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सिर चढ़कर बोला आतिशबाजी का शौक, फोड़े दो करोड़ के पटाखे

Mon, 28 Oct 2019 09:12 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 28 Oct 2019 09:12 PM IST
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शाहजहांपुर। प्रशासनिक रोक-टोक के बावजूद दिवाली पर आतिशबाजी का शौक लोगों के सिर चढ़कर बोला। अधिकारियों ने तेज आवाज वाले पटाखों की लड़ियों (चटाई) की बिक्री प्रतिबंधित करने के साथ रात दस बजे के बाद से सुबह छह बजे तक आतिशबाजी नहीं जलाने के निर्देश दिए थे, लेकिन अनार, फुलझड़ी और रॉकेट बम जैसे आइटमों से आधी रात के बाद तक आसमान मेें रोशनी के साथ शोर गूंजता रहा। बंपर बिक्री से शाम सात बजे तक अधिकांश दुकानों पर अनार, फुलझड़ी, रॉकेट आदि रोशनी बिखेरने वाले आइटम खत्म हो गए। हालांकि, आतिशबाजी के साउंड इफेक्ट के तौर पर कानफोड़ू बम-पटाखों से ध्वनि प्रदूषण को बढ़ावा मिला, वहीं रंगीन आतिशबाजी में प्रयुक्त केमिकल जलने से उत्सर्जित गैसों ने हवा में जहर घोलने का काम किया।
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शहर में इस बार ओसीएफ रामलीला ग्राउंड के पटाखा बाजार में 48 दुकानें लगाई गईं जबकि 30 से अधिक दुकानें मुमुक्षु आश्रम परिसर मैदान में लगीं। ओसीएफ ग्राउंड के पटाखा बाजार में करीब 80 लाख रुपये की आतिशबाजी बिकी जबकि मुमुक्षु आश्रम के बाजार में अजीजगंज और आसपास के लोगों ने 50 लाख की आतिशबाजी खरीद डाली। इसके अलावा 70 से 80 लाख रुपये की आतिशबाजी तहसीलों में बिक गई। आतिशबाजी के थोक विक्रेता वेद प्रकाश गुप्ता के अनुसार मार्केट में ग्रीन पटाखों की कमी परंपरागत आतिशबाजी ने पूरी कर दी और रेट 20 फीसदी बढ़ने के बावजूद करीब दो करोड़ रुपये से अधिक के पटाखे लोगों ने खरीदे।
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इस तरह शारीरिक हानि पहुंचाते हैं बम-पटाखे
बम-पटाखों में अमूमन मुख्य घटक के तौर पर गंधक और पोटाश प्रयोग होता है। यह दोनों तत्व आपस में जलने पर रसायनिक क्रिया करके न केवल असहनीय आवाज पैदा करते हैं, घना जहरीला धुआं भी छोड़ते हैं। इसी तरह फुलझड़ी समेत रंगबिरंगी रोशनी बिखेरने वाले अनार, राकेट आदि आतशबाजी आइटम वायुमंडल में पहले से मौजूद कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा बढ़ाने के साथ कार्बन मोनोआक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, सल्फर डाईआक्साइड आदि विषैली गैसों की मात्रा बढ़ाते हैं। पर्यावरणविदों एवं जीव विज्ञानियों के अनुसार हमारे कान जितना शोर सहने की क्षमता रखते हैं, उससे तीन से चार गुना आवाज बम-पटाखों से होती है। ऐसी स्थिति में सिरदर्द, कान से तरल रिसाव, सांस लेने में कठिनाई, आंखों मेें जलन आदि समस्याएं बढ़ जाती हैं।
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रसायनों का लंबे समय तक रहता है दुष्प्रभाव
- आतिशबाजी जलाने से हानिकारक रसायनों का दुष्प्रभाव तत्काल भले ही न दिखाई दे, बाद में लंबे समय तक उनका असर रहता है। तेज आवाज से उत्पन्न ध्वनि प्रदूषण से मष्तिष्क को क्षति पहुंचती है और मानसिक विकार पैदा हो सकते हैं। कार्बन मोनोआक्साइड, सल्फर डाईआक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड आदि गैसें शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर हमला कर जीवनभर को अपाहिज बना सकती हैं। इन बीमारियों से बचने के लिए अभिभावकों को अपनी निगरानी में बच्चों से सीमित आतिशबाजी जलवानी चाहिए।

-प्रोफेसर जमील अहमद, प्राचार्य, जीएफ कालेज
- जमीन पर फटने वाले बम-पटाखे आसमान में जाकर आवाज करने वाले राकेट से कहीं ज्यादा हानिकारक होते हैं। - हमारे कान अधिकतम 40 डेसिबल तीव्रता की ध्वनि बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन सुतली बम का शोर 150 से 180 डेसिबल तक होता है। 90 से 120 डेसिबल का शोर सिरदर्द, माइग्रेन जैसी समस्याएं दे सकता है। इससे अधिक शोर के निकट लगातार रहने से बहरेपन की समस्या पैदा हो सकती है। इसके अतिरिक्त बच्चों-बुजुर्गों में कई तरह की दिक्कतें पैदा हो सकती हैं।
-डॉ. विकास खुराना, अध्यक्ष, पृथ्वी (पर्यावरण रक्षा को समर्पित संस्था)
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