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राजकीय रेशम फार्म को इलाज की दरकार
ब्यूरो /शाहजहांपुर
Updated Fri, 19 Aug 2016 12:10 AM IST
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रेशम फार्म
- फोटो : श्ााहजहांपुर उत्तर प्रदेश्ा
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गांव महमूदपुर सैंजनियां का रेशम फार्म बीमार है। इसकी सेहत सही हो जाए तो रेशम विभाग को भारी लाभ होने के साथ ही सैकड़ों परिवारों को रोजी रोटी मुहैया हो सकती है। जिले के चार रेशम फार्म में सबसे बड़ा यह फार्म अधिकारियों की उदासीनता के चलते सही परिणाम नहीं दे पा रहा है।
शाहजहांपुर जिले में निगोही के सतवां बुजुर्ग में 14.5 एकड़, सिंधौली में 4.8 एकड़, जयदुन नगर में 10 एकड़ का रेशम फार्म है। गांव महमूदपुर सैंजनियां में वर्ष 1982 में बीस एकड़ भूमि पर राजकीय रेशम फार्म की स्थापना की गई थी। फार्म में शहतूत के लगभग दो लाख पेड़ लगे हैं। इनकी सिंचाई के लिए चार बोरिंग भी हैं। कुछ वर्ष पूर्व फार्म के पास सरकारी नलकूप भी बन जाने से सिंचाई का काम आसान हो गया है। फार्म की देखरेख के लिए एक भवन भी बना हुआ है। फार्म के लिए सबसे बड़ी आफत गांव के लोगों की पालतू बकरियां और पशु हैं। यह पशु फार्म में खड़े शहतूत के पेड़ों की पत्तियां खा जाते हैं और नर्सरी में खड़े पेड़ भी नष्ट कर देते हैं।
इस फार्म से गांव के तमाम लोगों को रोजगार मिला हुआ है। वर्तमान में लगभग बीस परिवारों में रेशम के कीटों को पालन किया जा रहा है। इसके अलावा शहतूत के पेड़ की टहनियों से टोकरी आदि बनाने से भी कई परिवारों को रोजगार मिलता है।
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कैसे तैयार होता है रेशम
पुवायां। महमूदपुर सैंजनियां के राजकीय रेशम फार्म पर दो श्रेणी के कीटों से रेशम प्राप्त किया जाता है। फरवरी और मार्च में वाय बोल्टाईन कीट को पाला जाता है। इसके अलावा अप्रैल में एफ-1 कीट पाला जाता है। रेशम कीट के अंडे लाकर फार्म पर ट्रे में रखे जाते हैं। इनसे कीट होने के बाद लोगों को पालने के लिए दे दिए जाते हैं। लोग घरों में कीटों को जालीदार ट्रे में रख देते हैं और फार्म से शहतूत की पत्तियां लाकर ट्रे में डाल देते हैं। कीड़े पत्तियों को खाकर बड़े होते हैं और कुछ ही दिन में अपने चारो ओर रेशम बुन देते हैं। वाय बोल्टाईन के एक कीट से लगभग 18 सौ मीटर और एफ-1 से लगभग 13 हजार मीटर रेशम प्राप्त होता है। कोया तैयार होने के बाद पीलीभीत में निश्चित तिथि पर बाजार में रेशम कोए को ले जाकर बिक्री कर दिया जाता है। एफ-1 लगभग 130 रुपए किलो और वाय बोल्टाईन लगभग 225 रुपए किलो बिकता है। रेशम कीट खरीदने के लिए पश्चिम बंगाल, बनारस सहित तमाम जगह से व्यापारी आते हैं। रेशम ज्यादा होने पर व्यापारी इसे घर से भी उठा लेते हैं। कीट पालने वाले परिवार को एक माह में लगभग पांच से दस हजार रुपए की आय हो जाती है। घर के पुरूष सदस्य खेत आदि में काम को चले जाते हैं, महिलाएं पत्तियां आदि लाकर कीट पालन कर अतिरिक्त आय कर लेती हैं।
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यह है समस्याएं
पुवायां। अधिकारियों की लापरवाही के चलते रेशम फार्म की काफी भूमि पर अवैध कब्जा हो चुका है। इसके अलावा तमाम क्षेत्रफल खाली पड़ा हुआ है। इसमें शहतूत के पेड़ लगने से ज्यादा कीट पालन किया जा सकता है। सबसे बड़ी आवश्यकता फार्म की भूमि पर बाउंड्री वॉल की है। बाउंड्री बन जाने से बाहरी पशुओं से पेड़ो की सुरक्षा हो सकेगी और अवैध कब्जे से भी मुक्ति मिल सकेगी। इसके अलावा एक दिक्कत यह भी है कि फार्म में नर्सरी लगाने, गुड़ाई करने और अन्य काम करने वालों को भुगतान काफी देरी से हो पाता है। नर्सरी लगाए जाने का कुछ श्रमिकों का भुगतान एक वर्ष बीत जाने के बाद भी नहीं मिल सका है। समस्याओं का निराकरण नहीं होने से रेशम फार्म अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहा है।
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शाहजहांपुर जिले में निगोही के सतवां बुजुर्ग में 14.5 एकड़, सिंधौली में 4.8 एकड़, जयदुन नगर में 10 एकड़ का रेशम फार्म है। गांव महमूदपुर सैंजनियां में वर्ष 1982 में बीस एकड़ भूमि पर राजकीय रेशम फार्म की स्थापना की गई थी। फार्म में शहतूत के लगभग दो लाख पेड़ लगे हैं। इनकी सिंचाई के लिए चार बोरिंग भी हैं। कुछ वर्ष पूर्व फार्म के पास सरकारी नलकूप भी बन जाने से सिंचाई का काम आसान हो गया है। फार्म की देखरेख के लिए एक भवन भी बना हुआ है। फार्म के लिए सबसे बड़ी आफत गांव के लोगों की पालतू बकरियां और पशु हैं। यह पशु फार्म में खड़े शहतूत के पेड़ों की पत्तियां खा जाते हैं और नर्सरी में खड़े पेड़ भी नष्ट कर देते हैं।
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इस फार्म से गांव के तमाम लोगों को रोजगार मिला हुआ है। वर्तमान में लगभग बीस परिवारों में रेशम के कीटों को पालन किया जा रहा है। इसके अलावा शहतूत के पेड़ की टहनियों से टोकरी आदि बनाने से भी कई परिवारों को रोजगार मिलता है।
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कैसे तैयार होता है रेशम
पुवायां। महमूदपुर सैंजनियां के राजकीय रेशम फार्म पर दो श्रेणी के कीटों से रेशम प्राप्त किया जाता है। फरवरी और मार्च में वाय बोल्टाईन कीट को पाला जाता है। इसके अलावा अप्रैल में एफ-1 कीट पाला जाता है। रेशम कीट के अंडे लाकर फार्म पर ट्रे में रखे जाते हैं। इनसे कीट होने के बाद लोगों को पालने के लिए दे दिए जाते हैं। लोग घरों में कीटों को जालीदार ट्रे में रख देते हैं और फार्म से शहतूत की पत्तियां लाकर ट्रे में डाल देते हैं। कीड़े पत्तियों को खाकर बड़े होते हैं और कुछ ही दिन में अपने चारो ओर रेशम बुन देते हैं। वाय बोल्टाईन के एक कीट से लगभग 18 सौ मीटर और एफ-1 से लगभग 13 हजार मीटर रेशम प्राप्त होता है। कोया तैयार होने के बाद पीलीभीत में निश्चित तिथि पर बाजार में रेशम कोए को ले जाकर बिक्री कर दिया जाता है। एफ-1 लगभग 130 रुपए किलो और वाय बोल्टाईन लगभग 225 रुपए किलो बिकता है। रेशम कीट खरीदने के लिए पश्चिम बंगाल, बनारस सहित तमाम जगह से व्यापारी आते हैं। रेशम ज्यादा होने पर व्यापारी इसे घर से भी उठा लेते हैं। कीट पालने वाले परिवार को एक माह में लगभग पांच से दस हजार रुपए की आय हो जाती है। घर के पुरूष सदस्य खेत आदि में काम को चले जाते हैं, महिलाएं पत्तियां आदि लाकर कीट पालन कर अतिरिक्त आय कर लेती हैं।
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यह है समस्याएं
पुवायां। अधिकारियों की लापरवाही के चलते रेशम फार्म की काफी भूमि पर अवैध कब्जा हो चुका है। इसके अलावा तमाम क्षेत्रफल खाली पड़ा हुआ है। इसमें शहतूत के पेड़ लगने से ज्यादा कीट पालन किया जा सकता है। सबसे बड़ी आवश्यकता फार्म की भूमि पर बाउंड्री वॉल की है। बाउंड्री बन जाने से बाहरी पशुओं से पेड़ो की सुरक्षा हो सकेगी और अवैध कब्जे से भी मुक्ति मिल सकेगी। इसके अलावा एक दिक्कत यह भी है कि फार्म में नर्सरी लगाने, गुड़ाई करने और अन्य काम करने वालों को भुगतान काफी देरी से हो पाता है। नर्सरी लगाए जाने का कुछ श्रमिकों का भुगतान एक वर्ष बीत जाने के बाद भी नहीं मिल सका है। समस्याओं का निराकरण नहीं होने से रेशम फार्म अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहा है।