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ऑनलाइन गेम की लत बच्चों को बना रही मानसिक बीमार
सार
राजकीय मेडिकल कॉलेज के मन कक्ष में एक महीने में पांच से सात केस इस तरह के आ चुके हैं। पहले पढ़ाई में होनहार रहे बच्चे बाद में फिसड्डी होने के बाद अभिभावकों की चिंता एकदम बढ़ गई है। राजकीय मेडिकल कॉलेज के मन कक्ष में काउंसलिंग और मनोचिकित्सा के बाद उसे राहत मिली।ये बरतें सावधानीसुबह की शुरुआत न खुद मोबाइल के साथ करें और न बच्चों को करने दें।बच्चे पसंदीदा शो देखने के लिए मोबाइल मांगें तो टीवी पर शो चला दें।टीवी देखने का समय भी बच्चों के लिए निर्धारित होना चाहिए।खाने की टेबल पर फोन लेकर न बैठें, ऐसा करने से बच्चे भी जिद करेंगे।बच्चों को गेम खेलने के लिए बोर्ड गेम या फिजिकल एक्टिविटीज कराएं।तीन महीने तक बच्चों का चलता है उपचार10 से 15 दिन के अंतराल में बच्चों को मन कक्ष में बुलाया जाता है।70 से 80 रोगी हर दिन मन कक्ष में पहुंचते हैं।फोटो नंबर 08 एसपीएनपी 13ऑनलाइन गेम बच्चों के मानसिक विकास में बाधक होने लगे हैं।
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मोबाइल में गेम खेलता बच्चा
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
अकेला रहना पसंद करते हैं बच्चे, पढ़ाई में नहीं लगता मन
शाहजहांपुर। ऑनलाइन गेम की लत बच्चों को मानसिक रोगी बना रही है। इसके लक्ष्ण हैं कि बच्चे अकेला रहना ज्यादा पसंद करने लगते हैं। उनका पढ़ाई में मन नहीं लगता। चिड़चिड़ाहट भी बढ़ जाती है। राजकीय मेडिकल कॉलेज के मन कक्ष में एक महीने में पांच से सात केस इस तरह के आ चुके हैं। ऐसे बच्चों की काउंसलिंग और मनोचिकित्सा के जरिए उपचार किया जा रहा है।
कई घरों के बच्चों को मोबाइल की ऐसी लत है कि वे मोबाइल छोड़ना ही नहीं चाहते। मोबाइल लेने पर एकदम गुस्सा हो जाते हैं। घर का सामान तोड़ देते हैं। उनके व्यवहार में उग्रता आ जाती है। इसके चलते उनमें तनाव बढ़ रहा है। कुछ मामलों में दौरे भी पड़ने लगते हैं। इससे बच्चों का मानसिक विकास रुक रहा है। वे गुमसुम रहने लगे हैं।
पहले पढ़ाई में होनहार रहे बच्चे बाद में फिसड्डी होने के बाद अभिभावकों की चिंता एकदम बढ़ गई है। ऐसे लक्षण नजर आने पर लोग बच्चे को मनोचिकित्सक के पास ला रहे हैं। राजकीय मेडिकल कॉलेज के मनकक्ष की ओपीडी में 70 से 80 रोगी प्रतिदिन पहुंच रहे हैं। ऑनलाइन गेम के लती पांच से सात बच्चे हर महीने पहुंचते हैं। मनोचिकित्सक उनकी काउंसलिंग और उपचार करते हैं। दवाएं भी देते हैं।
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बच्चे को दौरे पड़े तो डॉक्टर को दिखाया
दस वर्ष का बालक ऑनलाइन गेम खेलने के कारण बीमार हो गया। उसे अक्सर दौरे पड़ने लगे। घबराए अभिभावक उसे डॉक्टर के पास ले गए। यहां पर उसका उपचार किया गया।
गेम खेलते हुए अजीब आवाज निकालने लगी किशोरी
13 साल की एक किशोरी गेम खेलते हुए गेम के एक किरदार की तरह ही मुंह से आवाज निकालने लगी। उसकी यह हरकत देखकर परिवार के लोग परेशान हो गए। राजकीय मेडिकल कॉलेज के मन कक्ष में काउंसलिंग और मनोचिकित्सा के बाद उसे राहत मिली।
ये बरतें सावधानी
सुबह की शुरुआत न खुद मोबाइल के साथ करें और न बच्चों को करने दें।
बच्चे पसंदीदा शो देखने के लिए मोबाइल मांगें तो टीवी पर शो चला दें।
टीवी देखने का समय भी बच्चों के लिए निर्धारित होना चाहिए।
खाने की टेबल पर फोन लेकर न बैठें, ऐसा करने से बच्चे भी जिद करेंगे।
बच्चों को गेम खेलने के लिए बोर्ड गेम या फिजिकल एक्टिविटीज कराएं।
तीन महीने तक बच्चों का चलता है उपचार
10 से 15 दिन के अंतराल में बच्चों को मन कक्ष में बुलाया जाता है।
70 से 80 रोगी हर दिन मन कक्ष में पहुंचते हैं।
ऑनलाइन गेम बच्चों के मानसिक विकास में बाधक होने लगे हैं। मन कक्ष में ऐसे बच्चों की काउंसलिंग की जाती है। उनके अभिभावकों को भी जागरूक करते हैं। मोबाइल को बोरिंग चीज की तरह बच्चों के सामने पेश करें तो वे खुद उससे दूर रहेंगे।
- डॉ. रोहिताश, क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक, राजकीय मेडिकल कॉलेज
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शाहजहांपुर। ऑनलाइन गेम की लत बच्चों को मानसिक रोगी बना रही है। इसके लक्ष्ण हैं कि बच्चे अकेला रहना ज्यादा पसंद करने लगते हैं। उनका पढ़ाई में मन नहीं लगता। चिड़चिड़ाहट भी बढ़ जाती है। राजकीय मेडिकल कॉलेज के मन कक्ष में एक महीने में पांच से सात केस इस तरह के आ चुके हैं। ऐसे बच्चों की काउंसलिंग और मनोचिकित्सा के जरिए उपचार किया जा रहा है।
कई घरों के बच्चों को मोबाइल की ऐसी लत है कि वे मोबाइल छोड़ना ही नहीं चाहते। मोबाइल लेने पर एकदम गुस्सा हो जाते हैं। घर का सामान तोड़ देते हैं। उनके व्यवहार में उग्रता आ जाती है। इसके चलते उनमें तनाव बढ़ रहा है। कुछ मामलों में दौरे भी पड़ने लगते हैं। इससे बच्चों का मानसिक विकास रुक रहा है। वे गुमसुम रहने लगे हैं।
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पहले पढ़ाई में होनहार रहे बच्चे बाद में फिसड्डी होने के बाद अभिभावकों की चिंता एकदम बढ़ गई है। ऐसे लक्षण नजर आने पर लोग बच्चे को मनोचिकित्सक के पास ला रहे हैं। राजकीय मेडिकल कॉलेज के मनकक्ष की ओपीडी में 70 से 80 रोगी प्रतिदिन पहुंच रहे हैं। ऑनलाइन गेम के लती पांच से सात बच्चे हर महीने पहुंचते हैं। मनोचिकित्सक उनकी काउंसलिंग और उपचार करते हैं। दवाएं भी देते हैं।
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बच्चे को दौरे पड़े तो डॉक्टर को दिखाया
दस वर्ष का बालक ऑनलाइन गेम खेलने के कारण बीमार हो गया। उसे अक्सर दौरे पड़ने लगे। घबराए अभिभावक उसे डॉक्टर के पास ले गए। यहां पर उसका उपचार किया गया।
गेम खेलते हुए अजीब आवाज निकालने लगी किशोरी
13 साल की एक किशोरी गेम खेलते हुए गेम के एक किरदार की तरह ही मुंह से आवाज निकालने लगी। उसकी यह हरकत देखकर परिवार के लोग परेशान हो गए। राजकीय मेडिकल कॉलेज के मन कक्ष में काउंसलिंग और मनोचिकित्सा के बाद उसे राहत मिली।
ये बरतें सावधानी
सुबह की शुरुआत न खुद मोबाइल के साथ करें और न बच्चों को करने दें।
बच्चे पसंदीदा शो देखने के लिए मोबाइल मांगें तो टीवी पर शो चला दें।
टीवी देखने का समय भी बच्चों के लिए निर्धारित होना चाहिए।
खाने की टेबल पर फोन लेकर न बैठें, ऐसा करने से बच्चे भी जिद करेंगे।
बच्चों को गेम खेलने के लिए बोर्ड गेम या फिजिकल एक्टिविटीज कराएं।
तीन महीने तक बच्चों का चलता है उपचार
10 से 15 दिन के अंतराल में बच्चों को मन कक्ष में बुलाया जाता है।
70 से 80 रोगी हर दिन मन कक्ष में पहुंचते हैं।
ऑनलाइन गेम बच्चों के मानसिक विकास में बाधक होने लगे हैं। मन कक्ष में ऐसे बच्चों की काउंसलिंग की जाती है। उनके अभिभावकों को भी जागरूक करते हैं। मोबाइल को बोरिंग चीज की तरह बच्चों के सामने पेश करें तो वे खुद उससे दूर रहेंगे।
- डॉ. रोहिताश, क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक, राजकीय मेडिकल कॉलेज