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World Tiger Day: शाहजहांपुर में कभी सुनाई पड़ती थी बाघों की दहाड़, अंग्रेजों ने सूना कर दिया था जंगल
Wed, 29 Jul 2026 04:24 PM IST
Mukesh Kumar
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहांपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, शाहजहांपुर
Published by: Mukesh Kumar
Updated Wed, 29 Jul 2026 04:24 PM IST
सार
शाहजहांपुर के जंगल कभी बाघों का घर थे। इतिहासकार विकास खुराना ने बताया कि ब्रिटिश शिकार से 1909 तक बाघ लगभग खत्म हो गए। बिली अर्जन सिंह के प्रयासों से दुधवा और पीलीभीत टाइगर रिजर्व बने। इसमें शाहजहांपुर की भूमि भी शामिल है।
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शाहजहांपुर जिले में वन क्षेत्र
- फोटो : संवाद
विस्तार
एक समय शाहजहांपुर के उत्तर और उत्तर-पूर्व के घने जंगल बाघों के स्वतंत्र विचरण और प्रजनन के लिए देश के सबसे उपयुक्त क्षेत्रों में शामिल थे। यहां बाघों का दहाड़ गूंजती थी। एसएस कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष एवं इतिहासकार डॉ. विकास खुराना ने बताया कि ब्रिटिशकालीन दस्तावेजों के अनुसार 19वीं सदी की शुरुआत तक बाघ रामगंगा तक निर्बाध विचरण करते थे। हिमालय की तराई से लगी जलवायु और घने वन उनके लिए अनुकूल थे।
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उन्होंने बताया कि अंग्रेज अधिकारियों के शिकार के जुनून ने कुछ ही दशकों में बाघों की संख्या नगण्य कर दी। गजेटियर ऑफ टेरिटरीज अंडर द नॉर्थ वेस्ट प्रोविन्स, द लेविन लेटर्स और द ओरिजिनल स्पोर्ट्स में तत्कालीन जिलाधिकारी मॉड्यूटेंट रिक्ट्रेट के 20 तथा कर्नल प्लेट व वॉर्मटेंट पार्टी के 12-12 बाघों के शिकार का उल्लेख मिलता है। वर्ष 1909 तक जिले से बाघ लगभग समाप्त हो चुके थे।
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जिले में भेड़ियों का आतंक भी रहा
डॉ. खुराना के अनुसार बाघों के खत्म होने के बाद शाहजहांपुर में भेड़ियों का आतंक बढ़ गया और जिले को भेड़ियों का घर तक कहा जाने लगा। बाद में वन्यजीव संरक्षणवादी बिली अर्जन सिंह के प्रयासों से 1977 में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान और 1988 में पीलीभीत टाइगर रिजर्व अस्तित्व में आया, जिसमें शाहजहांपुर की 1736.90 हेक्टेयर भूमि भी शामिल की गई।
प्रिंस, हैरियट, जूलियट और बाघिन तारा जैसे बाघों के पुनर्वास से संरक्षण अभियान को नई दिशा मिली। आज दुधवा परिक्षेत्र में 90 से अधिक बाघ हैं। डॉ. खुराना का कहना है कि बाघ स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र के सबसे बड़े संरक्षक हैं, इसलिए उनका संरक्षण पर्यावरण संरक्षण की अनिवार्य शर्त है।