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नहीं रहे स्वतंत्रता सेनानी बसंत लाल खन्ना
शाहजहांपुर।
Updated Sat, 19 Sep 2015 08:40 PM IST
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं अधिवक्ता बसंत लाल खन्ना का शनिवार सुबह करीब 8.30 बजे गौहरपुरा रैना बाग कॉलोनी स्थित आवास पर निधन हो गया। वह करीब 88 साल के थे। गर्रा मोक्षधाम पर शाम करीब पांच बजे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। पुलिस की टुकड़ी ने स्वतंत्रता सेनानी के सम्मान में शस्त्र झुकाकर सलामी दी। मुखाग्नि उनके पुत्र राजीव खन्ना ने दी।
बसंतलाल खन्ना का 17 फरवरी 2015 को कमरे में गिर जाने के कारण कूल्हा टूट गया था, जिससे वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गए थे और घर पर ही उनका इलाज चल रहा था। इस दौरान वह काफी कमजोर भी हो गए थे। बेटे राजीव ने बताया कि बाबूजी को सुबह कपड़े बदलवाने के बाद जब चाय पिलाई गई तब वह स्वस्थ महसूस कर रहे थे, लेकिन कुछ समय बाद ही उनका निधन हो गया। उनके निधन का समाचार फैलते देर नहीं लगी और कुछ समय पश्चात ही उनके अंतिम दर्शनों के लिए लोग उनके गौहरपुरा स्थित आवास पर पहुंचना शुरू हो गए। दिन में एसडीएम सदर एपी श्रीवास्तव ने प्रशासन की ओर से पुष्पचक्र चढ़ाकर श्रद्धासुमन अर्पित किए। इसके बाद सीओ सिटी डॉ. कृष्ण गोपाल यादव ने भी पुष्पांजलि अर्पित की।
शाम करीब साढ़े चार बजे उनकी अंतिम यात्रा गर्रा मोक्षधाम के लिए निकाली गई। घर पर उमड़े लोगों ने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित कर भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। उनकी अंतिम यात्रा में भी बड़ी संख्या में राजनीतिज्ञ, अधिवक्ता, समाजसेवी तथा अन्य गणमान्य शामिल हुए।
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श्रद्धांजलि देने वालों में प्रमुख रूप से पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद, समाजसेवी रमेश भइया, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अमोघ चंद्र दीक्षित, महामंत्री राजीव गुप्ता, वरिष्ठ भाजपा नेता निर्भय चंद्र सेठ, सुबोध चंद्र सेठ, कांग्रेस जिलाध्यक्ष कौशल मिश्रा, पूर्व अध्यक्ष धर्मेंद्र दीक्षित, अशफाक उल्ला खां, भाजपा जिलाध्यक्ष वीरेंद्र पाल सिंह यादव, व्यापारी नेता वेद प्रकाश गुप्ता, अरुण खंडेलवाल, विनोद अग्रवाल, डॉ. पुनीत टंडन, संजय चोपड़ा, चंद्र मोहन महेंद्रू, डॉ. अवनीश मिश्र, एजाज हसन, मसूद हसन खां, महेश द्विवेदी, जसविंदर सिंह बजाज, रवि मिश्रा, डॉ. अवधेश मणि त्रिपाठी, डॉ. सुरेश मिश्र, डॉ. इंदु अजनबी, डॉ. राज कुमार शर्मा, बसपा नेता मानवेंद्र सिंह, प्रह्लाद राय अग्रवाल, रामचंद्र सिंघल, बृजेश पांडेय, डॉ. आफताब अख्तर समेत बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
‘जेल में बिताए समय को बताया था स्वर्णिम समयÓ
अजय अवस्थी
शाहजहांपुर। स्वतंत्रता सेनानी बसंत लाल खन्ना ने अमर उजाला को दिए अपने अंतिम इंटरव्यू में कहा था कि ‘आजादी की लड़ाई में जेल में बिताया गया समय ही स्वर्णिम पीरियड समय था, यदि वह आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी नहीं करते तो जेल नहीं जाते और जेल नहीं जाते तो वह भी सर्राफा की दुकान खोलकर जीवन के दिन काट रहे होतेÓ।
यह इंटरव्यू श्री खन्ना ने अपने गौहरपुरा स्थित आवास पर आठ अगस्त 2014 को दिया था। चूंकि नौ अगस्त को अंग्रेजों भारत छोड़ो अभियान की वर्षगांठ थी, सो उस दिन शहर का माहौल कैसा था और किसने क्या प्रतिक्रिया दी थी आदि बातों की जानकारी उनसे लेने मैं उनके आवास पर जा पहुंचा था। परिचित तो थे ही वह, सो उन्होंने अपने कमरे में बैठाकर अपनी यादों का पिटारा खोलना शुरू कर दिया। बताया: उस समय वह मिशन स्कूल में कक्षा आठ के छात्र थे। जैसे ही रात में गांधीजी के मुंबई अधिवेशन में गिरफ्तार होने की सूचना रेडियो पर प्रसारित हुई कि 10 अगस्त को स्कूल की छुट्टी कर उन्होंने दो-ढाई सौ छात्रों के साथ अंग्रेजी सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए सदर थाने की ओर रुख कर दिया था। इस जुलूस में अन्य स्कूलों के छात्र भी शामिल हो गए था।
बताया: सदर थाना पहुंचते-पहुंचते यह संख्या करीब दो हजार तक जा पहुंची थी, लोगों में जबरदस्त आक्रोष था। इसी बीच थाना के सामने पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया। एक दिन पहले ही उनके बड़े भाई मन्नीलाल खन्ना भी गिरफ्तार किए जा चुके थे। गिरफ्तारी के बाद उन्हें सिटी मजिस्ट्रेट के यहां पेशी पर लाया गया। यहां उन्होंने कह दिया था कि बेइमानों की सरकार पर उन्हें कोई भरोसा नहीं, लिहाजा वह मुकदमा नहीं लड़ना चाहते। 18 नवंबर 1942 को उन्हें छह माह का कठोर कारावास और 50 रुपये जुर्माना की सजा सुनाई गई। जुर्माना अदा नहीं करने पर उन्हें दो माह की अतिरिक्त सजा भी हुई।
एक माह तन्हाई की सजा भी काटी थी
बसंत लाल बताते थे कि जिला कारागार में जब वह बंद किए गए थे तब डीआईजी सारोमन जेल में आए थे। सुरक्षा कड़ी थी, उन्हें जब बात करने के लिए बुलाया गया तभी उन्होंने एक अधिकारी से गेट आउट कह दिया था। इस पर छोटी सी बैरक में एक माह तन्हाई में रखा गया। यह वही बैरक थी जिसमें फांसी सजायाफ्ता वाले रखे जाते थे। इससे उनके हौसले और बुलंद हो गए थे।
दो और भाई लड़े थे आजादी की लड़ाई
बसंतलाल खन्ना ने बताया था वह पांच भाई और दो बहनें हैं। राधेश्याम खन्ना, चुन्नीलाल खन्ना, कामता प्रसाद खन्ना और मन्नीलाल खन्ना के बाद वह सबसे छोटे है।ं राधेश्याम और मन्नी लाल की प्रेरणा से ही उन्होंने आजादी की लड़ाई में भाग लिया। मन्नीलाल तो एक दिन पहले ही चौक से गिरफ्तार किए गए थे। उनकी संदल और बिब्बो नामक दो बहनें भी हैं, जबकि बसंत लाल खन्ना के एक पुत्र राजीव खन्ना एसबीआई केरूगंज में शाखा प्रबंधक हैं और शालिनी और अल्का नामक दो बेटियां सीतापुर और नोएडा स्थित ससुराल में हैं।
बार एसोसिएशन के फाउंडर अध्यक्ष थे
बसंत लाल खन्ना बार एसोसिएशन के फाउंडर अध्यक्ष भी थे। इस बात का खुलासा भी उन्होंने अमर उजाला से बातचीत के दौरान ही किया था। सभी अधिवक्ता उनका मान-सम्मान करते थे और उनकी बात भी मानते थे। बार लाइब्रेरी सशक्त बनाने के लिए साल 2012 में उन्होंने अपनी वकालत वाली सारी पुस्तकें बार लाइब्रेरी को दान कर दी थीं।
लॉ सोसाइटी लखनऊ के भी रहे अध्यक्ष
बसंत लाल खन्ना बताते थे कि वह 1952 में लखनऊ विश्वविद्यालय लॉ सोसाइटी के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने मिशन स्कूल से कक्षा आठ, एसपी कॉलेज से 12वीं, जीएफ कॉलेज से बीए और लखनऊ विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की थी।
फिर नहीं जुट सका एक अदद राष्ट्रीय ध्वज
यूं तो स्वतंत्रता सेनानी को अंतिम विदाई राजकीय सम्मान से ही दी जाती है। अंत्येष्टि से पूर्व कभी उनके आवास पर तो कभी मोक्षधाम पर शस्त्र झुकाकर उन्हें भावपूर्ण माहौल में सलामी दी जाती है, लेकिन परंपरानुसार पार्थिव शरीर पर राष्ट्रीय ध्वज डालने के लिए कोई व्यवस्था जिला प्रशासन की ओर से नहीं की जाती है। बसंतलाल खन्ना के साथ भी ऐसा ही हुआ। अंतिम समय में उनके घरवालों ने ही एक छोटे से राष्ट्रीय ध्वज की जैसे-तैसे व्यवस्था की थी। इससे पहले भी स्वतंत्रता सेनानी सुशील चंद्र गुप्त के शव के लिए भी प्रशासन तिरंगा नहीं जुटा पाया था। तब भी परिजनों ने ही अपनी ओर से यह सम्मान उन्हें दिया था।
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बसंतलाल खन्ना का 17 फरवरी 2015 को कमरे में गिर जाने के कारण कूल्हा टूट गया था, जिससे वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गए थे और घर पर ही उनका इलाज चल रहा था। इस दौरान वह काफी कमजोर भी हो गए थे। बेटे राजीव ने बताया कि बाबूजी को सुबह कपड़े बदलवाने के बाद जब चाय पिलाई गई तब वह स्वस्थ महसूस कर रहे थे, लेकिन कुछ समय बाद ही उनका निधन हो गया। उनके निधन का समाचार फैलते देर नहीं लगी और कुछ समय पश्चात ही उनके अंतिम दर्शनों के लिए लोग उनके गौहरपुरा स्थित आवास पर पहुंचना शुरू हो गए। दिन में एसडीएम सदर एपी श्रीवास्तव ने प्रशासन की ओर से पुष्पचक्र चढ़ाकर श्रद्धासुमन अर्पित किए। इसके बाद सीओ सिटी डॉ. कृष्ण गोपाल यादव ने भी पुष्पांजलि अर्पित की।
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शाम करीब साढ़े चार बजे उनकी अंतिम यात्रा गर्रा मोक्षधाम के लिए निकाली गई। घर पर उमड़े लोगों ने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित कर भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। उनकी अंतिम यात्रा में भी बड़ी संख्या में राजनीतिज्ञ, अधिवक्ता, समाजसेवी तथा अन्य गणमान्य शामिल हुए।
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श्रद्धांजलि देने वालों में प्रमुख रूप से पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद, समाजसेवी रमेश भइया, बार एसोसिएशन के अध्यक्ष अमोघ चंद्र दीक्षित, महामंत्री राजीव गुप्ता, वरिष्ठ भाजपा नेता निर्भय चंद्र सेठ, सुबोध चंद्र सेठ, कांग्रेस जिलाध्यक्ष कौशल मिश्रा, पूर्व अध्यक्ष धर्मेंद्र दीक्षित, अशफाक उल्ला खां, भाजपा जिलाध्यक्ष वीरेंद्र पाल सिंह यादव, व्यापारी नेता वेद प्रकाश गुप्ता, अरुण खंडेलवाल, विनोद अग्रवाल, डॉ. पुनीत टंडन, संजय चोपड़ा, चंद्र मोहन महेंद्रू, डॉ. अवनीश मिश्र, एजाज हसन, मसूद हसन खां, महेश द्विवेदी, जसविंदर सिंह बजाज, रवि मिश्रा, डॉ. अवधेश मणि त्रिपाठी, डॉ. सुरेश मिश्र, डॉ. इंदु अजनबी, डॉ. राज कुमार शर्मा, बसपा नेता मानवेंद्र सिंह, प्रह्लाद राय अग्रवाल, रामचंद्र सिंघल, बृजेश पांडेय, डॉ. आफताब अख्तर समेत बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
‘जेल में बिताए समय को बताया था स्वर्णिम समयÓ
अजय अवस्थी
शाहजहांपुर। स्वतंत्रता सेनानी बसंत लाल खन्ना ने अमर उजाला को दिए अपने अंतिम इंटरव्यू में कहा था कि ‘आजादी की लड़ाई में जेल में बिताया गया समय ही स्वर्णिम पीरियड समय था, यदि वह आजादी की लड़ाई में हिस्सेदारी नहीं करते तो जेल नहीं जाते और जेल नहीं जाते तो वह भी सर्राफा की दुकान खोलकर जीवन के दिन काट रहे होतेÓ।
यह इंटरव्यू श्री खन्ना ने अपने गौहरपुरा स्थित आवास पर आठ अगस्त 2014 को दिया था। चूंकि नौ अगस्त को अंग्रेजों भारत छोड़ो अभियान की वर्षगांठ थी, सो उस दिन शहर का माहौल कैसा था और किसने क्या प्रतिक्रिया दी थी आदि बातों की जानकारी उनसे लेने मैं उनके आवास पर जा पहुंचा था। परिचित तो थे ही वह, सो उन्होंने अपने कमरे में बैठाकर अपनी यादों का पिटारा खोलना शुरू कर दिया। बताया: उस समय वह मिशन स्कूल में कक्षा आठ के छात्र थे। जैसे ही रात में गांधीजी के मुंबई अधिवेशन में गिरफ्तार होने की सूचना रेडियो पर प्रसारित हुई कि 10 अगस्त को स्कूल की छुट्टी कर उन्होंने दो-ढाई सौ छात्रों के साथ अंग्रेजी सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए सदर थाने की ओर रुख कर दिया था। इस जुलूस में अन्य स्कूलों के छात्र भी शामिल हो गए था।
बताया: सदर थाना पहुंचते-पहुंचते यह संख्या करीब दो हजार तक जा पहुंची थी, लोगों में जबरदस्त आक्रोष था। इसी बीच थाना के सामने पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया। एक दिन पहले ही उनके बड़े भाई मन्नीलाल खन्ना भी गिरफ्तार किए जा चुके थे। गिरफ्तारी के बाद उन्हें सिटी मजिस्ट्रेट के यहां पेशी पर लाया गया। यहां उन्होंने कह दिया था कि बेइमानों की सरकार पर उन्हें कोई भरोसा नहीं, लिहाजा वह मुकदमा नहीं लड़ना चाहते। 18 नवंबर 1942 को उन्हें छह माह का कठोर कारावास और 50 रुपये जुर्माना की सजा सुनाई गई। जुर्माना अदा नहीं करने पर उन्हें दो माह की अतिरिक्त सजा भी हुई।
एक माह तन्हाई की सजा भी काटी थी
बसंत लाल बताते थे कि जिला कारागार में जब वह बंद किए गए थे तब डीआईजी सारोमन जेल में आए थे। सुरक्षा कड़ी थी, उन्हें जब बात करने के लिए बुलाया गया तभी उन्होंने एक अधिकारी से गेट आउट कह दिया था। इस पर छोटी सी बैरक में एक माह तन्हाई में रखा गया। यह वही बैरक थी जिसमें फांसी सजायाफ्ता वाले रखे जाते थे। इससे उनके हौसले और बुलंद हो गए थे।
दो और भाई लड़े थे आजादी की लड़ाई
बसंतलाल खन्ना ने बताया था वह पांच भाई और दो बहनें हैं। राधेश्याम खन्ना, चुन्नीलाल खन्ना, कामता प्रसाद खन्ना और मन्नीलाल खन्ना के बाद वह सबसे छोटे है।ं राधेश्याम और मन्नी लाल की प्रेरणा से ही उन्होंने आजादी की लड़ाई में भाग लिया। मन्नीलाल तो एक दिन पहले ही चौक से गिरफ्तार किए गए थे। उनकी संदल और बिब्बो नामक दो बहनें भी हैं, जबकि बसंत लाल खन्ना के एक पुत्र राजीव खन्ना एसबीआई केरूगंज में शाखा प्रबंधक हैं और शालिनी और अल्का नामक दो बेटियां सीतापुर और नोएडा स्थित ससुराल में हैं।
बार एसोसिएशन के फाउंडर अध्यक्ष थे
बसंत लाल खन्ना बार एसोसिएशन के फाउंडर अध्यक्ष भी थे। इस बात का खुलासा भी उन्होंने अमर उजाला से बातचीत के दौरान ही किया था। सभी अधिवक्ता उनका मान-सम्मान करते थे और उनकी बात भी मानते थे। बार लाइब्रेरी सशक्त बनाने के लिए साल 2012 में उन्होंने अपनी वकालत वाली सारी पुस्तकें बार लाइब्रेरी को दान कर दी थीं।
लॉ सोसाइटी लखनऊ के भी रहे अध्यक्ष
बसंत लाल खन्ना बताते थे कि वह 1952 में लखनऊ विश्वविद्यालय लॉ सोसाइटी के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने मिशन स्कूल से कक्षा आठ, एसपी कॉलेज से 12वीं, जीएफ कॉलेज से बीए और लखनऊ विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की थी।
फिर नहीं जुट सका एक अदद राष्ट्रीय ध्वज
यूं तो स्वतंत्रता सेनानी को अंतिम विदाई राजकीय सम्मान से ही दी जाती है। अंत्येष्टि से पूर्व कभी उनके आवास पर तो कभी मोक्षधाम पर शस्त्र झुकाकर उन्हें भावपूर्ण माहौल में सलामी दी जाती है, लेकिन परंपरानुसार पार्थिव शरीर पर राष्ट्रीय ध्वज डालने के लिए कोई व्यवस्था जिला प्रशासन की ओर से नहीं की जाती है। बसंतलाल खन्ना के साथ भी ऐसा ही हुआ। अंतिम समय में उनके घरवालों ने ही एक छोटे से राष्ट्रीय ध्वज की जैसे-तैसे व्यवस्था की थी। इससे पहले भी स्वतंत्रता सेनानी सुशील चंद्र गुप्त के शव के लिए भी प्रशासन तिरंगा नहीं जुटा पाया था। तब भी परिजनों ने ही अपनी ओर से यह सम्मान उन्हें दिया था।