{"_id":"5e188f8dc418f6ee49b30228769f59dc","slug":"the-district-is-not-cancer-diagnosis-facility-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"जिले में नहीं है कैंसर डायग्नोसिस सुविधा ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जिले में नहीं है कैंसर डायग्नोसिस सुविधा
रीतेश माथुर/शाहजहांपुर।
Updated Fri, 06 Nov 2015 09:05 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सात नवंबर को विश्व कैंसर जागरूकता दिवस है, लेकिन जिले के सरकारी और निजी अस्पतालों में इस रोग के डायग्नोसिस तक की न्यूनतम सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसके विशेषज्ञ चिकित्सक भी यहां नहीं हैं। इस संबंधी प्रस्ताव कागजों में भले ही शासन को गया है लेकिन उस पर क्रियान्वयन का संकेत तक अभी नहीं मिला है। आलम यह है कि दिख रहे लक्षण, एक्सरे या अल्ट्रासाउंड के आधार पर सिर्फ कैंसर होने का अंदाजा होते ही यहां चिकित्सक मरीज को लखनऊ, बीएचयू (वाराणसी), दिल्ली या मुंबई सरीखे सेंटरों के लिए रेफर कर देते हैं।
जिला अस्पताल में ओपीडी में मरीज देखने वाले सर्जन और फीजिशियन के यहां सालाना करीब 110 से 130 के बीच ऐसे लक्षणों वाले मरीज पहुंचते हैं। इनमें पुरुषों की संख्या करीब 75 से 80 होती है, जिन्हें मुख्य रूप से मुंह, गला, फेफड़े या पित्त की थैली में कैंसर होने का लक्षण दिखता है। इसी तरह जिला महिला अस्पताल में ब्रेस्ट या गर्भाशय कैंसर के लक्षण वाली मरीज सालाना 30 से 60 की संख्या में पहुंचते हैं। जिला अस्पताल के फीजिशियन डा. एमएल अग्रवाल बताते हैं कि मुंह का कैंसर तो प्रथम दृष्ट्या ही मरीज को देखने में ही समझ में आ जाता है। सालाना अपने यहां ऐसे करीब 10 से 15 तक की संख्या में मरीज आते हैं। इनमें वैसे मरीज ज्यादा होते हैं जो तंबाकू या गुटखा का अधिक देर तक या ज्यादा मात्रा में सेवन करने वाले होते हैं। इन्हीं कारणों से गले में कैंसर सरीखी तकलीफ के साथ भी मरीज आते हैं। कम पौष्टिक भोजन करने की तुलना में शराब का ज्यादा सेवन करने वालों एवं साथ में धूम्रपान भी करने वाले मरीजों में फेफड़े के कैंसर सरीखे लक्षण दिखते हैं, जिन्हें एक्सरे फिल्म देखकर ही अंदाज लगा लिया जाता है।
सीएमओ डा. सुधीर कुमार गर्ग ने बताया कि कैंसर रोग के डायग्नोसिस संबंधी सीटी सरीखी बुनियादी जांच तक की सुविधा पैथोलॉजी में नहीं है, तो रेडियोथैरेपी और कीमोथैरेपी की बात कहां सोची जाए। बुनियादी जांच की सुविधा शुरू कराने संबंधी प्रस्ताव जिले से शासन को गया हुआ है।
विज्ञापन
विज्ञापन
जिला अस्पताल में ओपीडी में मरीज देखने वाले सर्जन और फीजिशियन के यहां सालाना करीब 110 से 130 के बीच ऐसे लक्षणों वाले मरीज पहुंचते हैं। इनमें पुरुषों की संख्या करीब 75 से 80 होती है, जिन्हें मुख्य रूप से मुंह, गला, फेफड़े या पित्त की थैली में कैंसर होने का लक्षण दिखता है। इसी तरह जिला महिला अस्पताल में ब्रेस्ट या गर्भाशय कैंसर के लक्षण वाली मरीज सालाना 30 से 60 की संख्या में पहुंचते हैं। जिला अस्पताल के फीजिशियन डा. एमएल अग्रवाल बताते हैं कि मुंह का कैंसर तो प्रथम दृष्ट्या ही मरीज को देखने में ही समझ में आ जाता है। सालाना अपने यहां ऐसे करीब 10 से 15 तक की संख्या में मरीज आते हैं। इनमें वैसे मरीज ज्यादा होते हैं जो तंबाकू या गुटखा का अधिक देर तक या ज्यादा मात्रा में सेवन करने वाले होते हैं। इन्हीं कारणों से गले में कैंसर सरीखी तकलीफ के साथ भी मरीज आते हैं। कम पौष्टिक भोजन करने की तुलना में शराब का ज्यादा सेवन करने वालों एवं साथ में धूम्रपान भी करने वाले मरीजों में फेफड़े के कैंसर सरीखे लक्षण दिखते हैं, जिन्हें एक्सरे फिल्म देखकर ही अंदाज लगा लिया जाता है।
विज्ञापन
सीएमओ डा. सुधीर कुमार गर्ग ने बताया कि कैंसर रोग के डायग्नोसिस संबंधी सीटी सरीखी बुनियादी जांच तक की सुविधा पैथोलॉजी में नहीं है, तो रेडियोथैरेपी और कीमोथैरेपी की बात कहां सोची जाए। बुनियादी जांच की सुविधा शुरू कराने संबंधी प्रस्ताव जिले से शासन को गया हुआ है।
विज्ञापन