भूल यह हुई कि उन्होंने वशिष्ठ को अपने दरबार में बुलाया। राजा दशरथ स्वयं वशिष्ठ जी के पास जाते। बाद में दशरथ ने वशिष्ठ जी को यह शुभ संदेश सुनाने के लिए राम के पास भेजा। गुरु का आगमन सुनकर राम तुरंत दौड़कर बाहर आए। यहां दशरथ का अहंकार और राम की विनम्रता स्पष्ट झलकती है। अपने पिता का अहंकार जानकर राम ने तभी निर्णय कर लिया कि वे ऐसे राज्य की गद्दी पर नहीं बैठेंगे, जहां का राजा गुरुओं और ऋषियों का सम्मान तक नहीं जानता। राम राज्य समर्पण से आता है अपहरण से नहीं, लेकिन विधाता को तो कुछ और ही मंजूर था। स्वर्ग में देवताओं ने राम के राज्याभिषेक में विघ्न डालने के लिए सरस्वती को तैयार किया, सरस्वती अयोध्या पहुंचीं, लेकिन अवध का एक भी नागरिक ऐसा नहीं मिला, जिसकी बुद्धि में प्रवेश कर सके, बाद में उसे कैकेई की दासी मंथरा मिली। कैकेई देश से उसके साथ दहेज में आई थी। सरस्वती मंथरा की बुद्धि में प्रवेश कर गई। कैकेई देश वर्तमान कश्मीर में था। इस देश ने त्रेता युग में भी रुलाया और आज भी हमें रुला रहा है। संत प्रवर ने कहा कि मंथरा कुसंग की प्रतीक है। राम के वनवास से लौटकर आने के बाद भी मंथरा राज महल में बनी रही। इस मौके पर राजेश्वर बंसल, मृगांका सिंह, राजीव मलिक, श्रीनिवास गोयल, शिवचरण कुमार संगल, सुरेंद्र मित्तल, अशोक बंसल आदि मुख्य रूप से मौजूद रहे।
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