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आस्था की डोर में नियमों की गांठ लगाकर चल रहे भोले
Updated Sat, 15 Jul 2017 01:03 AM IST
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शामली।
हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लेकर शिवालयों की ओर लौट रहे श्रद्धालु कांवड़िया आस्था के साथ ही कड़े नियमों का पालन भी कर रहे हैं। चाहे कांवड़ सेवा शिविर में विश्राम के लिए रुकना हो, या गंतव्य की ओर चलते समय नियमों का पूरा ख्याल रखा जाता है।
शिवभक्ति में लीन श्रद्धालु कांवड़ियों द्वारा आमतौर पर चार प्रकार की कांवड़ ज्यादा लाई जा रही हैं, जिनमें सबसे ज्यादा कठिन खड़ी कांवड़ लाने के नियम हैं। अब तक शामली जिले से हजारों खड़ी कांवड़ शिवालय की ओर कूच कर चुकी हैं। कांवड़ सेवा शिविरों में भी कांवड़ियों की भीड़ उमड़ रही है। शिविरों में विश्राम के बाद बगैर स्नान कांवड़ नहीं उठाते हैं, जिसके चलते शिविरों में श्रद्धालुओं के स्नान की व्यवस्था भी की गई है। पंडित प्रभु शंकर शास्त्री का कहना है कि आराध्य देव की उपासना या फिर कांवड़ लाने में आस्था के साथ ही नियमों का पालन करना जरूरी है। कांवड़ लाना कठिन तपस्या है, नियमों का पालन करने वाले शिवभक्तों की मनोकामना अवश्य पूरी होती हैं।
कांवड़ के प्रकार
झूला कांवड - हरिद्वार से पवित्र गंगाजल उठाने के बाद झूला कांवड़ को रास्ते में विश्राम के दौरान कांवड़ सेवा शिविर में झुलाया जा सकता है। इस कांवड़ को जमीन पर रखा नहीं जा सकता है।
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खड़ी कांवड़ - यह कांवड़ सबसे कठिन मानी जाती है, जिसके चलते दो युवक अपनी जोड़ी बनाकर खड़ी कांवड़ लाते हैं। लंबी दूरी का सफर तय करने के बाद जब कांवड़ सेवा शिविर में विश्राम करना होता है, तो एक कांवड़िया दोनों कांवड़ अपने कंधे पर लेकर खड़ा रहता है, दूसरा आराम कर पाता है।
डाक कांवड़ - इस कांवड को लाने वालों का ग्रुप चलता है। ग्रुप में 15 से 20 युवा शामिल होते हैं। ग्रुप के साथ एक वाहन भी होता है। एक युवक गंगाजल लेकर दौड़ते हुए चलता है और बारी बारी से साथी कांवड़िया दौड़ लगाते हुए शिवालय तक पहुंचते हैं। हरियाणा से बड़ी संख्या में युवा डाक कांवड़ लाते हैं।
लेटी कांवड़ - शिवभक्तों में इस कांवड़ को लाने वालों की भी कमी नहीं है। हरिद्वार से शिवालय तक एक श्रद्धालु लेटकर पूरा सफर तय करता है। उसके साथ कुछ लोग रहते हैं, जो गंगाजल धारण कर चलते रहते हैं।
नियमों की तपस्या
कांव़ड लाने के दौरान नियमों का पालन भी कांवड़िया कर रहे हैं। हरिद्वार से पवित्र गंगाजल सहित कांवड़ उठाने के बाद रास्ते में खान-पान पर विशेष ध्यान रखा जाता है। कांवड़ सेवा शिविर में बगैर दान दिए, खाना ग्रहण नहीं करते हैं। एक दूसरे को भोले कहकर ही पुकारते हैं, किसी के साथ अभद्र व्यवहार नहीं करते। इसके साथ ही कांवड़ लाने वाले श्रद्धालु के परिजनों को भी नियमों का पालन करना होता है, जिसके चलते कांवड़िया के परिवार में पहली रोटी ठंडे तवे पर ही डाली जाती है। सब्जी में तड़का नहीं लगता। स्वयं भोजन से पूर्व कुत्ते को भोजन कराया जाता है।
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हरिद्वार से पवित्र गंगाजल लेकर शिवालयों की ओर लौट रहे श्रद्धालु कांवड़िया आस्था के साथ ही कड़े नियमों का पालन भी कर रहे हैं। चाहे कांवड़ सेवा शिविर में विश्राम के लिए रुकना हो, या गंतव्य की ओर चलते समय नियमों का पूरा ख्याल रखा जाता है।
शिवभक्ति में लीन श्रद्धालु कांवड़ियों द्वारा आमतौर पर चार प्रकार की कांवड़ ज्यादा लाई जा रही हैं, जिनमें सबसे ज्यादा कठिन खड़ी कांवड़ लाने के नियम हैं। अब तक शामली जिले से हजारों खड़ी कांवड़ शिवालय की ओर कूच कर चुकी हैं। कांवड़ सेवा शिविरों में भी कांवड़ियों की भीड़ उमड़ रही है। शिविरों में विश्राम के बाद बगैर स्नान कांवड़ नहीं उठाते हैं, जिसके चलते शिविरों में श्रद्धालुओं के स्नान की व्यवस्था भी की गई है। पंडित प्रभु शंकर शास्त्री का कहना है कि आराध्य देव की उपासना या फिर कांवड़ लाने में आस्था के साथ ही नियमों का पालन करना जरूरी है। कांवड़ लाना कठिन तपस्या है, नियमों का पालन करने वाले शिवभक्तों की मनोकामना अवश्य पूरी होती हैं।
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कांवड़ के प्रकार
झूला कांवड - हरिद्वार से पवित्र गंगाजल उठाने के बाद झूला कांवड़ को रास्ते में विश्राम के दौरान कांवड़ सेवा शिविर में झुलाया जा सकता है। इस कांवड़ को जमीन पर रखा नहीं जा सकता है।
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खड़ी कांवड़ - यह कांवड़ सबसे कठिन मानी जाती है, जिसके चलते दो युवक अपनी जोड़ी बनाकर खड़ी कांवड़ लाते हैं। लंबी दूरी का सफर तय करने के बाद जब कांवड़ सेवा शिविर में विश्राम करना होता है, तो एक कांवड़िया दोनों कांवड़ अपने कंधे पर लेकर खड़ा रहता है, दूसरा आराम कर पाता है।
डाक कांवड़ - इस कांवड को लाने वालों का ग्रुप चलता है। ग्रुप में 15 से 20 युवा शामिल होते हैं। ग्रुप के साथ एक वाहन भी होता है। एक युवक गंगाजल लेकर दौड़ते हुए चलता है और बारी बारी से साथी कांवड़िया दौड़ लगाते हुए शिवालय तक पहुंचते हैं। हरियाणा से बड़ी संख्या में युवा डाक कांवड़ लाते हैं।
लेटी कांवड़ - शिवभक्तों में इस कांवड़ को लाने वालों की भी कमी नहीं है। हरिद्वार से शिवालय तक एक श्रद्धालु लेटकर पूरा सफर तय करता है। उसके साथ कुछ लोग रहते हैं, जो गंगाजल धारण कर चलते रहते हैं।
नियमों की तपस्या
कांव़ड लाने के दौरान नियमों का पालन भी कांवड़िया कर रहे हैं। हरिद्वार से पवित्र गंगाजल सहित कांवड़ उठाने के बाद रास्ते में खान-पान पर विशेष ध्यान रखा जाता है। कांवड़ सेवा शिविर में बगैर दान दिए, खाना ग्रहण नहीं करते हैं। एक दूसरे को भोले कहकर ही पुकारते हैं, किसी के साथ अभद्र व्यवहार नहीं करते। इसके साथ ही कांवड़ लाने वाले श्रद्धालु के परिजनों को भी नियमों का पालन करना होता है, जिसके चलते कांवड़िया के परिवार में पहली रोटी ठंडे तवे पर ही डाली जाती है। सब्जी में तड़का नहीं लगता। स्वयं भोजन से पूर्व कुत्ते को भोजन कराया जाता है।