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...जिंदगी की रंगशाला, मंच पर छाए विदूषक
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प्रवाह साहित्य संस्थान की ओर से आयोजित गोष्ठी में कविता पेश करते कवि।
- फोटो : SHAHJAHANPUR
शाहजहांपुर। प्रवाह साहित्य संस्थान की ओर से काव्य गोष्ठी का आयोजन व्यंग्यकार उमेश चंद्र सिंह के संयोजन में केशव नगर स्थित उनके आवास पर किया गया। गोष्ठी में कवियों ने अपनी प्रस्तुति से समा बांध दिया।
अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि कमल ‘मानव’ ने गजल सुनाई- निर्झरों के नीर की पुकार शेष रह गई, पत्थरों के बीच की दरार शेष रह गई। सिंधु तक प्रयाण राग छेड़ती नदी चली, नाम शेष रह गया न धार शेष रह गई। वरिष्ठ कवि विजय ठाकुर ने गजल सुनाई- है सवेरा किन्तु कोहरे से ढका है, लग रहा ज्यों आज का सूरज थका है। कवि सुशील दीक्षित ‘विचित्र’ ने मुक्तक सुनाया- कौन कहता है कि कमाल होना है, वही बेहूदा सवाल होना है। गर्दनों आरियों में यारी क्या, गर्दनों को हलाल होना है। कवि ज्ञानेंद्र मोहन ‘ज्ञान’ ने गीत सुनाया- साथ-साथ चलते-चलते जो, चोट दे गए तगड़ी। पूछ रहे हैं वे ही मुझसे, बात कहां पर बिगड़ी।
कवि कुलदीप दीपक ने मुक्तक सुनाया- रंग तो खेलिए ये खेलने के होते हैं। हरेक पल यहां तो गीत गजल होते हैं। गीतकार ब्रजेश मिश्र ने गीत सुनाया- जीवन के रंगमंच से जो निर्वासित होकर खड़ा रहा, इस खत की पीर कौन बांचे जो पढ़कर भी अनपढ़ा रहा। नवगीतकार डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री ने रंगमंच दिवस पर गीत सुनाया- जिंदगी रंगमंच, जिस पर चल रहा नाटक, हाथ बांधे देखते दर्शक। जिंदगी की रंगशाला, मंच पर छाए विदूषक। व्यंग्यकार उमेश चंद्र सिंह, कवि डॉ. राजीव सिंह ‘भारत’, कवि चंद्र मोहन पाठक, अरुण दीक्षित अनभिज्ञ ने भी अपनी रचनाएं पेश कीं। गोष्ठी में आदर्श सिंह, अमित सिंह आदि उपस्थित रहे। सत्यभामा सिंह ने सभी का आभार व्यक्त किया।
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अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि कमल ‘मानव’ ने गजल सुनाई- निर्झरों के नीर की पुकार शेष रह गई, पत्थरों के बीच की दरार शेष रह गई। सिंधु तक प्रयाण राग छेड़ती नदी चली, नाम शेष रह गया न धार शेष रह गई। वरिष्ठ कवि विजय ठाकुर ने गजल सुनाई- है सवेरा किन्तु कोहरे से ढका है, लग रहा ज्यों आज का सूरज थका है। कवि सुशील दीक्षित ‘विचित्र’ ने मुक्तक सुनाया- कौन कहता है कि कमाल होना है, वही बेहूदा सवाल होना है। गर्दनों आरियों में यारी क्या, गर्दनों को हलाल होना है। कवि ज्ञानेंद्र मोहन ‘ज्ञान’ ने गीत सुनाया- साथ-साथ चलते-चलते जो, चोट दे गए तगड़ी। पूछ रहे हैं वे ही मुझसे, बात कहां पर बिगड़ी।
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कवि कुलदीप दीपक ने मुक्तक सुनाया- रंग तो खेलिए ये खेलने के होते हैं। हरेक पल यहां तो गीत गजल होते हैं। गीतकार ब्रजेश मिश्र ने गीत सुनाया- जीवन के रंगमंच से जो निर्वासित होकर खड़ा रहा, इस खत की पीर कौन बांचे जो पढ़कर भी अनपढ़ा रहा। नवगीतकार डॉ. प्रशांत अग्निहोत्री ने रंगमंच दिवस पर गीत सुनाया- जिंदगी रंगमंच, जिस पर चल रहा नाटक, हाथ बांधे देखते दर्शक। जिंदगी की रंगशाला, मंच पर छाए विदूषक। व्यंग्यकार उमेश चंद्र सिंह, कवि डॉ. राजीव सिंह ‘भारत’, कवि चंद्र मोहन पाठक, अरुण दीक्षित अनभिज्ञ ने भी अपनी रचनाएं पेश कीं। गोष्ठी में आदर्श सिंह, अमित सिंह आदि उपस्थित रहे। सत्यभामा सिंह ने सभी का आभार व्यक्त किया।
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